संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबलाहाकादि सप्त सेनापति वध वर्णन ] [ ३१६
त्रिशतं चाक्षौहिणीनां प्रस्थापय सहैव तैः ।
ते मर्दयित्वा ललितासैन्यं मायापरायणाः ॥५
अये विजयमाहार्य संप्राप्स्यंति ममांतिकम् ।
कीकसागर्भमंजातास्ते प्रचंडपराक्रमाः ॥६
बलाहकमुखाः सप्त भ्रातरो जयिनः सदा ।
तेषामवश्यं विजयो भविष्यति रणांगणे ॥७
उन सबके मर जाने पर वह शून्यक का स्वामी क्रोध से अन्धा हो गया था और लम्बी श्वास लेता हुआ युद्ध करने की इच्छा से पूर्ण अभिप्राय वाले ने कुजलाश से यह कहा था—।१। हे सेनापते ! आप तो परमभद्र हैं और हमारा इस समय अमंगल आकर उपस्थित हो गया है। देखो, बड़े भारी भुजाओं के विक्रम वाले करंक प्रभृति सेनापतिगण जो कि समस्त देवों के मद का भञ्जन करने वाले थे। सर्पिणी माया से पापिनी उसने परम गूढ़ माया के द्वारा सबको मार डाला है ।२-३। अब बलाहक आदि जो उदग्र भुजाओं के सत्व वाले भी हैं उनको युद्ध करने के लिए भेज दो ।४। उनके साथ तीन सौ अक्षौहिणी सेनाएं भी भेज दो। वे माया में भी कुशल हैं। वे ललिता की सेनाओं का विमर्दन कर डालेंगे ।५। अये ! वे तो विजय करके ही मेरे समीप में वापिस प्राप्त होंगे। वे कीकसा के गर्भ से समुत्पन्न हुए हैं और अधिक प्रचण्ड पराक्रम से समन्वित हैं। जिनमें बलाहक प्रधान है वे सातों भाई हैं और हमेशा ही जयशील रहे हैं। मैं समझता हूँ कि इस युद्ध स्थल में उनकी तो अवश्य ही विजय होगी ।६-७।
इति भंडासुरेणोक्तः कुटिलाक्षः समाह्वयत् ।
बलाहकमुखान्सप्त सेनानाथान्मदोत्कटान् ॥८
बलाहकः प्रथमत्तस्तस्मात्सूचीमुखोऽपरः ।
अन्यः फालमुखश्चैव विकर्णो विकटाननः ॥९
करालायुः करटकः सप्तैते वीर्यशालिनः ।
भंडासुरं नमस्कृत्य युद्धकौतूहलोल्वणाः ॥१०
कीकसासूनवः सर्वे भ्रातरोऽन्योन्यमावृताः ।
अन्योन्यसुसहायाश्च निर्जग्मुर्नगरांतरात् ॥११