भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३२० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

त्रिंशताक्षौहिणीसेनासेनान्योऽन्वगमंस्तदा । उल्लिखन्ति केतुजालैरंबरे घनमण्डलम् ॥१२ घोरसंग्रामिणीपादाघातैर्मर्दितभूतला । पिबन्ति धूलिकाजालैरशेषानपि सागरात् ॥१३ भेरीनिः साणतंपोट्टपणवानकनिस्वनैः । नभोगुणमयं विश्वमादधानाः पदे पदे ॥१४

इस रीति से भण्डासुर के द्वारा कहने पर उस कुटिलाक्ष ने परमाधिक मदोत्कट बलाहक प्रमुख सात सेनापतियों को बुलाया था ।८। प्रथम तो बलाहक था—दूसरा सूचीमुख था—अन्य कालमुख था—विकर्ण—विकटानन—करालायु और करकट—ये सात परमाधिक वीर्यशाली थे । उन्होंने भण्डासुर को प्रणाम किया था ये युद्ध के कौतूहल में बहुत उल्बण थे ।६-१०। ये सब कीकसा के पुत्र थे और सभी परस्पर में भाई थे । ये परस्पर में एक दूसरे के सहायक थे और फिर वे लड़ने के लिए नगर के अन्दर से निकलकर चले गये थे ।११। तीन सो अक्षौहिणी सेनाओं के सेनानीगण भी उस समय में उनके पीछे गये थे । ये अपनी ध्वजाओं के जाल से घन मण्डल को उल्लिखित कर रहे थे ।१२। इन संग्रामिणियों के पैरों ने जो घात हो रहा था उससे भूतल विमर्दित हो रहा था । उस समय में इनकी सेनाओं के निर्गमन से इतनी धूलि उड़ रही थी कि सभी सागरों का जल सूख गया था । इनके कदम-कदम पर भेरी-निःसाण-तम्पोट-पणव-आनक का परम घोर घोष हो रहा था और सम्पूर्ण विश्व को शंकायमान करते हुए गमन कर रहे थे । नभ का गुण शब्द है वह पूरा विश्व शब्दमय हो रहा था ।१३-१४।

त्रिंशताक्षौहिणीसेनां तां गृहीत्वा मदोद्धताः । प्रवेष्टुमिव विश्वस्मिन्केकसेयाः प्रतस्थिरे ॥१५ धूतरोपारुणाः सूर्यमंडलोद्दीप्तकंकटाः । उद्दीप्तशस्त्रभरणाश्चेलुर्दीप्तोध्वंकेशिनः ॥१६ सप्त लोकान्प्रमथितुं प्रेषिताः पूर्वमुद्धताः । भंडासुरेण महता जगद्विजयकारिणा ॥१७