संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवलाहाकादि सप्त सेनापति वध वर्णन ] [ ३२१
सप्तलोकविमर्देन तेन दृष्ट्वा महाबलाः । प्रोषिता ललितासैन्यं जेतुकामेन दुर्धिया ॥१८ ते पतन्तो रणतलमुच्चलच्छत्रपाणयः । शक्तिसेना मभिमुखं सक्रोधमभिदुद्रुवुः ॥१९६ मुहुः किलकिलारावैर्घोषयंतो दिशो दश । देव्यास्तु सैनिकं यत्र तत्र ते जग्मुरुद्धताः ॥२० सैन्यं च ललितादेव्याः सन्नद्धं शस्त्रभीषणम् । अभ्यमित्रीणमभवद्वद्धभ्रकुटिनिष्ठुरम् ॥२१
ये मद से उद्धत कंकसेय तीन सौ अक्षौहिणी उस सेना को लेकर इस सम्पूर्ण विश्व में प्रवेश मानों कर रहे थे वहां से रवाना हुए थे ।१५। ये धारण किए हुए क्रोध से लाल हो रहे थे और सूर्यमण्डल के समान उद्दीप्त कंकट थे । ये शस्त्रों के आभरणों से परम उद्दीप्त थे और इनके दीप्त एवं ऊर्ध्वकेश थे ऐसे परम घोर ये वहाँ से चल दिये थे ।१६। सम्पूर्ण जगत के विजय करने वाले महान भण्डासुर के द्वारा परम उद्धत इनको समस्त सात लोकों का प्रमथन करने के लिए ही भेजा गया था ।१७। जीतने की कामना वाले सातों लोकों को विमर्दित करने वाले उसने अपनी दुष्ट बुद्धि से ही महान बलवान इनको ललिता देवी की सेना में भेजा था ।१८। ये हाथों में छत्रों को ऊपर उठाते हुए रणस्थल में जा रहे थे और फिर शक्ति सेना से सामने बड़े ही क्रोध के साथ धावा बोल दिया था ।१९। बार-बार किलकारियों की ध्वनियों से दशों दिशाओं को घोषित कर रहे थे तथा जहाँ पर देवी की सेना थी वहाँ पर उद्धत थे ।२०। ललिता देवी की सेना भी सन्नद्ध थी और शस्त्रास्त्रों से वह सेना परम भीषण थी । देवी की सेना भी अपनी भृकुटी तानकर कठोरता से शत्रु के समक्ष में हो गयी थी ।२१।
पाशिन्यो मुसलिन्यश्च चक्रिण्यश्चापरा मुने । मुद्गरिण्यः पट्टिशिन्यः कोदंडिन्यस्तथापराः ॥२२ अनेकाः शक्तयस्तीव्रा ललितासैन्यसंगताः । पिबंत्य इव दैत्याब्धि सन्निपेतुः सहस्रशः ॥२३ आयातायात हे दुष्टाः पापिन्यो वनिताधमाः ।