भारतकोश
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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

वलाहाकादि सप्त सेनापति वध वर्णन ] [ ३२१

सप्तलोकविमर्देन तेन दृष्ट्वा महाबलाः । प्रोषिता ललितासैन्यं जेतुकामेन दुर्धिया ॥१८ ते पतन्तो रणतलमुच्चलच्छत्रपाणयः । शक्तिसेना मभिमुखं सक्रोधमभिदुद्रुवुः ॥१९६ मुहुः किलकिलारावैर्घोषयंतो दिशो दश । देव्यास्तु सैनिकं यत्र तत्र ते जग्मुरुद्धताः ॥२० सैन्यं च ललितादेव्याः सन्नद्धं शस्त्रभीषणम् । अभ्यमित्रीणमभवद्वद्धभ्रकुटिनिष्ठुरम् ॥२१

ये मद से उद्धत कंकसेय तीन सौ अक्षौहिणी उस सेना को लेकर इस सम्पूर्ण विश्व में प्रवेश मानों कर रहे थे वहां से रवाना हुए थे ।१५। ये धारण किए हुए क्रोध से लाल हो रहे थे और सूर्यमण्डल के समान उद्दीप्त कंकट थे । ये शस्त्रों के आभरणों से परम उद्दीप्त थे और इनके दीप्त एवं ऊर्ध्वकेश थे ऐसे परम घोर ये वहाँ से चल दिये थे ।१६। सम्पूर्ण जगत के विजय करने वाले महान भण्डासुर के द्वारा परम उद्धत इनको समस्त सात लोकों का प्रमथन करने के लिए ही भेजा गया था ।१७। जीतने की कामना वाले सातों लोकों को विमर्दित करने वाले उसने अपनी दुष्ट बुद्धि से ही महान बलवान इनको ललिता देवी की सेना में भेजा था ।१८। ये हाथों में छत्रों को ऊपर उठाते हुए रणस्थल में जा रहे थे और फिर शक्ति सेना से सामने बड़े ही क्रोध के साथ धावा बोल दिया था ।१९। बार-बार किलकारियों की ध्वनियों से दशों दिशाओं को घोषित कर रहे थे तथा जहाँ पर देवी की सेना थी वहाँ पर उद्धत थे ।२०। ललिता देवी की सेना भी सन्नद्ध थी और शस्त्रास्त्रों से वह सेना परम भीषण थी । देवी की सेना भी अपनी भृकुटी तानकर कठोरता से शत्रु के समक्ष में हो गयी थी ।२१।

पाशिन्यो मुसलिन्यश्च चक्रिण्यश्चापरा मुने । मुद्गरिण्यः पट्टिशिन्यः कोदंडिन्यस्तथापराः ॥२२ अनेकाः शक्तयस्तीव्रा ललितासैन्यसंगताः । पिबंत्य इव दैत्याब्धि सन्निपेतुः सहस्रशः ॥२३ आयातायात हे दुष्टाः पापिन्यो वनिताधमाः ।

३२२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

मायापरिग्रहैदूरं मोहयंत्यो जडाशयान् ॥ २४ नेष्यामो भवतीरद्य प्रेतनाथनिकेतनम् । इति शक्तीर्भर्त्सयंतो दानवाश्चक्रुराहवम् ॥ २५ काचिच्चच्छेद दैत्येंद्रं कण्ठे पट्टिशपातनात् । तद्गलोद्गलितो रक्तपूर ऊर्ध्वमुखोऽभवत् ॥ २६ तत्र लग्ना बहुतरा गृध्रा मंडलतां गताः । तैरेव प्रेतनाथस्य च्छत्रच्छविरुदंचिता ॥ २७ काचिच्छक्तिः सुराराति मुक्तशक्त्यायुधं रणे । लूनतच्छक्तिनैकेन बाणेन व्यलुनीत च ॥ २८

हे मुने ! उनमें कुछ तो पाशधारिणी थीं—कुछ मुसलों को ग्रहण किये थीं—दूसरी चक्र धारिणी थीं—कुछ के पास मुद्गर थे तो कुछ पट्टिश लिये थीं तथा कुछ धनुष ग्रहण किये थीं ।२२। ललिता की सेना में संगत अनेक प्रकार की शक्तियाँ थीं । वे सहस्रों की संख्या में वहां पर समापतित हो गयीं थी मानो दैत्यों के सागरों का पान ही कर रही थी ।२३। दैत्यगण कह रहे थे—हे दुष्टाओ ! तुम नारियों में महान अधम हो—आओ ! तुम पापिनी हो । जो जड़ आशयों वाले हैं उनको ही तुम लोग अपनी माया के परिग्रहों से मोहित कर लिया करती हो ।२४। आज तो हम लोग तुम सबको यमराज के घर पर पहुँचा देंगे । हमारे पास ऐसे अत्यन्त भीषण बाण हैं जो फूत्कार मारते हुए भुजंगों के ही तुल्य हैं उन्हीं से तुम मृत्यु प्राप्त करोगी । इस तरह से शक्तियों को भर्त्सना देते हुए ही उन दानवों ने युद्ध किया था ।२५। किसी शक्ति ने दैत्येन्द्र के कण्ठ को पट्टिश के प्रहार से काट दिया था । काटने से जो उसके कण्ठ से रुधिर निकला था वह ऊपर की ओर गया था ।२६। वहाँ पर बहुत से गिद्ध लगे हुए थे जिन्होंने एक मण्डल सा बना लिया था । उन्हीं के द्वारा यमराज का एक छत्र सा बन गया था ।२७। किसी शक्ति ने रण में मुक्त शक्त्यायुध दैत्य को एक ही बाण के द्वारा काट दिया था ।२८।

एका तु गजमारूढा कस्यचिद्दैत्यदुर्मतेः । उरः स्थले स्वकरिणा वप्राघातमशिक्षयत् ॥ २६

वलाहाकादि सप्त सेनापति वध वर्णन ] [ ३२३

काचित्प्रतिभटारूढं दन्तिनं कुम्भसीमनि । खड्गेन सहसा हत्वा गजस्य स्वप्रियं व्यधात् ॥३० करमुक्तेन चक्रेण कस्यचिद्देववैरिणः । धनुर्दण्डं द्विधा कृत्वा स्वभ्रुवोः प्रतिमां तनोत् ॥३१ शक्तिरन्या शरैः शातैः शातयित्वा विरोधिनः । कृपाणपद्मा रोमाल्यां स्वकीयायां मुदं व्यधात् ॥३२ काचिन्मुद्गरपातेन चूर्णयित्वा विरोधिनः । रथचक्रनितंबस्य स्वस्य तेनातनोन्मुदम् ॥३३ रथकूबरमुग्रेण कस्यचिद्दानवप्रभोः । खड्गेन छिन्दती स्वस्य प्रियमुष्यास्ततान ह ॥३४ अभ्यंतरं शक्तिसेना दैत्यानां प्रविवेश ह । प्रविवेश च दैत्यानां सेना शक्तिबलांतरम् ॥३५

एक शक्ति हाथी पर समारूढ़ होकर युद्ध कर रही थी और उसने दुष्ट बुद्धि वाले दैत्य के उरःस्थल में अपने हाथी के द्वारा वज्राघात की शिक्षा दी थी ।२६। किसी शक्ति ने उस हाथी के जिस पर प्रतिभट बैठा हुआ था, कुम्भ स्थल में खंग का प्रहार किया था और उस हाथी के स्वप्रिय को मार डाला था ।३०। अपने हाथ से छोड़े हुए चक्र के द्वारा किसी असुर के धनुष के दो टुकड़े करके स्वभ्र की प्रतिमा बना दी थी ।३१। अन्य शक्ति के तीक्ष्ण शरों से विरोधियों का वध कर दिया था । कृपाण पद्मा ने अपनी रोमालि में मुद किया था ।३२। किसी शक्ति ने मुद्गर के प्रहार से विरोधियों का चूर्ण किया था । उस ने अपने रथ के पहिए के नितम्ब का उसके द्वारा मुद किया था अर्थात् आनन्द प्राप्त किया था ।३३। किसी दानवों के स्वामी के रथ के कूबर को अपने उग्र खग के द्वारा छेदन करती हुई अपनी प्रीति का विस्तार किया था ।३४। शक्ति की सेना दैत्यों के अन्दर प्रवेश कर गयी थी और दुर्धर दैत्यों की सेना भी शक्ति सेना के भीतर प्रवेश कर गयी थी ।३५।

नीरक्षीरवदत्यंताश्लेषं शक्तिसुरद्विषाम् । संकुलाकारतां प्राप्तो युद्धकालेऽभवत्तदा ॥३६

३२४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

शक्तीनां खड्गपातेन लूनशुण्डारदद्वयाः । दैत्यानां करिणो मत्ता महाक्रोडा इवाभवन् ॥३७ एवं प्रवृत्ते समरे वीराणां च भयंकरे । अशक्ये स्मर्तुमप्येतं कातरत्ववतां नृणाम् । भीषणानां भीषणे च शस्त्रव्यापारदुर्गमे ॥३८ बलाहको महागृध्रं वज्रतीक्ष्णमुखादिकम् । कालदण्डोपमं जंघाकांडे चंडपराक्रमम् ॥३६ संहारगुप्तनामानं पूर्वमग्रे समुत्थितम् । धूमवद्धूसराकारं पक्षक्षेपभयंकरम् ॥४० आरुह्य विविध युद्धं कृतवान्युद्धदुर्मदः । पक्षौ वितस्य क्रोशार्धं स स्थितो भीमनिःस्वनैः । अंगारकुण्डवच्चञ्चुं विदार्याभक्षयच्चमूम् ॥४१ संहारगुप्तं स महागृध्रः क्रूरविलोचनः । बलाहकमुवाहोच्चैराकृष्टधनुषं रणे ॥४२

नीर और क्षीर के ही समान शक्ति सेना और असुरों की सेना एकदम मिल गयीं थीं । उस समय में युद्ध काल में संकुलाकारता को प्राप्त हो गया था ।३६। शक्तियों के खंगों के पात से दैत्यों के गज कटी हुई सूँड और दांतों वाले हो गये थे और वे मत्त महान् क्रीड़ों के तुल्य ही हो गये थे ।३७। इस प्रकार से वीरों का युद्ध प्रवृत्त हुआ था जो कि कातरता को प्राप्त होने वाले मनुष्य तो उसका स्मरण करने में भी सर्वथा असमर्थ हैं और भीषणों का वह शस्त्रों का व्यापार भी महान् भीषण तथा दुर्गम था ।३८। बलाहक महागृध्र—वज्रतीक्ष्ण मुख आदिक-कालदण्डोपम—जंघा काण्ड में प्रचण्ड पराक्रम—संसार गुप्त नाम वाला आगे पूर्व में समुत्थित हुआ था । उसका धूम की तरह धूसर आकार था और पंखों को जब क्षेपण करता था तब बहुत भयंकर हो जाता था ।३६-४०। वह युद्ध करने में दुर्मद अनेक प्रकार के वाहनों के ऊपर आरोहण करके उसने युद्ध किया था । वह दोनों पंखों को फैला कर भयानक घोषों के द्वारा आधे कोश तक स्थित हुआ था । अँगारों के कुण्ड की भाँति अपनी चोंच को फैलाकर सेना का विदा-

बलाहकादि सप्त सेनापति वध वर्णन ] [ ३२५

रण करके वह संहार गुप्त महागिद्ध था जिसके बहुत क्रूर नेत्र थे। रण में धनुष को खींचकर बलाहक को बहुत ऊँचा उठा लिया था।४१-४२।

बलाहको वपुर्धुन्वन्गृध्रपृष्ठकृतस्थितिः । सपक्षकूटशैलस्थो बलाहक इवाभवत् ॥४३ सूचीमुखश्च दैत्येन्द्र सूचीनिष्ठुरपक्षतिम् । काकवाहनमारुह्य कठिनं समरं व्यधात् ॥४४ मत्तः पर्वतशृङ्गाभश्चंचूदण्डं समुद्वहन् । कालदण्ड प्रमाणेन जंघाकाण्डेन भीषणः ॥४५ पुष्करावर्तकसमा जंबालसदृशद्युतिः । क्रोशगात्रायतौ पक्षावुभावपि समुद्वहन् ॥४६ सूचीमुखाधिष्ठितोऽसौ करटः कटुवासितः । मर्दयंश्चञ्चुघातेन शक्तीनां मण्डलं महत् ॥४७ अथो फलमुखः फालं गृहीत्वा निजमायुधम् । कंकमारुह्य समरे चकाशि गिरिसन्निभम् ॥४८ विकर्णाख्यश्च दैत्येन्द्रश्चमूर्भर्ता महाबलः । भेरूंढपतनारूढः प्रचंडयुद्धमातनोत् ॥४९

एक गिद्ध की पीठ पर स्थिति करने वाला बलाहक शरीर को विधूनित करता हुआ सपक्ष कूट शैल पर स्थित बलाहक के ही समान हो गया था ।४३। और सूची मुख दैत्येन्द्र सूची के तुल्य निष्ठुर पंखों वाले काक वाहन पर समारूढ़ हुआ था और उसने बड़ा ही कठोर युद्ध किया था ।४४। वह मत्त था और पर्वत की चोटी की भांति उसकी आभा थी—वह चञ्चु दंड का उद्वहन कर रहा था। वह कालदंड के प्रमाण वाले जंघा कांड से बहुत ही भीषण दिखाई दे रहा था ।४५। जंबाल के सदृश द्युति वाला पुष्करावर्तक के समान था। उसके दोनों पंख एक कोश के बराबर आयत थे। ऐसे पंखों का उद्वहन कर रहा था ।४६। सूची मुख पर अधिष्ठित कटुवासित करट शक्तियों के महान् मंडल को चोंच के आघात से विमर्दन कर रहा था ।४७। इसके अनन्तर फलमुख अपने आयुध काल को ग्रहण करके कंक पर समारूढ़ हुआ था और पर्वत की भांति प्रकाशित हो रहा था। विकर्ण

३२६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

नामक दैत्येन्द्र सेनापति महान् बलवान् था । उसने भेरुण्ड पतन पर समारोहण करके बड़ा भारी युद्ध किया था ।४८-४९।

विकटानननामानं विलसत्पट्टिशायुधम् । उवाह समरे चण्डः कुक्कुटोऽतिभयङ्करः ॥५० गर्जन्कण्ठस्थरोमाणि हर्षयञ्ज्वलदीक्षणः । पश्यन्पुरः शक्तिसैन्यं चचाल चरणायुधः ॥५१ करालाक्षश्च भूभर्ता षष्ठोऽन्तन्तगरिष्ठदः । वज्रनिष्ठुरघोषश्च प्राचलत्प्रेतवाहनः ॥५२ श्मशानमन्त्रशूरेण तेन संसाधितः पुरा । प्रेतो भूतोसमाविष्टस्तमुवाह रणाजिरे ॥५३ अवाङ्मुखो दीर्घबाहुः प्रसारितपदद्वयः । प्रेतो वापनतां प्राप्तः करालाक्षनथावहत् ॥५४ अन्यः करटको नाम दैत्यसेनाशिखामणिः । मर्दयामासशक्तीनां सैन्यं वेतालवाहनः ॥५५ योजनायतमूर्तिः सन्वेतालः क्रूरलोचनः । श्मशानभूमौ वेतालो मंत्रेणानेन साधितः ॥५६

अतीव भयङ्कर प्रचण्ड कुक्कुट ने पट्टिश नामक आयुध को ग्रहण करने वाले विकटानन नाम वाले का वहन किया था ।५०। कंठ में रहने वाले रोमों को हर्षित करता हुआ और गर्जना करता हुआ वह शक्ति की सेना को देख रहा था तथा उसके नेत्र जाज्वल्यमान थे ऐसा चरणायुध वहाँ से चल दिया था ।५१। करालाक्ष नामक राजा जो छठवां था वह अत्यधिक गरिष्ठद था । वज्र के समान ही उसका घोष निष्ठुर था और प्रेत के वाहन वाला था । वह भी चल दिया था ।५२। उसने पहिले ही श्मशान मन्त्र शूर ने उसको संसाधित कर लिया था । ऐसे भूत समाविष्ट प्रेत ने रण में उसका वहन किया था । नीचे की ओर मुख वाले—लम्बी भुजा वाले—दोनों पैरों को फैलाये हुए प्रेत के वाहनता को प्राप्त करके कुटिलाक्ष रवाना हुआ था ।५३-५४। अन्य जो करट नामक दैत्यों की सेना का स्वामी था वह वेताल के वाहन वाला था और शक्ति की सेना का मर्दन किया था ।५५। वह एक

वलाहकादि सप्त सेनापति वध वर्णन ] [ ३२७

योजन तक आयत था वह बेताल क्रूर नेत्रों वाला था । इस वेताल की भी सिद्धि श्मशान की भूमि में समवस्थित होकर की थी और मन्त्र का जाप कर के ही की थी ॥५६॥

मर्दयामास पृतनां शक्तीनां तेन देशितः ।
तस्य बेतालवर्यस्य वर्तमानोंससीमनि ।
बहुधायुध्यत तदा शक्तिभिः सह दानवः ॥५७
एवमेते खलात्मानः सप्तसप्तार्णवोपमाः ।
शक्तीनां सैनिकं तत्र व्याकुलीचक्रुरुद्धताः ॥५८
ते सप्त पूर्वं तपसा सवितारमतोषयन् ।
तेन दत्तो वरस्तेषां तपस्तुष्टेन भास्वता ॥५९
कैकसेया महाभागा भवतां तपसाधुना ।
परितुष्टोऽस्मि भद्रं वो भवन्तो वृणुतां वरम् ॥६०
इत्युक्ते दिननाथेन कैकसेयास्तपःकृशाः ।
प्रार्थयामासुरत्यर्थं दुर्दान्तं वरमीदृशम् ॥६१
रणेषु सन्निधातव्यमस्माकं नेत्रकुक्षिषु ।
भवता घोरतेजोभिर्दहता प्रतिरोधिनः ॥६२
त्वया यदा सन्निहितं तपन्नास्माकमक्षिषु ।
तदाक्षिविषयः सर्वो निष्चेष्टो भवतात्प्रभो ॥६३

उसके द्वारा आदेशित होकर उसने शक्ति की सेना का मर्दन किया था । उस वेताल की सीमा में वर्त्तमान दानव ने शक्ति की सेना के साथ अनेक प्रकार से युद्ध किया था ॥५७॥ इस प्रकार से महान् खल सात सागरों के समान उन सातों ने जो बहुत ही उद्धत थे शक्ति की सेनाओं को व्याकुल कर दिया था ॥५८॥ उन सातों ने पहिले तप के द्वारा सविता को प्रसन्न कर लिया था । तपस्या से प्रसन्न होकर सविता ने उनको वरदान दिया था । ॥५९॥ हे कैकसेयो ! आप महान् भाग वाले हैं अब मैं आपके तप से प्रसन्न हो गया हूँ । आपका कल्याण होगा । आप लोग कोई भी वरदान माँग लो ॥६०॥ सूर्य देव के द्वारा इस भाँति कहने पर तप से अतिकृश हुए उन कैकसेयों ने अत्यन्त दुर्दान्त ऐसा वरदान माँगा था ॥६१॥ आप युद्ध स्थल में

३२८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

हमारे नेत्रों में और कुक्षियों में आकर विराजमान होवें जिससे शत्रुओं को घोर तेजसे दाह होजावे । हे प्रभो ! जब आप तपते हुए हमारी आँखों में सन्निधान करेंगे तो उससे हम जिसको भी देखें वही निश्चेष्ट हो जावे ।६२-६३।

त्वत्सान्निध्यसमिद्धेन नेत्रेणास्माकमीक्षिताः ।
स्तब्धशस्त्रा भविष्यन्ति तिरोधकसैनिकाः ॥६३
ततः स्तब्धेषु शस्त्रेषु वीक्षणादेव नः प्रभो ।
निश्चेष्टा रिपवोऽस्माभिर्हन्तव्याः सुकरस्त्वतः ॥६५
इति पूर्वं वरः प्राप्तः कैकसेयैर्दिवाकरात् ।
वरदानेन ते तत्र युद्धे चेरुर्मदोद्धताः ॥६६
अथ सूर्यसमाविष्टनेत्रैस्तैस्तु निरीक्षिताः ।
शक्तयः स्तब्धशस्त्रौघा विफलोत्साहतां गताः ॥६७
कीकसातनयैस्तैस्तु सप्तभिः सत्वशालिभिः ।
विष्टम्भितास्त्रशस्त्राणां शक्तीनां नोद्यमोऽभवत् ॥६८
उद्यमे क्रियमाणेऽपि शस्त्रस्तम्भेन भूयसा ।
अभिभूताः सनिश्चासं शक्तयो जोषमासत ॥६९
अथ ते वासरं प्राप्य नानाप्रहरणोद्यताः ।
व्यमर्दयञ्छक्तिसैन्यं दैत्याः स्वस्वामिदेशिताः ॥७०

विपक्ष के योद्धा आपके सन्निधान वाले हमारे नेत्रों से देखे गये होने पर स्तब्ध शस्त्रों वाले हो जांयगे ।६४। हे प्रभो ! फिर जब सभी शस्त्र स्तब्ध होंगे और हमारे देखने मात्र से ही अवरुद्ध हो जांयगे तो फिर निश्चेष्ट शत्रु हमारे द्वारा आसानी से मारे जाने के योग्य हो जांयगे ।६५। यह पूर्व में ही वर प्राप्त किया था और कैकसेयों ने सूर्य देव से ही ऐसा वर-दान पा लिया था । इसी वरदान से मदोद्धत वे उस युद्ध में गये थे ।६६। इसके उपरान्त सभी शक्तियाँ सूर्य के समाविष्ट नेत्रों द्वारा देखी गयी थी और स्तब्ध शास्त्रों वाली होकर उत्साह हीन हो गयीं थीं ।६७। कीकसा के पुत्र सातों के द्वारा जो कि बड़े ही सत्व थे शक्तियों की सेनाओं के शस्त्रास्त्र विष्टम्भित कर दिये गये थे और उनका कुछ भी उद्यम नहीं हुआ था ।

वलाहकादि सप्त सेनापति वध वर्णन ] [ ३२६

अर्थात् शक्तियाँ कुछ भी न कर सकीं थीं ।६८। उद्यम किये जाने पर भी उसका कुछ भी प्रभाव नहीं हुआ था क्योंकि बड़ा भारी शस्त्रों का स्तम्भन था । इस विष्टम्भ से अभिभूत हुई शक्तियों को चुप ही रहना पड़ा था। ।६६। फिर दिवस के होने पर वे सब अनेक आयुधों से संयुत होकर अपने स्वामी की आज्ञा से समन्वित होते हुए दैत्यों ने शक्तियों की सेना का विमर्दन किया था ।७०।

शक्तयस्तास्तु सैन्येन निर्व्यापारा निरायुधाः ।
अक्षुभ्यंत शरैस्तेषां वज्रकङ्कटभेदिभिः ॥७१
शक्तयो दैत्यशस्त्रौधैर्विद्धगात्राः सृतासृजः ।
सुपल्लवा रणे रेजुः कङ्कोललतिका इव ॥७२
हाहाकारं वितन्वत्यः प्रपन्ना ललितेश्वरीम् ।
चुक्रुशुः शक्तयः सर्वास्तैः स्तंभितनिजायुधाः ॥७३
अथ देव्याज्ञया दण्डनाथा प्रत्यङ्गरक्षिणी ।
तिरस्करिणिका देवी समुत्तस्थौ रणाजिरे ॥७४
तमोलिप्ताह्वयं नाम विमानं सर्वतोमुखम् ।
महामाया समारुह्य शक्तीनामभयं व्यधात् ॥७५
तमालश्यामलाकारा श्यामकंचुकधारिणी ।
श्यामच्छाये तमोलिप्ते श्यामयुक्तुरङ्गमे ॥७६
वासन्ती मोहनाभिधयं धनुरादाय सस्वनम् ।
सिंहनादं विनद्येषूनवर्षत्स्र्पसन्निभान् ॥७७

वे शक्तियां तो उस समय में शत्रु की सेना के द्वारा निरायुध और निर्व्यापार वाली हो गयीं थीं तथा उन दैत्यों के वज्र कङ्कट भेदी शरों के द्वारा क्षुब्ध हो गयी थीं ।७१। दैत्यों के शस्त्रों के समुदायों से विद्ध शरीरों वाली हो गयी थीं और उनके शरीरों से रुधिर बह रहा था । वे रण में सुन्दर पत्तों वाली कङ्कोल लताओं की भाँति शोभित हो रही थीं ।७२। वे समस्त शक्तियां हाहाकार करती हुई ललिता देवी की शरण में गयी थीं । ये सभी शक्तियां दैत्यों के द्वारा स्तम्भित शस्त्रों वाली होकर रोने लगीं थीं ।७३। इसके अनन्तर देवी की आज्ञा से प्रत्यङ्गरङ्गिणी दण्डनाथा तिरस्कर-

३३० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

णिका देवी उस रण स्थल में समुत्थित हो गयी थी ॥७४॥ तमोलिप्त नामक सर्वतोमुख विमान पर महामाया ने समारूढ होकर शक्तियों के भय को दूर किया था ॥७५॥ वह रथ श्याम कान्ति वाला था-तम से लिप्त और श्याम तुरङ्गमों वाला था। उस पर तमाल के समान श्यामल आकार वाली तथा श्याम कञ्चु की को धारण करने वाली विराजमान थी ॥७६॥ वासन्ती मोहन की अभिख्या वाले धनुष को ग्रहण करके ध्वनि के साथ सिंहनाद करके सर्पों के सदृश वाणों की वर्षा उस देवी ने की थी ॥७७॥

कृष्णरूपभुजङ्गभानधोमुसलसंनिभाम् । मोहनास्त्रविनिष्ठ्यूतान्बाणान्दैत्या न सेहिरे ॥७८ इतस्ततो मदर्यमाना महामायाशिलीमुखैः । प्रकोपं परमं प्राप्ता बलाहकमुखाः खलाः ॥७९ अथो तिरस्करण्यांबा दण्डनाथानिदेशतः । अन्धाभिधं महास्त्रं सा मुमोच द्विषतां गणे ॥८० बलाहकाद्यास्ते सप्त दिननाथवरोद्धताः । अन्धास्त्रेण निजं नेत्रं दधिरे च्छादितं यथा ॥८१ तिरस्करणि कादेव्या महामोहनधन्वनः । उद्गतेनांधबाणेन चक्षुस्तेषां व्यधीयत: ॥८२ अन्धीकृताश्च ते सप्त न तु प्रैक्षन्त किञ्चन । तद्वीक्षणस्य विरहाच्छस्तम्भः क्षयं गतः ॥८३ पुनः ससिंहनादं ताः प्रोद्यतायुधपाणयः । चक्रुः समरसन्नाहं दैत्यानां प्रजिघांसया ॥८४

वे दैत्यगण कृष्ण स्वरूप से संयुत भुजङ्गों के समान तथा मूसल के सदृश मोहनास्त्र से निकाले गये वाणों को सहन न कर सके थे ।७८। इधर-उधर महामाया के बाणों से मर्दित होते हुए वे खल जिनमें बेलाहक प्रधान था परमाधिक प्रकोप को प्राप्त हो गये थे ।७९। अनन्तर में दण्डनाथा के आदेश से तिरस्करिणी अम्बा ने शत्रुओं के युद्ध में अन्धनामक महास्त्र को छोड़ा था ।८०। सूर्य देव के वर से बड़े ही उद्धत हुए वे बलाहक आदि सातों दैत्य उस अन्धास्त्र से अपने नेत्रों को छादित हुए ही धारण किये हुए थे ।

वलाहकादि सप्त सेनापति वध वर्णन ] [ ३३१

।८१। तिरस्करिणी अम्बा के मोहनास्त्र धनुष से निकले हुए बाण के द्वारा उनके नेत्र बन्द हो गये थे ।८२। अन्धे बनाये गये वे सातों वहाँ पर कुछ भी नहीं देख पाते थे । उनके न देखने से वह शस्त्र का स्तम्भन भी क्षीण हो गया था ।८३। करों में आयुध लिये हुए उन्होंने फिर सिंहनाद करके दैत्यों के हनन करने की इच्छा से युद्ध किया था ।८४।

तिरस्करणितां देवीमग्रे कृत्वा महाबलाम् ।
तदुपायप्रसङ्गेन भृशं तुष्टा रणं व्यधुः ॥८५
साधुसाधु महाभागे तिरस्करिणिकांबिके ।
स्थाने कृततिरस्कारा द्विषामेषां दुरात्मनाम् ॥८६
त्वं हि दुर्जननेत्राणां तिरस्कारमहौषधी ।
त्वया बद्धदृशानेन दैत्यचक्रेण भूयते ॥८७
देवकार्यमिदं देवि त्वया सम्यगनुष्ठितम् ।
अस्मादृशामजय्येषु यदेषु व्यसनं कृतम् ॥८८
तत्त्वयैव दुराचारानेतान्सप्त महासुरान् ।
निहतांल्ललिता श्रुत्वा सन्तोषं परमाप्स्यति ॥८९
एवं त्वया विरचिते दण्डिनीप्रीतिमाप्स्यति ।
मंत्रिण्यपि महाभागा यास्यत्येव परां मुदम् ॥९०
तस्मात्त्वमेव सप्तेतान्निगृहाण रणाजिरे ।
एषां सैन्यं तु निखिलं नाशयाम उदायुधाः ॥९१

उन शक्तियों ने महान् बल वाली उस तिरस्करणी देवी को अपने आगे करके उसके अन्धीकरण के उपाय के प्रसङ्ग से बहुत ही प्रसन्न होकर युद्ध किया था ।८५। वे सभी शक्तियां यह कह रही थीं—हे तिरस्कारिणि ! अम्बिके ! हे महाभागे ! बहुत ही अच्छा किया । दुरात्मा इन शत्रुओं को आपने जो तिरस्कार किया है वह बहुत ही उचित किया है ।८६। आप ही इन दुष्टों के नेत्रों के तिरस्कार करने की महौषध हैं। आपके द्वारा दृष्टि के बन्द होने ही से यह दैत्यों का चक्र पराभूत हो रहा है ।८७। हे देवि ! यह तो देवकार्य है जो आपने भलीभांति किया है। हम जैसी शक्तियों के द्वारा अजेय इनमें जो आपने यह व्यसन उत्पन्न कर दिया है ।८८। अब आपके ही

३३२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

द्वारा इन महान सात असुरों को निहत हुआ सुनकर ललिता देवी बहुत ही प्रसन्नता को प्राप्त होंगी ।८६। आपके द्वारा ऐसा करने पर दण्डिनी देवी भी प्रीति को प्राप्त हो जायगी और महाभागा मन्त्रिणी देवी भी बहुत अधिक सन्तोष को प्राप्त हो जायगी ।६०। इस कारण से अब आप ही इन सातों का युद्धाङ्गण में वध कीजिए । इनकी जो सम्पूर्ण सेना है उसको आयुध ग्रहण कर हम विनष्ट कर देती हैं ।६१।

इत्युक्त्वा प्रेरिता ताभिः शक्तिभियुद्ध कौतुकात् । तमोलिप्तेन यानेन बलाहकबलं ययौ ॥६२॥ तामायांतीं समावेक्ष्य ते सप्ताथ सुराधमाः । पुनरेव च सावित्रं वरं सस्मरुरंजसा ॥६३॥ प्रविष्टमपि सावित्रं नाशकं तन्निरोधने । तिरस्कृतं तु नेत्रस्थं तिरस्करणितेजसा ॥६४॥ वरदानास्त्ररोषांधं महाबलपराक्रमम् । अस्त्रेण च रुषा चांधं बलाहकमहासुरम् । आकृष्य केशेष्वसिना चकर्तातर्धिदेवता ॥६५॥ तस्य वाहनगृध्रस्य लुनाना पत्रिणा शिरः । सूचीमुखस्याभिमुखं तिरस्कर णिकाव्रजत् ॥६६॥ तस्य पट्टिशपातेन विलूय कठिनं शिरः । अन्येषामाप पञ्चानां पञ्चत्वमकरोच्छनैः ॥६७ तैः सप्तदैत्यमुण्डैश्च ग्रथितान्योन्यकेशकैः । हारदाम गले कृत्वा ननादांतधिदेवता ॥६८

इस प्रकार से कहे जाने पर उन शक्तियों के द्वारा प्रेरित हुई उस तिरस्करिणी देवी ने युद्ध कौतुक से तमोलिप्त यान के द्वारा बलाहक की सेना में गमन किया था ।६२। उस देवी को आती हुई देखकर उन सातों अधम असुरों ने फिर भी उसी सूर्य देव के दिये हुए वरदान का तुरन्त ही स्मरण किया था ।६३। वह सावित्र वरदान प्रविष्ट भी हुआ था जो कि उसके निरोध का विनाशक था किन्तु तिरस्करणी के तेज से वह भी तिरस्कृत हो गया था ।६४। वरदानास्त्र के रोष से अन्धा तथा महान बल और पराक्रम

बलाहकादि सप्त सेनापति वध वर्णन ] [ ३३३

वाला वह असुर था। अस्त्र से और रोष से अन्धे उस महासुर बलाहक के केशों को पकड़ कर उस देवी ने अपनी ओर खींच लिया था और अन्धे बना देने वाली देवी ने उसका शिर तलवार से काट डाला था। ६५। उसका जो वाहन गिद्ध था उसका भी शिर पत्री के द्वारा काटकर वह तिरस्कारिणी देवी सूची मुख के सामने गयी थी। ६६। उसके शिर को पट्टिश के प्रहार से काट डाला था और शेष जो पांच रहे थे उनके भी सबके शिर धीरे-धीरे उस देवी ने काटकर मौत के घाट सबको उतार दिया था । ६७। उन सातों असुरों के मुण्ड परस्पर में केशों के द्वारा बँधे हुए थे। उनका एक हार सा बनाकर गले में डालकर तिरस्करिणी देवी गर्जना कर रही थी । ६८।

मस्तमपि तत्सैन्यं शक्तयः क्रोधमूर्च्छिताः ।
हत्वा तद्रक्तसलिलैर्बह्वीः प्रावाहयन्नदीः ॥६६॥

तत्राश्चर्यमभूद्भूरि महामायांबिकाकृतम् ।
बलाहकादिसेनान्यां दृष्टिरोधनवैभवात् ॥१००॥

हृतशिष्यः कतिपयाबहु वित्रासन्सऽकुलाः ।
शरणं जग्मुरत्यार्त्ताः क्रन्दंतं शून्यकेश्वरम् ॥१०१॥

दंडिनीं च महामायां प्रशंसन्ति मुहुर्मुहुः ।
प्रसादमपरं चक्षुस्तस्या आदाय पिप्रियुः ॥१०२॥

साधुसाध्विति तत्रस्थाः शक्तयः कम्पमौल्यः ।
तिरस्करणि कां देवीमश्लाघंत पदे पदे ॥१०३

क्रोध से मूर्च्छित उन शक्तियों ने उन असुरों की सम्पूर्ण सेना का हनन कर दिया था तथा उनके रुधिर की बहुत से नदियों को प्रवाहित कर दिया था। ६६। बलाहक आदि बड़े-बड़े सेनानियों की दृष्टि के रोधन करने के वैभव से जो कि महामाया अम्बिका के द्वारा किया गया था वहाँ पर उस समय में बड़ा आश्चर्य हो गया था। १००। मरने से जो भी कुछ बच गये थे वे सब बहुत ही भयभीत होकर असुर बहुत आर्त होकर शून्यकेश्वर की शरण में रुदन करते हुए पहुँच गये थे और वे महामाया दण्डिनी की बारम्बार प्रशंसा कर रहे थे और उसकी दूसरी प्रसन्नता से चक्षु प्राप्त करके वे प्रसन्न भी हुए थे । १०१-१०२। वहाँ पर जो शक्तियाँ थीं उनने बहुत अच्छा हुआ—यह कहकर अपना शिर हिलाते हुए पद-पद पर तिरस्करिणी देवी की श्लाघा की थी । १०३।

३३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

विषंग पलायन वर्णन

ततः श्रुत्वा वधं तेषां तपोबलवतामपि ।
न्यश्वसत्कृष्णसर्पेन्द्र इव भंडो महासुरः ॥१
एकांतो मंत्रयामास स आहूय महोदरो ।
भण्डः प्रचंडशौंडीर्यः कांक्षमाणो रणे जयम् ॥२
युवराजोऽपि सक्रोधो विषंगेण यवीयसा ।
भंडासुरं नमस्कृत्य मंत्रस्थानमुपागमत् ॥३
अत्याप्तैर्मंत्रिभिर्युक्तः कुटिलाक्षपुरः सरैः ।
ललिताविजये मंत्रं चकार क्वथिताशयः ॥४
भंडउवाच-
अहो बत कुलभ्रंशः समायातः सुरद्विषाम् ।
उपेक्षामधुना कर्तुं प्रवृत्तो बलवान्विधिः ॥५
मद्भृत्यनाममात्रेण विद्रवंति दिवौकसः ।
तादृशानामिहास्माकमागतोऽयं विपर्ययः ॥६
करोति बलिनं क्लीबं धनिनं धनवर्जितम् ।
दीर्घायुषमनायुष्कं दुर्घटा भवितव्यता ॥७

इसके अनन्तर महासुर भंड ने जब महान बलवान और वरदानी उन सातों का वध सुना तो वह उस समय में काले सर्प के ही समान निश्वास लेने लगा था ।१। महान शौण्डीर्य वह रण में विजय की इच्छा वाला होकर एकान्त में महोदरोँ को बुलाते हुए उनके साथ भंडासुर ने मन्त्रणा की थी। ।२२। युवराज भी क्रोध युक्त हुआ था और छोटे भाई विषङ्ग के साथ वहाँ उपस्थित हुआ था । उसने भंडासुर को नमस्कार किया था और फिर वह भी मन्त्रणा के स्थान पर प्राप्त हो गया था ।३। वे उसके मन्त्री बहुत ही विश्वास पात्र थे जिनमें कुटिलाक्ष आदि अग्रणी थे । बिगड़े हुए विचार वाले उस भंड ने उनके साथ ललिता के विजय करने की मन्त्रणा की थी ।४। भंड ने कहा—अहो ! अब तो असुरों के कुल का विनाश ही प्राप्त हो गया है । यह विधि बड़ा बलवान् है इसने हम लोगों की ओर में उपेक्षा ही करने में अपनी प्रवृत्ति करती है ।५। मेरे भृत्यों के नाम से ही देवगण भाग जाया

पिषंग पलायन वर्णन ] [ ३३५

करते हैं । ऐसे हमारा भी इस समय में विपरीत समय उपस्थित हो गया है ।६। यह होनहार ऐसी बलवान है कि यह बलवान को क्लीव (नपुंसक) और धनवान को भी धनहीन कर दिया करती है। जो दीर्घ आयु वाला है उसको आयुहीन कर दिया करती है। इस होनी का प्रहार बड़ा ही कठिन है ।७।

क्व सत्वमस्मद्बाहूनां क्वेयं दुर्ललिता वधूः ।
अकांड एव विधिना कृतोऽयं निष्ठुरो विधिः ॥८
सर्पिणीमाययोदग्रास्तया दुर्घटशौर्यया ।
अधिसंग्रामभूचक्रे सेनान्यो विनिपातिताः ॥६
एवमुद्दामदर्पाढया वनिता कापि मायिनी ।
यदि संप्रहरत्यस्मान्धिग्बलं नो भुजार्जितम् ॥१०
इमं प्रसंगं वक्तुं च जिह्वा जिह्वेति मामकी ।
वनिता किमु मत्सैन्यं मर्दयिष्यति दुर्मदा ॥११
तदद्य मूलच्छेदाय तस्या यत्नो विधीयताम् ।
मया चारमुखाज्ज्ञाता तस्या वृत्तिर्महाबला ॥१२
सर्वेषामपि सैन्यानां पश्चादेवावतिष्ठते ।
अग्रतश्चलितं सैन्यं पयहस्तिरथादिकम् ॥१३
अस्मिन्नेव ह्यवसरे पार्ष्णिग्राहो विधीयताम् ।
पार्ष्णिग्राहमिमं कर्तुं विषण्णश्चतुरो भवेत् ॥१४

हमारी भुजाओं का बल तो कहाँ अर्थात् उस कितना विशाल है और यह दुर्ललिता वधू कहाँ है अर्थात् नारी की शक्ति हमारे सामने सर्वथा तुच्छ है। अनवसर में ही विधाता के ऐसा निष्ठुर विधान कर दिया है कि हमारा विनाश इन अबला नारियों द्वारा हो रहा है ।८। दुर्घट शूरता वाली सर्पिणी माया के द्वारा बड़े-बड़े उदग्र सेनानी गण संग्राम भूमि में मारे गये हैं ।६। इस रीति से उद्दाम दर्प से संयुत कोई माया वाली नारी यदि हमारा संहार कर देती है तो हमारी बाहुओं के द्वारा जो भी बल अर्जित किया गया है उसको धिक्कार ही है ।१०। इस प्रसङ्ग को कहने में भी मेरी जिह्वा लज्जित होती है । क्या यह दुर्मदा स्त्री हमारी सेना का मर्दन कर देगी

३३६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

।१। इसलिए उसके मूल का उच्छेदन करने के लिए कोई यत्न करना ही चाहिए। मैंने दूतों के मुख से सुना है कि उसकी वृत्ति महा बलवती है ।२। वह सब सेना के वह पीछे ही रहती है और उसके आगे हाथी-घोड़े और सेनाएं सब चला करती हैं ।३। अब इसी अवसर पर उसका पाष्णिग्राह करो। इस पाष्णिग्राह में अर्थात् पीछे पहुँचकर उसको पकड़ने में विषङ्ग बहुत कुशल है ।४।

तेन प्रोढमदोन्मत्ता बहुसंग्रामदुर्मदाः ।
दश पञ्च च सेनान्यः सह यांतु युयुत्सया ॥१५
पृष्ठतः परिवारास्तु न तथा सन्ति ते पुनः ।
अल्पैस्तु रक्षिता वै स्यात्तेनेवासौ सुनिग्रहा ॥१६
अतस्त्वं बहुसन्नाहमाविधाय मदोत्कटः ।
विषंग गुप्तरूपेण पाष्णिग्राहं समाचर ॥१७
अल्पीयसी त्वया सार्द्धं सेना गच्छतु विक्रमात् ।
सज्जाश्चलंतु सेनान्यो दिक्पालविजयोद्धताः ॥१८
अक्षौहिण्यश्च सेनानां दश पञ्च चलंतु ते ।
त्वं गुप्तवेषस्तां दुष्टां सन्निपत्य दृढं जहि ॥१९
सैव निःशेषशक्तीनां मूलभूता महीयसी ।
तस्याः समूलनाशेन शक्तिवृन्दं विनश्यति ॥२०
कंदच्छेदे सरोजिन्या दलजालमिवाम्भसि ।
सर्वेषामेव पश्चाद्यो रथश्चलति भासुरः ॥२१

उस विषंग के साथ युद्ध करने की इच्छा से बड़े प्रौढ़ और मदोन्मत्त दश पाँच सेनानी भी जावें ।१५। उनके पीछे की ओर कोई परिवार नहीं है। वह बहुत थोड़े से सैनिकों के द्वारा रक्षित है अतः सबका निग्रह आसान है ।१६। इसीलिए मदोत्कट तुम बहुत संग्राम न करके गुप्त रूप से विषंग को समाचरण करो ।१७। आपके साथ बहुत थोड़ी सेना जावे और सेनानी सज्जित होकर चलें जो विक्रम से दिक्पालों के भी विजय करने से उद्धत हैं ।१८। पन्द्रह अक्षौहिणी सेनाएं भी जावें और तुम गुप्त वेष वाले होकर दुष्टा उसको मार डालो ।१९। वह ही सम्पूर्ण शक्तियों की बहुत बड़ी मूल

विषंग पलायन वर्णन ] [ ३३७

स्वरूपा है। उसके समूल विनाश से ही सम्पूर्ण शक्तियों का समुदाय विनष्ट हो जायगा।२०। जिस प्रकार से सरोजिनी के कन्द के उच्छेदन करने पर जल में उसके दलों का विनाश हो जाया करता है। सबके पीछे ही जो एक बड़ा भासुर रथ चला करता है।२१।

दशयोजनसंपन्ननिजदेहसमुच्छ्रयः ।
महामुक्तातपत्रेण सर्वोर्द्ध्वं परिशोभितः ॥२२
वहन्मुहुर्वीज्यमानं चामराणां चतुष्टयम् ।
उत्तुंगकेतुसंघातलिखितांबुदमंडलः ॥२३
तस्मिन्न्थे समायाति सा दृष्टा हरिणेक्षणा ।
निभृतं संनिपत्य त्वं चिह्नानेन लक्षिताम् ॥२४
तां विजित्य दुराचारां केशेष्वाकृष्य मर्दय ।
पुरतश्चलिने सैन्ये सत्त्वशालिनि सा वधूः ॥२५
स्त्रीमात्ररक्षा भवतो वशमेष्यति सत्वरम् ।
भवत्सहायभूतायां सेनेन्द्राणामिहाभिधा ॥२६
शृणु यैर्भवतो युद्धे साह्यंकार्यमतन्द्रितैः ।
आद्यो मदनको नाम दीर्घजिह्वो द्वितीयकः ॥२७
हुवको हुलुमुलूश्च कवलसः कक्किवाहनः ।
थुक्लसः पुण्ड्रकेतुश्च चंडबाहुश्च कुक्कुरः ॥२८

वह रथ दशयोजन से सम्पन्न अपने कलेवर की ऊँचाई वाला है। सबके ऊपर एक छत्र पर रहा करता है जो बड़े-बड़े मुक्ताओं से विनिर्मित है और परिशोभित है ।२२। वह चार चमरों के द्वारा बार-बार वीज्यमान रहता है अर्थात् चार चमर उस पर ढुलाये जाया करते हैं। उस पर एक बहुत ऊँची ध्वजा टंगी रहा करती है जो अम्बुदों के मंडल तक पहुँचती है ।२३। ऐसे ही उस रथ पर वह हरिण के समान सुन्दर नेत्रों वाली आया करती है । तुम चुपचाप इसी चिह्न से उसको लक्षित कर लेना और उस पर धावा करके उस दुराचारिणी को जीतकर उसके केश खींचकर मर्दन करना। आगे सत्त्वशाली सेना चलने पर वह वधू स्त्रियों के ही द्वारा रक्षित है ।२४-२५। अतः आपके वश में शीघ्र ही आ जायगी। आपकी सहायता

३३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

करने वाले सेनानियों के ये नाम हैं ।२६। सुनिए, आपकी सहायता के कार्य में जो भी हैं वे पूर्ण सावधान होंगे । पहिला मदनक नामक है-दूसरा दीर्घ जिह्व है ।२७। हुबक-हुलु मुलु-कक्लस-कल्क वाहन-थुक्लस-पुण्ड्र- केतु चण्ड बाहु-कुक्कुर ये सब नामों वाले होंगे ।२८।

जम्बुकाक्षो जंभनश्च तीक्ष्णशृङ्गस्त्रिकंटकः । चन्द्रगुप्तश्च पंचेते दश चोक्ताश्चमूवराः ॥२९ एकैकाक्षौहिणीयुक्ताः प्रत्येकं भवता सह । आगमिष्यन्ति सेनान्यो दमनाद्या महाबलाः ॥३० परस्य कटकं नैव यथा जानाति ते गतिम् । तथा गुप्तसमाचारः पाष्णिग्राहं समाचर ॥३१ अस्मिन्कार्ये सुमहतां प्रौढिमानं समुद्वहन् । विषंग त्वं हि लभसे जयसिद्धिमनुत्तमाम् ॥३२ इति मंत्रितमंत्रोऽयं दुर्मंत्री भंडदानवः । विषंगं प्रेषयामास रक्षितं सैन्यपालकैः ॥३३ अथ श्रीललितादेव्याः पाष्णिग्राहकृतोद्यमे । युवराजानुजे दैत्ये सूर्योऽस्तगिरिमाययौ ॥३४ प्रथमे युद्धदिवसे व्यतीते लोकभीषणे । अंधकारः समभवत्तस्य बाह्यं चिकीर्षया ॥३५

जम्बुकाक्ष-जंभन-तीक्ष्णशृंग-त्रिकण्टक-और चन्द्रगुप्त ये पन्द्रह श्रेष्ठ सेनानी हैं ।२९। ये सब एक-एक अक्षौहिणी सेना से समन्वित होकर आपके साथ रहेंगे। महान बल वाले दमन प्रभृति भी सेनानी गण आयेंगे ।३०। तुम्हारी गति को शत्रु की सेना जिस तरह से न जान पावे उसी भाँति परम गुप्त समाचरण वाला होकर पाष्णिग्राह का समाचरण करो ।३१। इस कार्य में महान पुरुषों की प्रौढ़ता का उद्वहन करते हुए ही हे विषंग ! परम उत्तम जय सिद्धि को प्राप्त करोगे ।३२। दुर्मन्त्रणा वाले उस भंड ने इस तरह से ऐसी मन्त्रणा करते हुए सैन्य पालकों के द्वारा रक्षित करके विषंग को भेजा था ।३३। इसके अनन्तर श्री ललिता देवी के पाष्णिग्राह के उद्योग

विषंग पलायन वर्णन ] [ ३३६

में युवराजानुज दैत्य के होने पर सूर्य अस्ताचल पर चला गया था ॥३४॥ लोक भीषण प्रथम युद्ध के दिवस में पार्ष्णिग्राह के करने की इच्छा से उसको अन्धकार हो गया था ॥३५॥

महिषस्कंधधूम्राभ वनक्रोडवपुद्द्युति । नीलकण्ठनिभच्छायं निबिडं पप्रथे तमः ॥३६॥ कुञ्जेषु पिण्डितमिव प्रधावदिव सन्धिषु । उज्जिहानमिव क्षोणीविवरेभ्यः सहस्रशः ॥३७॥ निर्गच्छदिव शैलानां भूरि कन्दरमंदिरात् । क्वचिद्दीपप्रभा जाले कृतकातरचेष्टितम् ॥३८॥ दत्तावलंबनमिव स्त्रीणां कर्णोत्पलत्विषि । एकीभूतमिव प्रौढदिङ्नागमिव कज्जले । आबद्ध मैत्रकमिव स्फुरच्छाद्वलमंडले ॥३६॥ कृतप्रियाश्लेषमिव स्फुरंतीष्वसियष्टिषु । गुप्तप्रविष्टमिव च श्यामासु वनपंक्तिषु ॥४०॥ क्रमेण बहुलीभूतं प्रससार महत्तमः । त्रियामावामनयना नीलकंचुकरोचिषा ॥४१॥ तिमिरेणावृतं विश्वं न किंचित्प्रत्यपद्यत । असुराणां प्रदुष्टानां रात्रिरेव बलावहा ॥४२॥

अब उस अन्धकार के स्वरूप का वर्णन किया जाता है जो उस समय में वहाँ छाया हुआ था—वह अन्धकार महिष के स्कन्ध के तुल्य धूम्र आभा वाला था। उसकी कान्ति वन क्रोड़ के वपु सदृश थी—नीलकण्ठ पक्षी के समान उसकी कान्ति थी—ऐसा बहुत ही घना अन्धकार छा गया था ॥३६॥ वह तम कुञ्जों में पिण्डित सा हो रहा था तथा सन्धियों में दौड़ सी लगा रहा था वह अन्धकार सहस्रों भूमि के विवरों से बाहिर की ओर निकल सा रहा था ॥३७॥ पर्वतों की कन्दराओं से मानों वह अन्धकार बाहिर निकलकर आ रहा था। कहीं पर वह दीपों की प्रभा के जाल में कातर चेष्टित कर रहा था ॥३८॥ स्त्रियों के कानों के उत्पल की कान्ति में मानों उस तम ने

३४० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

समाभ्रम ग्रहण किया था। प्रौढ़ दिङ्नाग की भांति कज्जल में वह अन्धकार एकीभूत-सा हो रहा था और स्फुरित जाङ्गल के मंडल में मित्रता सी आबद्ध कर रहा था ।३६। स्फुरण करती हुई असियष्टियों में प्रिया के आश्लेष सा वह तम कर रहा था । श्याम वनों की पंक्तियों में गुप्त रूप से वह प्रविष्ट-सा हो रहा था । वह अन्धेरी रात्रि सुन्दर नेत्रों वाली रमणी है जो अपनी नीली कंचुकी की कान्ति से समन्वित है । ऐसे अन्धकार से सम्पूर्ण विश्व समावृत हो गया था और कुछ भी सूझ नहीं रहा था । पूरे दुष्ट असुरों को तो रात्रि ही बल देने वाली हुआ करती है ।४१-४२।

तेषां मायाविलासोऽयं तस्यामेव हि वर्धते । अथ प्रचलितं सैन्यं विषंगेण महौजसा ॥४३॥ धौतखड्गलताच्छायावर्धिष्णु तिमिरच्छटम् । दमनाद्याश्च सेनान्यः श्यामकंकटधारिणः ॥४४॥ श्यामोष्णीषधराः श्यामवर्णसर्वपरिच्छदाः । एकत्वमिव संप्राप्तास्तिमिरेणातिभूयसा ॥४५॥ विषंगमनुसंचेरुः कृताग्रजनमस्कृतिम् । कूटेन युद्धकृत्येन विजिगीषुर्महेश्वरीम् ॥४६॥ मेघडंबरकं नाम दधे वक्षसि कंकटम् । यथा तस्य निशायुद्धानुरूपो वेषसंग्रहः ॥४७॥ तथा कृतवती सेना श्यामलं कंचुकादिकम् । न च दुंदुभिनिस्वानो न च मर्दलगर्जितम् ॥४८॥ पणवानकभेरीणां न च घोषविजृंभणम् । गुप्ताचाराः प्रचलितास्तिमिरेण समावृताः ॥४९॥

उन असुरों का यह माया का विलास उस अँधेरी रात्रि में ही बढ़ा करता है । इसके उपरान्त महान् ओज वाले विषंग के साथ सेना रवाना हुई थी ।४३। दमन प्रभृति सेनानीगण श्याम कङ्कट के धारण करने वाले हैं और अन्धकार की छटा धौत खड्ग की कान्ति को बढ़ाने वाला था ।४४। वे सब श्याम पगड़ी के धारण करने वाले थे और उनके समस्त परिच्छद भी श्याम वर्ण के ही थे । अत्यधिक अन्धकार से आवृत्त हुए वे सब एकता को