भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३३२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

द्वारा इन महान सात असुरों को निहत हुआ सुनकर ललिता देवी बहुत ही प्रसन्नता को प्राप्त होंगी ।८६। आपके द्वारा ऐसा करने पर दण्डिनी देवी भी प्रीति को प्राप्त हो जायगी और महाभागा मन्त्रिणी देवी भी बहुत अधिक सन्तोष को प्राप्त हो जायगी ।६०। इस कारण से अब आप ही इन सातों का युद्धाङ्गण में वध कीजिए । इनकी जो सम्पूर्ण सेना है उसको आयुध ग्रहण कर हम विनष्ट कर देती हैं ।६१।

इत्युक्त्वा प्रेरिता ताभिः शक्तिभियुद्ध कौतुकात् । तमोलिप्तेन यानेन बलाहकबलं ययौ ॥६२॥ तामायांतीं समावेक्ष्य ते सप्ताथ सुराधमाः । पुनरेव च सावित्रं वरं सस्मरुरंजसा ॥६३॥ प्रविष्टमपि सावित्रं नाशकं तन्निरोधने । तिरस्कृतं तु नेत्रस्थं तिरस्करणितेजसा ॥६४॥ वरदानास्त्ररोषांधं महाबलपराक्रमम् । अस्त्रेण च रुषा चांधं बलाहकमहासुरम् । आकृष्य केशेष्वसिना चकर्तातर्धिदेवता ॥६५॥ तस्य वाहनगृध्रस्य लुनाना पत्रिणा शिरः । सूचीमुखस्याभिमुखं तिरस्कर णिकाव्रजत् ॥६६॥ तस्य पट्टिशपातेन विलूय कठिनं शिरः । अन्येषामाप पञ्चानां पञ्चत्वमकरोच्छनैः ॥६७ तैः सप्तदैत्यमुण्डैश्च ग्रथितान्योन्यकेशकैः । हारदाम गले कृत्वा ननादांतधिदेवता ॥६८

इस प्रकार से कहे जाने पर उन शक्तियों के द्वारा प्रेरित हुई उस तिरस्करिणी देवी ने युद्ध कौतुक से तमोलिप्त यान के द्वारा बलाहक की सेना में गमन किया था ।६२। उस देवी को आती हुई देखकर उन सातों अधम असुरों ने फिर भी उसी सूर्य देव के दिये हुए वरदान का तुरन्त ही स्मरण किया था ।६३। वह सावित्र वरदान प्रविष्ट भी हुआ था जो कि उसके निरोध का विनाशक था किन्तु तिरस्करणी के तेज से वह भी तिरस्कृत हो गया था ।६४। वरदानास्त्र के रोष से अन्धा तथा महान बल और पराक्रम