भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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वलाहकादि सप्त सेनापति वध वर्णन ] [ ३३१

।८१। तिरस्करिणी अम्बा के मोहनास्त्र धनुष से निकले हुए बाण के द्वारा उनके नेत्र बन्द हो गये थे ।८२। अन्धे बनाये गये वे सातों वहाँ पर कुछ भी नहीं देख पाते थे । उनके न देखने से वह शस्त्र का स्तम्भन भी क्षीण हो गया था ।८३। करों में आयुध लिये हुए उन्होंने फिर सिंहनाद करके दैत्यों के हनन करने की इच्छा से युद्ध किया था ।८४।

तिरस्करणितां देवीमग्रे कृत्वा महाबलाम् ।
तदुपायप्रसङ्गेन भृशं तुष्टा रणं व्यधुः ॥८५
साधुसाधु महाभागे तिरस्करिणिकांबिके ।
स्थाने कृततिरस्कारा द्विषामेषां दुरात्मनाम् ॥८६
त्वं हि दुर्जननेत्राणां तिरस्कारमहौषधी ।
त्वया बद्धदृशानेन दैत्यचक्रेण भूयते ॥८७
देवकार्यमिदं देवि त्वया सम्यगनुष्ठितम् ।
अस्मादृशामजय्येषु यदेषु व्यसनं कृतम् ॥८८
तत्त्वयैव दुराचारानेतान्सप्त महासुरान् ।
निहतांल्ललिता श्रुत्वा सन्तोषं परमाप्स्यति ॥८९
एवं त्वया विरचिते दण्डिनीप्रीतिमाप्स्यति ।
मंत्रिण्यपि महाभागा यास्यत्येव परां मुदम् ॥९०
तस्मात्त्वमेव सप्तेतान्निगृहाण रणाजिरे ।
एषां सैन्यं तु निखिलं नाशयाम उदायुधाः ॥९१

उन शक्तियों ने महान् बल वाली उस तिरस्करणी देवी को अपने आगे करके उसके अन्धीकरण के उपाय के प्रसङ्ग से बहुत ही प्रसन्न होकर युद्ध किया था ।८५। वे सभी शक्तियां यह कह रही थीं—हे तिरस्कारिणि ! अम्बिके ! हे महाभागे ! बहुत ही अच्छा किया । दुरात्मा इन शत्रुओं को आपने जो तिरस्कार किया है वह बहुत ही उचित किया है ।८६। आप ही इन दुष्टों के नेत्रों के तिरस्कार करने की महौषध हैं। आपके द्वारा दृष्टि के बन्द होने ही से यह दैत्यों का चक्र पराभूत हो रहा है ।८७। हे देवि ! यह तो देवकार्य है जो आपने भलीभांति किया है। हम जैसी शक्तियों के द्वारा अजेय इनमें जो आपने यह व्यसन उत्पन्न कर दिया है ।८८। अब आपके ही