भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३३० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

णिका देवी उस रण स्थल में समुत्थित हो गयी थी ॥७४॥ तमोलिप्त नामक सर्वतोमुख विमान पर महामाया ने समारूढ होकर शक्तियों के भय को दूर किया था ॥७५॥ वह रथ श्याम कान्ति वाला था-तम से लिप्त और श्याम तुरङ्गमों वाला था। उस पर तमाल के समान श्यामल आकार वाली तथा श्याम कञ्चु की को धारण करने वाली विराजमान थी ॥७६॥ वासन्ती मोहन की अभिख्या वाले धनुष को ग्रहण करके ध्वनि के साथ सिंहनाद करके सर्पों के सदृश वाणों की वर्षा उस देवी ने की थी ॥७७॥

कृष्णरूपभुजङ्गभानधोमुसलसंनिभाम् । मोहनास्त्रविनिष्ठ्यूतान्बाणान्दैत्या न सेहिरे ॥७८ इतस्ततो मदर्यमाना महामायाशिलीमुखैः । प्रकोपं परमं प्राप्ता बलाहकमुखाः खलाः ॥७९ अथो तिरस्करण्यांबा दण्डनाथानिदेशतः । अन्धाभिधं महास्त्रं सा मुमोच द्विषतां गणे ॥८० बलाहकाद्यास्ते सप्त दिननाथवरोद्धताः । अन्धास्त्रेण निजं नेत्रं दधिरे च्छादितं यथा ॥८१ तिरस्करणि कादेव्या महामोहनधन्वनः । उद्गतेनांधबाणेन चक्षुस्तेषां व्यधीयत: ॥८२ अन्धीकृताश्च ते सप्त न तु प्रैक्षन्त किञ्चन । तद्वीक्षणस्य विरहाच्छस्तम्भः क्षयं गतः ॥८३ पुनः ससिंहनादं ताः प्रोद्यतायुधपाणयः । चक्रुः समरसन्नाहं दैत्यानां प्रजिघांसया ॥८४

वे दैत्यगण कृष्ण स्वरूप से संयुत भुजङ्गों के समान तथा मूसल के सदृश मोहनास्त्र से निकाले गये वाणों को सहन न कर सके थे ।७८। इधर-उधर महामाया के बाणों से मर्दित होते हुए वे खल जिनमें बेलाहक प्रधान था परमाधिक प्रकोप को प्राप्त हो गये थे ।७९। अनन्तर में दण्डनाथा के आदेश से तिरस्करिणी अम्बा ने शत्रुओं के युद्ध में अन्धनामक महास्त्र को छोड़ा था ।८०। सूर्य देव के वर से बड़े ही उद्धत हुए वे बलाहक आदि सातों दैत्य उस अन्धास्त्र से अपने नेत्रों को छादित हुए ही धारण किये हुए थे ।