भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 739

वलाहकादि सप्त सेनापति वध वर्णन ] [ ३२६

अर्थात् शक्तियाँ कुछ भी न कर सकीं थीं ।६८। उद्यम किये जाने पर भी उसका कुछ भी प्रभाव नहीं हुआ था क्योंकि बड़ा भारी शस्त्रों का स्तम्भन था । इस विष्टम्भ से अभिभूत हुई शक्तियों को चुप ही रहना पड़ा था। ।६६। फिर दिवस के होने पर वे सब अनेक आयुधों से संयुत होकर अपने स्वामी की आज्ञा से समन्वित होते हुए दैत्यों ने शक्तियों की सेना का विमर्दन किया था ।७०।

शक्तयस्तास्तु सैन्येन निर्व्यापारा निरायुधाः ।
अक्षुभ्यंत शरैस्तेषां वज्रकङ्कटभेदिभिः ॥७१
शक्तयो दैत्यशस्त्रौधैर्विद्धगात्राः सृतासृजः ।
सुपल्लवा रणे रेजुः कङ्कोललतिका इव ॥७२
हाहाकारं वितन्वत्यः प्रपन्ना ललितेश्वरीम् ।
चुक्रुशुः शक्तयः सर्वास्तैः स्तंभितनिजायुधाः ॥७३
अथ देव्याज्ञया दण्डनाथा प्रत्यङ्गरक्षिणी ।
तिरस्करिणिका देवी समुत्तस्थौ रणाजिरे ॥७४
तमोलिप्ताह्वयं नाम विमानं सर्वतोमुखम् ।
महामाया समारुह्य शक्तीनामभयं व्यधात् ॥७५
तमालश्यामलाकारा श्यामकंचुकधारिणी ।
श्यामच्छाये तमोलिप्ते श्यामयुक्तुरङ्गमे ॥७६
वासन्ती मोहनाभिधयं धनुरादाय सस्वनम् ।
सिंहनादं विनद्येषूनवर्षत्स्र्पसन्निभान् ॥७७

वे शक्तियां तो उस समय में शत्रु की सेना के द्वारा निरायुध और निर्व्यापार वाली हो गयीं थीं तथा उन दैत्यों के वज्र कङ्कट भेदी शरों के द्वारा क्षुब्ध हो गयी थीं ।७१। दैत्यों के शस्त्रों के समुदायों से विद्ध शरीरों वाली हो गयी थीं और उनके शरीरों से रुधिर बह रहा था । वे रण में सुन्दर पत्तों वाली कङ्कोल लताओं की भाँति शोभित हो रही थीं ।७२। वे समस्त शक्तियां हाहाकार करती हुई ललिता देवी की शरण में गयी थीं । ये सभी शक्तियां दैत्यों के द्वारा स्तम्भित शस्त्रों वाली होकर रोने लगीं थीं ।७३। इसके अनन्तर देवी की आज्ञा से प्रत्यङ्गरङ्गिणी दण्डनाथा तिरस्कर-

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