संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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हमारे नेत्रों में और कुक्षियों में आकर विराजमान होवें जिससे शत्रुओं को घोर तेजसे दाह होजावे । हे प्रभो ! जब आप तपते हुए हमारी आँखों में सन्निधान करेंगे तो उससे हम जिसको भी देखें वही निश्चेष्ट हो जावे ।६२-६३।
त्वत्सान्निध्यसमिद्धेन नेत्रेणास्माकमीक्षिताः ।
स्तब्धशस्त्रा भविष्यन्ति तिरोधकसैनिकाः ॥६३
ततः स्तब्धेषु शस्त्रेषु वीक्षणादेव नः प्रभो ।
निश्चेष्टा रिपवोऽस्माभिर्हन्तव्याः सुकरस्त्वतः ॥६५
इति पूर्वं वरः प्राप्तः कैकसेयैर्दिवाकरात् ।
वरदानेन ते तत्र युद्धे चेरुर्मदोद्धताः ॥६६
अथ सूर्यसमाविष्टनेत्रैस्तैस्तु निरीक्षिताः ।
शक्तयः स्तब्धशस्त्रौघा विफलोत्साहतां गताः ॥६७
कीकसातनयैस्तैस्तु सप्तभिः सत्वशालिभिः ।
विष्टम्भितास्त्रशस्त्राणां शक्तीनां नोद्यमोऽभवत् ॥६८
उद्यमे क्रियमाणेऽपि शस्त्रस्तम्भेन भूयसा ।
अभिभूताः सनिश्चासं शक्तयो जोषमासत ॥६९
अथ ते वासरं प्राप्य नानाप्रहरणोद्यताः ।
व्यमर्दयञ्छक्तिसैन्यं दैत्याः स्वस्वामिदेशिताः ॥७०
विपक्ष के योद्धा आपके सन्निधान वाले हमारे नेत्रों से देखे गये होने पर स्तब्ध शस्त्रों वाले हो जांयगे ।६४। हे प्रभो ! फिर जब सभी शस्त्र स्तब्ध होंगे और हमारे देखने मात्र से ही अवरुद्ध हो जांयगे तो फिर निश्चेष्ट शत्रु हमारे द्वारा आसानी से मारे जाने के योग्य हो जांयगे ।६५। यह पूर्व में ही वर प्राप्त किया था और कैकसेयों ने सूर्य देव से ही ऐसा वर-दान पा लिया था । इसी वरदान से मदोद्धत वे उस युद्ध में गये थे ।६६। इसके उपरान्त सभी शक्तियाँ सूर्य के समाविष्ट नेत्रों द्वारा देखी गयी थी और स्तब्ध शास्त्रों वाली होकर उत्साह हीन हो गयीं थीं ।६७। कीकसा के पुत्र सातों के द्वारा जो कि बड़े ही सत्व थे शक्तियों की सेनाओं के शस्त्रास्त्र विष्टम्भित कर दिये गये थे और उनका कुछ भी उद्यम नहीं हुआ था ।