भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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वलाहकादि सप्त सेनापति वध वर्णन ] [ ३२७

योजन तक आयत था वह बेताल क्रूर नेत्रों वाला था । इस वेताल की भी सिद्धि श्मशान की भूमि में समवस्थित होकर की थी और मन्त्र का जाप कर के ही की थी ॥५६॥

मर्दयामास पृतनां शक्तीनां तेन देशितः ।
तस्य बेतालवर्यस्य वर्तमानोंससीमनि ।
बहुधायुध्यत तदा शक्तिभिः सह दानवः ॥५७
एवमेते खलात्मानः सप्तसप्तार्णवोपमाः ।
शक्तीनां सैनिकं तत्र व्याकुलीचक्रुरुद्धताः ॥५८
ते सप्त पूर्वं तपसा सवितारमतोषयन् ।
तेन दत्तो वरस्तेषां तपस्तुष्टेन भास्वता ॥५९
कैकसेया महाभागा भवतां तपसाधुना ।
परितुष्टोऽस्मि भद्रं वो भवन्तो वृणुतां वरम् ॥६०
इत्युक्ते दिननाथेन कैकसेयास्तपःकृशाः ।
प्रार्थयामासुरत्यर्थं दुर्दान्तं वरमीदृशम् ॥६१
रणेषु सन्निधातव्यमस्माकं नेत्रकुक्षिषु ।
भवता घोरतेजोभिर्दहता प्रतिरोधिनः ॥६२
त्वया यदा सन्निहितं तपन्नास्माकमक्षिषु ।
तदाक्षिविषयः सर्वो निष्चेष्टो भवतात्प्रभो ॥६३

उसके द्वारा आदेशित होकर उसने शक्ति की सेना का मर्दन किया था । उस वेताल की सीमा में वर्त्तमान दानव ने शक्ति की सेना के साथ अनेक प्रकार से युद्ध किया था ॥५७॥ इस प्रकार से महान् खल सात सागरों के समान उन सातों ने जो बहुत ही उद्धत थे शक्ति की सेनाओं को व्याकुल कर दिया था ॥५८॥ उन सातों ने पहिले तप के द्वारा सविता को प्रसन्न कर लिया था । तपस्या से प्रसन्न होकर सविता ने उनको वरदान दिया था । ॥५९॥ हे कैकसेयो ! आप महान् भाग वाले हैं अब मैं आपके तप से प्रसन्न हो गया हूँ । आपका कल्याण होगा । आप लोग कोई भी वरदान माँग लो ॥६०॥ सूर्य देव के द्वारा इस भाँति कहने पर तप से अतिकृश हुए उन कैकसेयों ने अत्यन्त दुर्दान्त ऐसा वरदान माँगा था ॥६१॥ आप युद्ध स्थल में

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