भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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पृष्ठ 743

बलाहकादि सप्त सेनापति वध वर्णन ] [ ३३३

वाला वह असुर था। अस्त्र से और रोष से अन्धे उस महासुर बलाहक के केशों को पकड़ कर उस देवी ने अपनी ओर खींच लिया था और अन्धे बना देने वाली देवी ने उसका शिर तलवार से काट डाला था। ६५। उसका जो वाहन गिद्ध था उसका भी शिर पत्री के द्वारा काटकर वह तिरस्कारिणी देवी सूची मुख के सामने गयी थी। ६६। उसके शिर को पट्टिश के प्रहार से काट डाला था और शेष जो पांच रहे थे उनके भी सबके शिर धीरे-धीरे उस देवी ने काटकर मौत के घाट सबको उतार दिया था । ६७। उन सातों असुरों के मुण्ड परस्पर में केशों के द्वारा बँधे हुए थे। उनका एक हार सा बनाकर गले में डालकर तिरस्करिणी देवी गर्जना कर रही थी । ६८।

मस्तमपि तत्सैन्यं शक्तयः क्रोधमूर्च्छिताः ।
हत्वा तद्रक्तसलिलैर्बह्वीः प्रावाहयन्नदीः ॥६६॥

तत्राश्चर्यमभूद्भूरि महामायांबिकाकृतम् ।
बलाहकादिसेनान्यां दृष्टिरोधनवैभवात् ॥१००॥

हृतशिष्यः कतिपयाबहु वित्रासन्सऽकुलाः ।
शरणं जग्मुरत्यार्त्ताः क्रन्दंतं शून्यकेश्वरम् ॥१०१॥

दंडिनीं च महामायां प्रशंसन्ति मुहुर्मुहुः ।
प्रसादमपरं चक्षुस्तस्या आदाय पिप्रियुः ॥१०२॥

साधुसाध्विति तत्रस्थाः शक्तयः कम्पमौल्यः ।
तिरस्करणि कां देवीमश्लाघंत पदे पदे ॥१०३

क्रोध से मूर्च्छित उन शक्तियों ने उन असुरों की सम्पूर्ण सेना का हनन कर दिया था तथा उनके रुधिर की बहुत से नदियों को प्रवाहित कर दिया था। ६६। बलाहक आदि बड़े-बड़े सेनानियों की दृष्टि के रोधन करने के वैभव से जो कि महामाया अम्बिका के द्वारा किया गया था वहाँ पर उस समय में बड़ा आश्चर्य हो गया था। १००। मरने से जो भी कुछ बच गये थे वे सब बहुत ही भयभीत होकर असुर बहुत आर्त होकर शून्यकेश्वर की शरण में रुदन करते हुए पहुँच गये थे और वे महामाया दण्डिनी की बारम्बार प्रशंसा कर रहे थे और उसकी दूसरी प्रसन्नता से चक्षु प्राप्त करके वे प्रसन्न भी हुए थे । १०१-१०२। वहाँ पर जो शक्तियाँ थीं उनने बहुत अच्छा हुआ—यह कहकर अपना शिर हिलाते हुए पद-पद पर तिरस्करिणी देवी की श्लाघा की थी । १०३।

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