भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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विषंग पलायन वर्णन ] [ ३३६

में युवराजानुज दैत्य के होने पर सूर्य अस्ताचल पर चला गया था ॥३४॥ लोक भीषण प्रथम युद्ध के दिवस में पार्ष्णिग्राह के करने की इच्छा से उसको अन्धकार हो गया था ॥३५॥

महिषस्कंधधूम्राभ वनक्रोडवपुद्द्युति । नीलकण्ठनिभच्छायं निबिडं पप्रथे तमः ॥३६॥ कुञ्जेषु पिण्डितमिव प्रधावदिव सन्धिषु । उज्जिहानमिव क्षोणीविवरेभ्यः सहस्रशः ॥३७॥ निर्गच्छदिव शैलानां भूरि कन्दरमंदिरात् । क्वचिद्दीपप्रभा जाले कृतकातरचेष्टितम् ॥३८॥ दत्तावलंबनमिव स्त्रीणां कर्णोत्पलत्विषि । एकीभूतमिव प्रौढदिङ्नागमिव कज्जले । आबद्ध मैत्रकमिव स्फुरच्छाद्वलमंडले ॥३६॥ कृतप्रियाश्लेषमिव स्फुरंतीष्वसियष्टिषु । गुप्तप्रविष्टमिव च श्यामासु वनपंक्तिषु ॥४०॥ क्रमेण बहुलीभूतं प्रससार महत्तमः । त्रियामावामनयना नीलकंचुकरोचिषा ॥४१॥ तिमिरेणावृतं विश्वं न किंचित्प्रत्यपद्यत । असुराणां प्रदुष्टानां रात्रिरेव बलावहा ॥४२॥

अब उस अन्धकार के स्वरूप का वर्णन किया जाता है जो उस समय में वहाँ छाया हुआ था—वह अन्धकार महिष के स्कन्ध के तुल्य धूम्र आभा वाला था। उसकी कान्ति वन क्रोड़ के वपु सदृश थी—नीलकण्ठ पक्षी के समान उसकी कान्ति थी—ऐसा बहुत ही घना अन्धकार छा गया था ॥३६॥ वह तम कुञ्जों में पिण्डित सा हो रहा था तथा सन्धियों में दौड़ सी लगा रहा था वह अन्धकार सहस्रों भूमि के विवरों से बाहिर की ओर निकल सा रहा था ॥३७॥ पर्वतों की कन्दराओं से मानों वह अन्धकार बाहिर निकलकर आ रहा था। कहीं पर वह दीपों की प्रभा के जाल में कातर चेष्टित कर रहा था ॥३८॥ स्त्रियों के कानों के उत्पल की कान्ति में मानों उस तम ने