संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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समाभ्रम ग्रहण किया था। प्रौढ़ दिङ्नाग की भांति कज्जल में वह अन्धकार एकीभूत-सा हो रहा था और स्फुरित जाङ्गल के मंडल में मित्रता सी आबद्ध कर रहा था ।३६। स्फुरण करती हुई असियष्टियों में प्रिया के आश्लेष सा वह तम कर रहा था । श्याम वनों की पंक्तियों में गुप्त रूप से वह प्रविष्ट-सा हो रहा था । वह अन्धेरी रात्रि सुन्दर नेत्रों वाली रमणी है जो अपनी नीली कंचुकी की कान्ति से समन्वित है । ऐसे अन्धकार से सम्पूर्ण विश्व समावृत हो गया था और कुछ भी सूझ नहीं रहा था । पूरे दुष्ट असुरों को तो रात्रि ही बल देने वाली हुआ करती है ।४१-४२।
तेषां मायाविलासोऽयं तस्यामेव हि वर्धते । अथ प्रचलितं सैन्यं विषंगेण महौजसा ॥४३॥ धौतखड्गलताच्छायावर्धिष्णु तिमिरच्छटम् । दमनाद्याश्च सेनान्यः श्यामकंकटधारिणः ॥४४॥ श्यामोष्णीषधराः श्यामवर्णसर्वपरिच्छदाः । एकत्वमिव संप्राप्तास्तिमिरेणातिभूयसा ॥४५॥ विषंगमनुसंचेरुः कृताग्रजनमस्कृतिम् । कूटेन युद्धकृत्येन विजिगीषुर्महेश्वरीम् ॥४६॥ मेघडंबरकं नाम दधे वक्षसि कंकटम् । यथा तस्य निशायुद्धानुरूपो वेषसंग्रहः ॥४७॥ तथा कृतवती सेना श्यामलं कंचुकादिकम् । न च दुंदुभिनिस्वानो न च मर्दलगर्जितम् ॥४८॥ पणवानकभेरीणां न च घोषविजृंभणम् । गुप्ताचाराः प्रचलितास्तिमिरेण समावृताः ॥४९॥
उन असुरों का यह माया का विलास उस अँधेरी रात्रि में ही बढ़ा करता है । इसके उपरान्त महान् ओज वाले विषंग के साथ सेना रवाना हुई थी ।४३। दमन प्रभृति सेनानीगण श्याम कङ्कट के धारण करने वाले हैं और अन्धकार की छटा धौत खड्ग की कान्ति को बढ़ाने वाला था ।४४। वे सब श्याम पगड़ी के धारण करने वाले थे और उनके समस्त परिच्छद भी श्याम वर्ण के ही थे । अत्यधिक अन्धकार से आवृत्त हुए वे सब एकता को