संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषंग पलायन वर्णन ] [ ३४१
प्राप्त जैसे हो गये थे॥४५॥ अपने बड़े भाई को नमस्कार करने वाले विषंग के पीछे चल दिये थे। वह विषंग कूट युद्ध के द्वारा महेश्वरी के जीतने की इच्छा वाला था॥४६॥ उसने मेघडम्बर नाम वाले कङ्कट को वक्षः स्थल पर धारण किया था। उसके वेष का संग्रह भी निशा के युद्ध के ही अनुरूप था ॥४७॥ उसी भाँति से सेना ने भी श्याम वर्ण के कंचुक आदि धारण किये थे। उस समय में न तो किसी दुन्दुभि का घोष था और न कोई मर्दल की ही गर्जना थी ॥४८॥ प्रणव-आनक और भेरियों की भी उस समय में ध्वनि नहीं हुई थी। वे सबके सब गुप्त समाचरण वाले आकार से समावृत होते हुए रवाना हुए थे ॥४९॥
परैरदृश्यगतयो विष्कोशीकृतरिष्टयः ।
पश्चिमाभिमुखं यांति ललितायाः पताकिनीम् ॥५०॥
आवृतोत्तरमार्गेण पूर्वभागमशिश्रियन् ।
निश्वासमपि सस्वानमकुर्वंतः पदे पदे ॥५१॥
सावधानाः प्रचलिताः पाष्णिग्राहाय दानवाः ।
भूयः पुरस्य दिग्भागं गत्वा मन्दपराक्रमाः ॥५२॥
ललितासैन्यमेव स्वान्सूचयंत प्रपृच्छतः ।
आगत्य निभृतं पृष्ठे कवचच्छन्नविग्रहाः ॥५३॥
चक्रराजरथं तुंगं मेरुमंदरसंनिभम् ।
अपश्यन्नतिदीप्ताभिः शक्तिभिः परिवारितम् ॥५४॥
तत्र मुक्तातपत्रस्य वर्त्तमानामधः स्थले ।
सहस्रादित्यसंकाशां पश्चिमामुखीं स्थिताम् ॥५५॥
कामेश्वर्यादिनित्याभिः स्वसमानसमृद्धिभिः ।
नर्मालापविनोदेन सेव्यमानां रथोत्तमे ॥५६॥
ये सब ऐसे वहां से चले थे कि दूसरों के द्वारा न देखे जावें। इन्होंने रिष्टियों को म्यानों से निकाल लिया था। ललिता की सेना के पश्चिम की ओर मुह करके ही ये गमन कर रहे थे ॥५०॥ आवृत उत्तर मार्ग से इन्होंने पूर्व भाग का समाश्रय ग्रहण किया था। ये पद-पद पर अपने निःश्वासों की ध्वनि को भी चलने में नहीं कर रहे थे ॥५१॥ दानवगण बहुत