संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 752, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ें३४२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
ही सावधान होकर पाणिग्राह के लिए चल दिये थे । फिर पुर के दिग्भाग में जाकर मन्द पराक्रम वाले हो गये थे ।५२। ललिता देवी की सेना भी अपने लोगों को सूचना दे रही थी । वे कवचों से ढके हुए शरीरों वाले पीछे की ओर चुपचाप आ गये थे ।५३। और उन्होंने ऊँचे तथा मेरु गिरि के समान चक्रराज रथ को देखा था जो अत्यधिक प्रदीप्त शक्तियों से परिवारित था ।५४। वहाँ पर मुक्ता निर्मित आतपत्र (छत्र) के नीचे वह देवी विराजमान थी । सहस्रों सूर्यों के सदृश कान्ति वाली और पश्चिम की मुख किये हुए स्थित थीं ।५५। उस उत्तम रथ में अपने ही समान समृद्धि से संयुत कामेश्वरी आदि नित्याओं के साथ नर्म आलाप के विनोद से सेव्यमान हो रहीं थी ।५६।
तां तथाभूतवृत्तांतामतादृशरणोद्यमाम् । पुरोगतं महत्सैन्यं वीक्षमाणं सकौतुकम् ॥५७॥ मन्वानश्च हि तामेव विषंगः सुदुराजयः । पृष्ठवंशे रथेंद्रस्य घट्टयामास सैनिकैः ॥५८॥ तत्राणिमादिशक्तीनां परिवारवरूथिनी । महाकलकलं चक्रुरणिमाद्याः परः शतम् ॥५९॥ पट्टिशैर्द्रुघणैश्चैव भिदिपालैर्भुशुण्डिभिः । कठोरवज्रनिर्घातनिष्ठुरैः शक्तिमंडलैः ॥६०॥ मर्दयंतो महासत्त्वाः समयं बहुमेनिरे । आकस्मिकरणोत्साहविपर्याविष्टविग्रहम् ॥६१॥ अकांडक्षुभितं चासीद्रथस्थं शक्तिमंडलम् । विपाटैः पाटयामासुरदृश्यैरंधकारिणः ॥६२॥ ततश्चक्ररथेंद्रस्य नवमे पर्वणि स्थिताः । अदृश्यमानशस्त्राणामदृश्यनिजवर्मणाम् ॥६३॥ तिमिरच्छन्नरूपाणां दानवानां शिलीमुखैः । इतस्ततो बहु क्लिष्टं छन्नवर्मितमर्मवत् ॥६४॥