भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३३६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

।१। इसलिए उसके मूल का उच्छेदन करने के लिए कोई यत्न करना ही चाहिए। मैंने दूतों के मुख से सुना है कि उसकी वृत्ति महा बलवती है ।२। वह सब सेना के वह पीछे ही रहती है और उसके आगे हाथी-घोड़े और सेनाएं सब चला करती हैं ।३। अब इसी अवसर पर उसका पाष्णिग्राह करो। इस पाष्णिग्राह में अर्थात् पीछे पहुँचकर उसको पकड़ने में विषङ्ग बहुत कुशल है ।४।

तेन प्रोढमदोन्मत्ता बहुसंग्रामदुर्मदाः ।
दश पञ्च च सेनान्यः सह यांतु युयुत्सया ॥१५
पृष्ठतः परिवारास्तु न तथा सन्ति ते पुनः ।
अल्पैस्तु रक्षिता वै स्यात्तेनेवासौ सुनिग्रहा ॥१६
अतस्त्वं बहुसन्नाहमाविधाय मदोत्कटः ।
विषंग गुप्तरूपेण पाष्णिग्राहं समाचर ॥१७
अल्पीयसी त्वया सार्द्धं सेना गच्छतु विक्रमात् ।
सज्जाश्चलंतु सेनान्यो दिक्पालविजयोद्धताः ॥१८
अक्षौहिण्यश्च सेनानां दश पञ्च चलंतु ते ।
त्वं गुप्तवेषस्तां दुष्टां सन्निपत्य दृढं जहि ॥१९
सैव निःशेषशक्तीनां मूलभूता महीयसी ।
तस्याः समूलनाशेन शक्तिवृन्दं विनश्यति ॥२०
कंदच्छेदे सरोजिन्या दलजालमिवाम्भसि ।
सर्वेषामेव पश्चाद्यो रथश्चलति भासुरः ॥२१

उस विषंग के साथ युद्ध करने की इच्छा से बड़े प्रौढ़ और मदोन्मत्त दश पाँच सेनानी भी जावें ।१५। उनके पीछे की ओर कोई परिवार नहीं है। वह बहुत थोड़े से सैनिकों के द्वारा रक्षित है अतः सबका निग्रह आसान है ।१६। इसीलिए मदोत्कट तुम बहुत संग्राम न करके गुप्त रूप से विषंग को समाचरण करो ।१७। आपके साथ बहुत थोड़ी सेना जावे और सेनानी सज्जित होकर चलें जो विक्रम से दिक्पालों के भी विजय करने से उद्धत हैं ।१८। पन्द्रह अक्षौहिणी सेनाएं भी जावें और तुम गुप्त वेष वाले होकर दुष्टा उसको मार डालो ।१९। वह ही सम्पूर्ण शक्तियों की बहुत बड़ी मूल