भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 732

३२२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

मायापरिग्रहैदूरं मोहयंत्यो जडाशयान् ॥ २४ नेष्यामो भवतीरद्य प्रेतनाथनिकेतनम् । इति शक्तीर्भर्त्सयंतो दानवाश्चक्रुराहवम् ॥ २५ काचिच्चच्छेद दैत्येंद्रं कण्ठे पट्टिशपातनात् । तद्गलोद्गलितो रक्तपूर ऊर्ध्वमुखोऽभवत् ॥ २६ तत्र लग्ना बहुतरा गृध्रा मंडलतां गताः । तैरेव प्रेतनाथस्य च्छत्रच्छविरुदंचिता ॥ २७ काचिच्छक्तिः सुराराति मुक्तशक्त्यायुधं रणे । लूनतच्छक्तिनैकेन बाणेन व्यलुनीत च ॥ २८

हे मुने ! उनमें कुछ तो पाशधारिणी थीं—कुछ मुसलों को ग्रहण किये थीं—दूसरी चक्र धारिणी थीं—कुछ के पास मुद्गर थे तो कुछ पट्टिश लिये थीं तथा कुछ धनुष ग्रहण किये थीं ।२२। ललिता की सेना में संगत अनेक प्रकार की शक्तियाँ थीं । वे सहस्रों की संख्या में वहां पर समापतित हो गयीं थी मानो दैत्यों के सागरों का पान ही कर रही थी ।२३। दैत्यगण कह रहे थे—हे दुष्टाओ ! तुम नारियों में महान अधम हो—आओ ! तुम पापिनी हो । जो जड़ आशयों वाले हैं उनको ही तुम लोग अपनी माया के परिग्रहों से मोहित कर लिया करती हो ।२४। आज तो हम लोग तुम सबको यमराज के घर पर पहुँचा देंगे । हमारे पास ऐसे अत्यन्त भीषण बाण हैं जो फूत्कार मारते हुए भुजंगों के ही तुल्य हैं उन्हीं से तुम मृत्यु प्राप्त करोगी । इस तरह से शक्तियों को भर्त्सना देते हुए ही उन दानवों ने युद्ध किया था ।२५। किसी शक्ति ने दैत्येन्द्र के कण्ठ को पट्टिश के प्रहार से काट दिया था । काटने से जो उसके कण्ठ से रुधिर निकला था वह ऊपर की ओर गया था ।२६। वहाँ पर बहुत से गिद्ध लगे हुए थे जिन्होंने एक मण्डल सा बना लिया था । उन्हीं के द्वारा यमराज का एक छत्र सा बन गया था ।२७। किसी शक्ति ने रण में मुक्त शक्त्यायुध दैत्य को एक ही बाण के द्वारा काट दिया था ।२८।

एका तु गजमारूढा कस्यचिद्दैत्यदुर्मतेः । उरः स्थले स्वकरिणा वप्राघातमशिक्षयत् ॥ २६

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