संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवलाहाकादि सप्त सेनापति वध वर्णन ] [ ३२३
काचित्प्रतिभटारूढं दन्तिनं कुम्भसीमनि । खड्गेन सहसा हत्वा गजस्य स्वप्रियं व्यधात् ॥३० करमुक्तेन चक्रेण कस्यचिद्देववैरिणः । धनुर्दण्डं द्विधा कृत्वा स्वभ्रुवोः प्रतिमां तनोत् ॥३१ शक्तिरन्या शरैः शातैः शातयित्वा विरोधिनः । कृपाणपद्मा रोमाल्यां स्वकीयायां मुदं व्यधात् ॥३२ काचिन्मुद्गरपातेन चूर्णयित्वा विरोधिनः । रथचक्रनितंबस्य स्वस्य तेनातनोन्मुदम् ॥३३ रथकूबरमुग्रेण कस्यचिद्दानवप्रभोः । खड्गेन छिन्दती स्वस्य प्रियमुष्यास्ततान ह ॥३४ अभ्यंतरं शक्तिसेना दैत्यानां प्रविवेश ह । प्रविवेश च दैत्यानां सेना शक्तिबलांतरम् ॥३५
एक शक्ति हाथी पर समारूढ़ होकर युद्ध कर रही थी और उसने दुष्ट बुद्धि वाले दैत्य के उरःस्थल में अपने हाथी के द्वारा वज्राघात की शिक्षा दी थी ।२६। किसी शक्ति ने उस हाथी के जिस पर प्रतिभट बैठा हुआ था, कुम्भ स्थल में खंग का प्रहार किया था और उस हाथी के स्वप्रिय को मार डाला था ।३०। अपने हाथ से छोड़े हुए चक्र के द्वारा किसी असुर के धनुष के दो टुकड़े करके स्वभ्र की प्रतिमा बना दी थी ।३१। अन्य शक्ति के तीक्ष्ण शरों से विरोधियों का वध कर दिया था । कृपाण पद्मा ने अपनी रोमालि में मुद किया था ।३२। किसी शक्ति ने मुद्गर के प्रहार से विरोधियों का चूर्ण किया था । उस ने अपने रथ के पहिए के नितम्ब का उसके द्वारा मुद किया था अर्थात् आनन्द प्राप्त किया था ।३३। किसी दानवों के स्वामी के रथ के कूबर को अपने उग्र खग के द्वारा छेदन करती हुई अपनी प्रीति का विस्तार किया था ।३४। शक्ति की सेना दैत्यों के अन्दर प्रवेश कर गयी थी और दुर्धर दैत्यों की सेना भी शक्ति सेना के भीतर प्रवेश कर गयी थी ।३५।
नीरक्षीरवदत्यंताश्लेषं शक्तिसुरद्विषाम् । संकुलाकारतां प्राप्तो युद्धकालेऽभवत्तदा ॥३६