संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषंग पलायन वर्णन ] [ ३४५
शक्तियों का मण्डल हो गया तो ऐसा होने पर कामेश्वरी प्रमुख जो नित्याएँ थीं उनको बड़ा भारी क्रोध हो गया था ॥७४॥ थोड़ा-सा भ्रुकुटियों से संसक्त श्री देवी के मुख कमल को देखकर नित्याओं को बहुत ही उद्वेग हो गया था और उन्होंने अत्यधिक श्रम किया था ॥७५॥ नित्याएं काल के ही स्वरूप वाली थीं और प्रत्येक तिथि के विग्रह वाली थीं। उन्होंने साम्राज्ञी के क्रोध को देखकर युद्ध करने का विशेष उद्यम किया था ॥७६॥ उनने महान् उद्यम से समन्विता उस महाराज्ञी को प्रणिपात करके उस समय अनवसर में उत्थित और युद्ध के कौतुक से गद्गद वाणी कही थी ॥७७॥
तिथिनित्या ऊचुः— देवदेवी महाराज्ञी तवाग्रे प्रेक्षितां चमूम् । दंडिनीमन्त्रनाथादिमहाशवतचभिपालिताम् ॥७८ धर्षितुं कातरा दुष्टा मायाच्छद्मपरायणाः । पाष्णिग्राहेण युद्धेन बाधंते रथपुङ्गवम् ॥७९ तस्मात्तिमिरसंछन्नमूर्तीनां विबुधद्रुहाम् । शमयामो वयं दर्पं क्षणमात्रं विलोकय ॥८० या वह्निवासिनी नित्या या ज्वालामालिनी परा । ताभ्यां प्रदीपिते युद्धे द्रष्टुं शक्ताः सुरद्विषः ॥८१ प्रशमय्य महादर्पं पाष्णिग्राहप्रवर्तिनाम् । सहसैवागमिष्यामः सेवितुं श्रीपदांबुजम् । आज्ञां देहि महाराज्ञि मर्दनाथं दुरात्मनाम् ॥८२ इत्युक्ते सति नित्याभिस्तथास्त्विति जगाद सा । अथ कामेश्वरी नित्या प्रणम्य ललितेश्वरीम् । तया संप्रेषिता ताभिः कुण्डलीकृतकार्मुका ॥८३ सा हन्तुं तान्दुराचारान्कूटयुद्धकृतक्षणान् । बालारुणमिव क्रोधारुणं वक्त्रं वितन्वती ॥८४
तिथि नित्याओं ने कहा था—हे देवदेवि ! आप तो महाराज्ञी हैं। आपके आगे प्रेक्षित सेना है जो दण्डिनी और मन्त्रनाथा आदि महान्