संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४६ । [ ब्रह्माण्ड पुराण
शक्तियों से अभिपालित हैं ॥७८॥ ये माया के कपट में परायण दुष्ट और कातर दैत्यगण पार्णिग्राह युद्ध के द्वारा इस श्रेष्ठ रथ को धर्षित करने के लिए बाधा पहुँचा रहे हैं ॥७९॥ इस कारण से अन्धकार से संच्छन्न कलेवरों वाले असुरों के घमण्ड को हम एक ही क्षण में शमन करती हैं—आप देखिये ॥८०॥ जो वह्निवासिनी देवी है और दूसरी जो ज्वालामालिनी है, उन दोनों के द्वारा प्रदीपित युद्ध में ये असुर देखे जा सकते हैं ॥८१॥ पाष्णिग्राह में अर्थात् पीछे से घेरा डालकर युद्ध करने में प्रवृत्त हुए दैत्यों के महान् दर्प को प्रशान्त कर हम लोग तुरन्त ही आपके श्री चरण कमलों की सेवा करने के लिए वापिस आ जायेंगी । हे महाराज्ञि ! आप हमको आज्ञा दीजिए कि हम उन दुरात्माओं का मदन कर डालें ॥८२॥ नित्याओं के द्वारा इस प्रकार से कहने पर उस महादेवी ने कहा था—ऐसा ही करो । इसके पश्चात् नित्या कामेश्वरी ने ललितेश्वरी को प्रणाम किया था और उसके द्वारा भेजी हुईं शक्तियों ने धनुष को खींचकर कुण्डलीकृत बना दिया था ॥८३॥ उसने बाल सूर्य के समान क्रोध से लाल अपने मुख करके क्रूर युद्ध करने वाले उन दुष्टात्माओं का हनन करने के लिए धावा बोल दिया था और उनसे कहा था ॥८४॥
रे रे तिष्ठत पापिष्ठा मायानिष्ठाश्छिनद्मि वः ।
अन्धकारमनुप्राप्य कूटयुद्धपरायणाः ॥८५
इति तान्भर्त्सयंती सा तूणीरोत्खातसायकात् ।
पर्वावरोहणं चक्रे क्रोधेन प्रस्खलद्गतिः ॥८६
सज्जकार्मुकहस्ताश्च भगमालापुरः सराः ।
अन्याश्च चलिता नित्याः कृतपर्वावरोहणाः ॥८७
ज्वालामालिनि नित्या च या नित्या वह्निवासिनी ।
सज्जे युद्धे स्वतेजोभिः समदीपयतां रणे ॥८८
अथ ते दुष्टदनुजाः प्रदीप्ते युद्धमण्डले ।
प्रकाशवपुषस्तत्र महांतां क्रोधमाययुः ॥८९
कामेश्वर्यादिका नित्यास्ताः पञ्चदश सायुधाः ।
ससिंहनादास्तान्दैत्यानमृद्नन्नेव हेलया ॥९०