भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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विशंग पलायन वर्णन ] [ ३४७

महाकलकलस्तत्र समभूद्युद्धसीमनि ।
मन्दरक्षोभितां भोधिद्वेल्लत्कल्लोलमण्डलः ॥६१

हे पापियो ! ठहरो, माया में संस्थित तुमको मैं कभी छिन्न-भिन्न करे देती तुम लोग अन्धकार को प्राप्त करके इस क्रूर युद्ध में तत्पर हो रहे हो ।८५। इस रीति से उनको फटकारती हुई उससे अपने तूणीर से उत्खात सायक से पर्वारोहण किया था और क्रोधावेश से उसकी गति प्रस्खलित हो रही थी ।८६। वे कार्मुकों को हाथों में सजाये हुई थीं और उनके आगे भगमालायें थीं और अन्य नित्याएँ पर्वारोहण करके चल दी थीं ।८७। ज्वाला मालिनी नित्या और वह्निवासिनी नित्या ये दोनों ही युद्ध में सज्जित हुई थी और इन्होंने अपने तेजों से रण में प्रदीपन कर दिया था । ।८८। इसके अनन्तर युद्ध मण्डल के प्रदीप्त होने पर वे दुष्ट दनुज प्रकाशित कलेवरों वाले हो गये थे और उनको बड़ा क्रोध हो गया था ।८९। कामेश्वरी प्रभृति नित्याएँ आयुधों से सयुत पन्द्रह थीं । वे सिंहनादों से ही उन दैत्यों का मर्दन सा हो कर रही थीं । इस समय में यहाँ युद्ध में महान् कल-कल हो गया था । वह कलकल ऐसा ही था मानों मन्दराचल से क्षोभित सागर के विलोडन से तरंगों के मण्डल का हो रहा होवे ।६०-६१।

ताश्च नित्यावलत्क्वाणकंकणैर्युधि पाणिभिः ।
आकृष्य प्राणकोदंडास्तेनिरे युद्धमुद्धतम् ॥६२
यामत्रितयपर्यन्तमेवं युद्धमवर्त्तत ।
नित्यानां निशितैर्बाणैरक्षौहिण्यश्च संहृता ॥६३
जघान दमनं दुष्टं कामेशी प्रथमं शरैः ।
दीर्घजिह्वं चमूनाथं भगमाला व्यदारत् ॥६४
नित्यक्लिन्ना च भेरुण्डा हुम्बेकं हुलुमल्लकम् ।
कक्कसं वह्निवासा च निजघान शरैः शतैः ॥६५
महावज्रेश्वरी बाणैरभिनत्केकिवाहनम् ।
पुक्कसं शिवदूती च प्राहिणोद्यमसादनम् ॥६६
पुण्ड्रकेतुं भुजोद्दण्डं त्वरिता समदारयत् ।
कुलसुन्दरिका नित्या चंडबाहुं च कुक्कुरम् ॥६७