संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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कर लिखा गया मन्त्र था उसको उस मायावी ने भली-भाँति मन्त्रित किया था ।३६। यन्त्र की पूजा करके छागल आदि की बलि दी थी । उस असुर ने समर में चारिकटक में उसका क्षेप किया था ।४०। उस प्रकार के बाहिर के भाग में रहने वाले उस दुष्ट धी ने प्रक्षिप्त किया था और उल्लंघन कर कटक के मध्य के रण में गिरा था ।४१। उस यन्त्र के विकार से कटक में स्थित शक्तियाँ शस्त्रों को छोड़कर दीन मानसों वाली हो गयी थीं ।४२।
किं हतैरसुरैः कार्यं शस्त्राशस्त्रिक्रमैरलम् ।
जयसिद्धफलं किं वा प्राणिहिंसा च पापदा ॥४३
अमराणां कृते कोऽयं किमस्माकं भविष्यति ।
वृथा कलकलं कृत्वा न फलं युद्धकर्मणा ॥४४
का स्वामिनी महाराज्ञी का वासौ दण्डनायिका ।
का वा सा मन्त्रिणी श्यामा भृत्यत्वं नोऽथ कीदृशम् ॥४५
इह सर्वाभिरस्माभिर्भृत्यभूताभिरेकिका ।
वनिंता स्वाजिनीकृत्ये किं फलं मोक्ष्यते परम् ॥४६
परेषां मर्मभिदुरैरायुधैर्न प्रयोजनम् ।
युद्धं शाम्यतु चास्माकं देहशस्त्रक्षतिप्रदम् ॥४७
युद्धे च मरणं भावि वृथा स्युर्जीवितानि नः ।
युद्धे मृत्युर्भवेदेव इति तत्र प्रमैव का ॥४८
उत्साहेन फलं नास्ति निद्रैवका सुखावहा ।
आलस्यसदृशं नास्ति चित्तविश्रांतिदायकम् ॥४९
उनको ऐसा सन्यास हो गया था कि उनके मनों में ये भाव उत्पन्न हो गये थे कि इन असुरों के मारने से क्या कार्य होगा—यह शस्त्रास्त्रों का क्रम भी व्यर्थ है—जय की सिद्धि से भी क्या फल है । युद्ध में प्राणियों की हिंसा से पाप होगा ।४३। यह देवों के लिए क्या है इससे हमारा भी क्या होगा । कल-२ करना व्यर्थ है और युद्ध के कर्म से क्या फल होगा ।४४। कौन तो महाराज्ञी स्वामिनी है और यह दण्ड नायिका क्या है । वह मन्त्रिणी श्यामा क्या है और हमारा उनका कैसा भृत्य होना है ।४५। यहाँ पर हम सबने जो भृत्य भूता हैं एक वनिता को स्वामिनी बना रक्खा है । इससे क्या परम मोक्ष होगा ।४६। दूसरों के मर्मों के भेदन करने वाले आयुधों की क्या