भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३७६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

जय विघ्न था जिसको उस दानव ने किया था ।५४। कटक का प्रमन्थन करने की इच्छा वाला वह उसके प्रभाव से निर्विघ्न हो गया था। उस समय में फिर नगर से निकलकर फिर तीस अक्षौहिणी सेना से युत होकर विशुक्र दैत्य शत्रुओं के कटक में आ गया था ।५५-५६। फिर रण के निःशाणों के शब्द सुने गये थे तो भी वे शक्तियां कटक में उद्योग ही नहीं हो गयी थीं। ।५७।

तदा महानुभावत्वाद्विकारैर्विघ्नयंत्रजैः । अस्पृष्टे मंत्रिणोदण्डनाथे चिंतामवापतुः ॥५८॥ अहो बत महत्कष्टमिदमापतितं भयम् । कस्य वाथ विकारेण सैनिका निर्गतोद्यमाः ॥५९॥ निरस्तायुधसंरंभा निद्रातन्द्राविघूर्णिताः । न मानयंति वाक्यानि नार्चयंति महेश्वरीम् । ओदासीन्यं वितन्वंति शक्तयो निस्पृहा इमाः ॥६०॥ इति ते मंत्रिणोदण्डनाथे चिंतापरायणे । चक्रस्यन्दनमारूढे महाराज्ञीं समूचतुः ॥६१॥ मंत्रिण्युवाच— देवि कस्य विकारोऽयं शक्तयो विगतोद्यमाः । न शृण्वंति महाराज्ञि तवाज्ञां विश्वपालिताम् ॥६२॥ अन्योन्यं च विरक्तास्ताः पराच्यः सर्वकर्मसु । निद्रातन्द्रामुक्कुलिता दुर्वाक्यानि वितन्वते ॥६३॥ का दंडिनी मंत्रिणो का महाराज्ञीति का पुनः । युद्धं च कीदृशमिति क्षेपं भूरिवतन्वते ॥६४॥

उस समय में विघ्नयन्त्र से समुत्पन्न विकारों से महानुभाव होने के कारण से मन्त्रिणी और दण्डनाथा अस्पृष्ट थीं। ओर उनको बड़ी चिन्ता प्राप्त हो गयी थी ।५८। अहो ! बड़े खेद का विषय है और महान् कष्ट तथा भय आ पड़ा है। अथवा यह किसका विकार है जिसके प्रभाव से समस्त सैनिक उद्योग हीन हो गये हैं ।५९। आयुधों का संरम्भ निरस्त कर दिया है और सब निद्रा तथा तन्द्रा से विघूर्णित हैं। न तो ये वाक्यों को मानते हैं और