भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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गणनाथ पराक्रम वर्णन ] [ ३७७

न महेश्वरी का ही अर्चन करते हैं। ये सब शक्तियाँ उदासीनता कर रही हैं और निःस्पृह हो गयी हैं।६०। वे मन्त्रिणी और दण्डनाथा इस प्रकार से चिन्ता मग्न हो गयी थीं और चक्र स्यन्दन पर समारूढ़ होकर उन्होंने महाराज्ञी से कहा था।६१। मन्त्रिणी ने कहा—हे देवि ! यह किसका विकार है कि सब शक्तियों ने उद्यम त्याग दिया है। हे महाराज्ञि ! विश्वपालिता आपकी आज्ञा को भी वे अब नहीं सुनती हैं।६२। वे परस्पर में सब कर्मों को छोड़ कर विरक्त हो गयीं हैं। वे निद्रा और तन्द्रा से मुकुलित हो रही हैं और दुर्वाक्यों को कहती हैं।६३। वे कहती हैं यह दण्डिनी और मन्त्रिणी कौन और क्या हैं तथा यह महाराज्ञी क्या कौन है और यह युद्ध भी कैसा है—ऐसा ही बहुत क्षेप कर रही हैं।६४।

अस्मिन्नेवांतरे शत्रुरागाच्छति महाबलः।
उद्दंडभेरीनिस्वानैर्विभिदन्निव रोदसी ॥६५॥
अत्र यत्प्राप्तं रूपं तन्महाराज्ञि प्रपद्यताम् ।
इत्युक्तवा सह दंडिन्या मंत्रिणों प्रणतिं व्यधात् ॥६६॥
ततः सा ललिता देवी कामेश्वरमुखं प्रति ।
दत्तदृष्टिः समहसदतिरक्तरदावलिः ॥६७॥
तस्याः स्मितप्रभापुञ्जे कुंजराकृतिमान्मुखे ।
कटक्रोडगलद्दानः कश्चिदेव व्यजृम्भत ॥६८॥
जपापटलपाटल्‍यो बालचन्द्रवपुर्धरः ।
बीजपूरगदामिक्षु चापं शूलं सुदर्शनम् ॥६९॥
अब्जपाशोत्पलव्रीहिमंजरीवरदांकुशान् ।
रत्नकुम्भं च दशभिः स्वकैर्हस्तैः समुद्वहन् ॥७०॥

इसी बीच में महान बल वाला शत्रु आ जाता है जो उद्दण्ड भेरियों के घोषों से रोदसी (भूमि और आकाश को) का भेदन सा कर रहा है।६५। यहाँ पर जो भी रूप प्राप्त हुआ है हे महाराज्ञि ! उसको बतलाइए। इतना कहकर वे दोनों दण्डिनी और मन्त्रिणी ने स्वामिनी को प्रणाम किया था।६६। इसके अनन्तर इस ललिता देवी ने कामेश्वर के मुख की ओर अपनी दृष्टि डाली थी और बहुत हंसी थीं उनके अतीव रक्त रदावलि थी।६७। उनके स्मित की प्रभा के पुञ्ज वाले मुख में कुञ्जर की आकृति वाला कोई