संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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दिखाई दिया था जिसके कुम्भस्थल से मद चू रहा था ।६८। वह जपा पुष्प के समान पाटलय था—शिर पर बालचन्द्र को धारण किये था और बीज- पूर-गदा-इक्षुचाप--शूल-सुदर्शन-अब्ज-पाश-उत्पल-ब्रीहि मंजरी-वरदां- कुश और रत्नकुम्भ—इनको दश करों में उद्धहन कर रहे थे ।६६-७०।
तुन्दिलश्चन्द्रचूडालो मन्द्रबृंहितनिस्वनः । सिद्धिलक्ष्मीसमाश्लिष्टः प्रणनाम महेश्वरीम् ॥७१॥ तया कृताशीः स महान्गणनाथो गजाननः । जयविघ्नमहायन्त्रं भेत्तुं वेगाद्विनिर्ययौ ॥७२ अंतरेव हि शालस्य भ्रमद्दन्तावलाननः । निभृतं कुत्रचिल्लग्नं जयविघ्नं व्यलोकयत् ॥७३ स देवो घोरनिर्घातैर्दुःसहैर्दंतपातनैः । क्षणाच्चूर्णीकरोति स्म जयविघ्नमहाशिलाम् ॥७४ तत्र स्थिताभिर्दुष्टाभिर्देवताभिः सहैव सः । परागशेषतां नीत्वा तद्यन्त्रं प्राक्षिपद्दिवि ॥७५ ततः किलकिलारावं कृत्वाऽऽलस्यविवर्जिताः । उद्यताः समरं कर्तुं शक्तयः शस्त्रपाणयः ॥७६ स दंतिवदनः कण्ठकलिताकुण्ठनिस्वनः । जययन्त्रं हि तत्सृष्टं तथा रात्रौ व्यनाशयत् ॥७७
उनका पेट बड़ा था—चन्द्र चूड़ा में था और वे मन्द्र तथा बृंहित ध्वनि वाले थे । वे सिद्धि लक्ष्मी से समाश्लिष्ट थे । उनने आकर महेश्वरी को प्रणाम किया था ।७१। देवी ने उनको आशीर्वाद दिया था, वह महान गणनाथ गजानन थे और वे जयविघ्न महा यन्त्र का भेदन करने के लिए वेग के साथ निकलकर चले गये थे ।७२। शाल के अन्दर ही भ्रमद्दन्ता बलानन ने चुपचाप कहीं पर लगा हुआ जयविघ्न यन्त्र को देखा था ।७३। उस देव ने घोर निर्घातों वाले और दुस्सह दांतों के पातनों से एक ही क्षण में उस जयविघ्न महाशिला का चूर्ण कर दिया था ।७४। उन्होंने उसमें स्थित देव- ताओं के साथ ही जो बड़े दुष्ट थे सबका चूरा करके उस यन्त्र को दिवलोक में फेंक दिया था ।७५। इसके अनन्तर किलकिल की ध्वनि करके सब शक्ति