संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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में हो रही थीं ॥६०॥ वीरों के वचन समूहों से तथा शरों के सात्कारों के घोष एवं महेन्द्रों के अट्टहास और अधिकांश में सिंहनाद भी हो रहे थे ॥६१॥
क्षुभ्यद्दिगंतरं तत्र ववृधे युद्धमुद्धतम् ।
त्रिंशदक्षौहिणी सेना विशुक्रस्य दुरात्मनः ॥६२॥
प्रत्येकं योधयामासुर्गणनाथा महरथाः ।
दन्तैर्मर्म विभिंदंतो वेष्टयंतश्च शुण्डया ॥६३॥
क्रोधयन्तः कर्णतालैः पुष्करावर्त्तकोपमैः ।
नासाश्वासैश्च परुषैर्विक्षिपंतः पताकिनीम् ॥६४॥
उरोभिर्मर्दयंतश्च शैलवप्रसमप्रभैः ।
पिषंतश्च पदाघातैः पीनैघ्नंस्तस्तथोदरैः ॥६५॥
विभिन्दन्तश्च शूलेन कृत्तंतश्चक्रपातनैः ।
शङ्खस्वनेन महता त्रासयन्तो वरूथिनीम् ॥६६॥
गणनाथमुखोद्भूता गजवक्त्राः सहस्रशः ।
धूलीशेषं समस्तं तत्सैन्यं चक्रुर्महोद्धताः ॥६७॥
अथ क्रोधसमाविष्टो निसैन्यपुरोगमः ।
प्रेषयामास देवस्य गजासुरमसौ पुनः ॥६८॥
उस समय में सब दिशाओं में बड़ा क्षोभ छागया था ऐसा वह उद्धत युद्ध हुआ था । उस दुरात्मा की जो तीस अक्षौहिणी सेना थी । उसमें प्रत्येक से महारथी गणनायों ने युद्ध किया था । वे दाँतों से मर्मों का भेदन कर रहे थे और सूँड़ से उनका वेष्टन कर रहे थे ॥६२-६३॥ पुष्करावर्त्तक के समान कानों के तालों से क्रोध करते हुए और पुरुष नाक के श्वासों से पताकिनी के अन्दर विक्षेप डालते हुए—पर्वत के वप्रके तुल्य उरः स्थलों से मर्दन करते हुए—पैरों के घात से पीसते हुए—तथा पीन (स्थूल) उदरों से हनन करते हुए—शूल से विभेदन करते हुए और चक्रों के पातन से काटते हुए और महान शंखों की ध्वनि से सेना को त्रास देते हुए ऐसे गणनाथ के मुख से उत्पन्न सहस्रों ही गजबदन वहाँ पर विद्यमान थे । मद से उद्धत उन गजों के समान मुख वालों ने उस सेना को सम्पूर्ण को धूल में मिला दिया था ॥६४-६७॥ इसके अनन्तर अपनी सेना के अग्रणी ने क्रोध में समाविष्ट होकर फिर इसने देव के गजासुर को भेजा था ॥६८॥