संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
प्रचंडसिंहनादेन गजदैत्येन दुर्धिया । सप्ताक्षौहिणियुक्तेन युयुधे स गणेश्वरः ॥६६ हीयमानं समालोक्य गजासुरभुजाबलम् । वर्धमानं च तद्वीर्यं विशुक्रः प्रपलायितः ॥१०० स एक एव वीरेंद्रः प्रचलन्नाखुवाहनः । सप्ताक्षौहिणिकायुक्तं गजासुरममर्दयत् ॥१०१ गजासुरे च निहते विशुक्रे प्रपलायिते । ललितांतिकमापेदे महागणपतिमृधात् ॥१०२ कालरात्रिश्च दैत्यानां सा रात्रिर्विरतिं गता । ललिता चाति मुदिता बभूवास्य पराक्रमैः ॥१०३ विततार महाराज्ञी प्रीयमाणा गणेशितुः । सर्वदैवपूजायाः पूर्वपूज्यत्वमुत्तमम् ॥१०४
उस गणेश्वर ने प्रचण्ड सिंहनाद वाले दुष्टमति सात अक्षौहिणियों से संयुत गजदैत्य के साथ युद्ध किया था ।६६। उस गजासुर की भुजाओं के बल को क्षीण होता हुआ देखकर और उसके बलवीर्य को बढ़ा हुआ देखकर वहाँ से विशुक्र भाग गया था ।१००। मूषक का वाहन वाला वह एक ही वीरेन्द्र प्रचलन करता हुआ सातों अक्षौहिणी सेनाओं से युक्त उस गजासुर को मर्दन करने वाला होगया था ।१०१। उस गजासुर के मरने पर और विशुक्र के भाग जाने पर वह महा गणपति युद्ध स्थल से ललिता देवी के समीप में उपस्थित हो गये थे ।१०२। और दैत्यों की कालरात्रि वह रात समाप्त हो गयी थी । ललिता इस महा गणपति के पराक्रम से बहुत ही प्रसन्न होगयी थी ।१०३। परम प्रसन्न उस महाराज्ञी ने गणेशजी की अर्चना समस्त देवों से पूर्व में होकर उनको पूर्व पूज्यत्व प्रदान किया था जो अतीव उत्तम वरदान था ।१०४।
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