भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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विशुक्र विषंग वध वर्णन ] [ ३८३

विशुक्र विषंग वध वर्णन

समाप्तश्च द्वितीययुद्धदिवसः—

रणे भग्नं महादैत्यं भण्डदैत्यः सहोदरम् ।
सेनानां कदनं श्रुत्वा सन्तप्तो बहुचिन्तया ॥१॥
उभावपि समेतौ तौ युक्तौ सर्वैश्च सैनिकैः ।
प्रेषयामास युद्धाय भण्डदैत्यः सहोदरौ ॥२॥
तावुभौ परमक्रुद्धौ भण्डदैत्येन देशितौ ।
विषंगश्च विशुक्रश्च महोद्यममवापतुः ॥३॥
कनिष्ठसहितं तत्र युवराजं महाबलम् ।
विशुक्रमनुवव्राज सेना त्रैलोक्यकम्पिनी ॥४॥
अक्षौहिणीचतुः शत्या सेनानामावृतश्च सः ।
युवराजः प्रववृधे प्रतापेन महीयसा ॥५॥
उलूकजित्प्रभृतयो भागिनेया दशोद्धताः ।
भंडस्य च भगिन्यां तु धूमिन्यां जातयोनयः ॥६॥
कृतास्त्रशिक्षा भंडेन मातुलेन महीयसा ।
विक्रमेण बलन्तस्ते सेनानाथाः प्रतस्थिरे ॥७॥

रण में अपने सहोदर महादैत्य को भग्न हुआ देखकर और सेनाओं का रुदन सुनकर भंड दैत्य अधिक चिन्ता से सन्तप्त हो गया था ।१। फिर भंड दैत्य ने दो सहोदरों को जो सब सैनिकों से संयुत थे युद्ध करने के लिए वहाँ पर भेजा था ।२। वे दोनों भाई परमाधिक क्रुद्ध हो रहे थे और भंड दैत्य के द्वारा उन्हें आज्ञा दी गयी थी । फिर विशुक्र और विषंग ने महान उद्यम को प्राप्त किया था ।३। वहाँ पर छोटे भाई के सहित महान बल वाले युवराज को भी पीछे भेजा था । उसकी सेना तीनों लोकों को कम्पन देने वाली थी ।४। वह चार सौ अक्षौहिणी सेनाओं से आवृत था । युवराज महान प्रताप से बढ़ गया था ।५। उलूकजित् प्रभृति उसके दश भानजे थे जो बहुत ही उद्धत थे और भंड की धूमिनी भगिनी में समुत्पन्न हुए थे ।६। महान मातुल भंड के द्वारा ही उनको अस्त्रों की शिक्षा दी गयी थीं । वे विक्रम से बलन करते हुए सेनापति भी रवाना हुए थे ।७।