भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३८४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

प्रोद्गतैश्चापनिर्घोषैर्घोषयन्तो दिशो दश ।
द्वयोर्मातुलयोः प्रीतिं भागिनेया वितेनिरे ॥८
आरूढयानाः प्रत्येकं गाढाहंकारशालिनः ।
आकृष्टगुरुधन्वानो विशुक्रं मनुवव्रजुः ॥९
यौवराज्यप्रभाचिह्नच्छत्रचामरशोभितः ।
आरूढवारणः प्राप विशुक्रो युद्धमेदिनीम् ॥१०
ततः कलकलारावकारिण्या सेनया वृतः ।
विशुक्रः पटु दध्वान सिंहनादं भयंकरम् ॥११
तत्क्षोभात्क्षुभितस्वान्ताः शक्तयः संभ्रमोद्धताः ।
अग्निप्राकारवलयान्निर्जग्मुर्बद्धपङ्क्तयः ॥१२
तडिन्मयमिवाकाशं कुर्वत्यः स्वस्वरोचिषा ।
रक्ताम्बुजावृतमिव व्योमचक्रं रणोन्मुखाः ॥१३
अथ भंडकनीयांसावागतौ युद्धदुर्मदौ ।
निशम्य युगपद्योद्धुं मंत्रिणिदंडनायके ॥१४

वे प्रोद्गत धनुषों की ध्वनियों से दश दिशाओं को भर रहे थे । उन दोनों मातुलों की प्रीति को उन भानजों ने विस्तृत किया था ।८। प्रत्येक गहरे अहंकार वाले यानों पर समारूढ़ हुए थे । उन्होंने धनुषों को चढ़ाकर विशुक्र के पीछे अनुगमन किया था ।९। यौवराज्य की प्रभा के चिह्न छत्र और चामरों से शोभित वारण पर समारूढ़ होकर विशुक्र युद्ध भूमि में प्राप्त हुआ था ।१०। इसके पश्चात् कलकल के घोष को करने वाली सेना से समावृत विशुक्र ने महान भयंकर सिंहनाद किया था ।११। उसके क्षोभ से क्षुब्ध हृदयों वाली शक्तियां संभ्रम से उद्धत हो गई थीं और पंक्तियां बांधकर वे उस अग्नि के प्राकार के वलय से निकली थी ।१२। अपनी कान्ति से आकाश को विद्युत से परिपूर्ण कर रही थीं । रण को उन्मुख उन्होंने व्योम चक्र को रक्त कमल के सदृश बना दिया था ।१३। इसके बाद भंड के दोनों छोटे भाई वहाँ पर समागत हो गये थे जो युद्ध दुर्मद थे । एक ही साथ युद्ध करने के लिए आये हुए उनको मन्त्रिणी और दण्डनायिका ने सुना था ।१४।