भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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विशुक्र विषंग वध वर्णन ] [ ३८५

किरिचक्रं ज्ञेयचक्रमारूढे रथशेखरम् । धृतातपत्रवलये चामराभ्यां च वीजिते ॥१५ अप्सरोभिः प्रनृत्ताभिर्गीयमानमहोदये । निर्जग्मतू रणं कर्तुमुभाभ्यां ललिताज्ञया ॥१६ श्रीचक्ररथराजस्य रक्षणार्थं निवेशिते । शताक्षौहिणिकां सेनां वर्जयित्वास्त्रभीषणम् ॥१७ अन्यत्सर्वं चमूजालं निर्जगाम रणोन्मुखी । पुरतः प्राचलद्दण्डनाथा रथनिषेदुषी ॥१८ एकयैव कराङ्गुल्या घूर्णयन्ती हलायुधम् । मुसलं चान्यहस्तेन भ्रामयन्ती मुहुर्मुहुः ॥१९ तरलेन्दुकलाचूडास्फुरत्पोत्रमुखाम्बुजा । पुरः प्रहर्त्री समरे सर्वदा विक्रमोद्धता । अस्या अनुप्रचलिता गेयचक्ररथस्थिता ॥२० धनुषो ध्वनिना विश्वं पूरयन्ती महोद्धता । वेणीकृतकचन्यस्तविलसच्चन्द्रपल्लवा ॥२१

उन दोनों ने रथों में शिरोमणि किरिचक्र और ज्ञेय चक्र रथों पर समारोहण किया था। उन दोनों ने छत्रों को धारण किया था और चमर उन पर ढुलाये जा रहे थे। वे दोनों ही प्रवृत्त अप्सराओं के द्वारा ले जायी जा रही थीं। वे दोनों ही ललिता देवी की आज्ञा पाकर युद्ध करने के लिए वहाँ से निकल कर चलीं थीं ।१५-१६। श्री चक्रराज रथ की रक्षा के लिए ये निवेशित थीं। इन्होंने सौ अक्षौहिणी सेना और भीषण अस्त्रों को वर्जित कर दिया था ।१७। अन्य समस्त चमू का जाल के साथ रण को उन्मुखी वह निकल कर चली थी। आगे रथ पर बैठी हुई दंडनाथा रवाना हुई थी ।१८। वह एक ही की अंगुली से हलायुध को घुमाती हुई और दूसरे हाथ से मुसल को बार-२ घुमा रही थी ।१९। तरल चन्द्र की कला से स्फुरण करते हुए पोत्र मुखकमल वाली वह युद्धमें सबसे आगे सदा वह विक्रम से उद्धत रहती थी। इसके पीछे गेय चक्र रथ में विराजमान अनुगमन कर रही थी ।२०। यह मद से उद्धत धनुष की ध्वनि से सम्पूर्ण विश्व को भर रही थी। उसने अपने