भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३८६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

जूड़े की चोटी बनी रक्खी थी। जिसमें चन्द्र की कला शोभित हो रही थी ॥२१॥

स्फुरत्त्रितननेत्रेण सिन्दूरतिलकत्विषा । पाणिना पद्मरम्येण मणिकंकणचारुणा ॥२२ तूणीरमुखतः कृष्टं भ्रामयन्ती शिलीमुखम् । जय वर्धस्ववर्धस्वेत्यतिहर्षसमाकुले ।२३ नृत्यद्भिर्दिव्यमुनिभिर्वर्द्धिताशीर्वचोऽमृतैः । गेयचक्ररथेन्द्रस्य चक्रनेमिविघट्टनैः ॥२४ दारयन्ती क्षितितलं दैत्यानां हृदयैः सह । लोकातिशायिता विश्वमनोमोहनकारिणा । गीतिबन्धेनामरीभिर्बह्वीभिर्गीतवैभवा ॥२५ अक्षौहिणीसहस्त्राणामष्टकं समरोद्धतम् । कर्षती कल्पविश्लेषणनिर्मर्यादाब्धिसंनिभम् ॥२६ तस्याः शक्तिचमूचक्रे काश्चित्कनकरोचिषः । काश्चिद्दाडिमसंकाशाः काश्चिज्जीमूतरोचिषः ॥२७ अन्याः सिंदूररुचयः पराः पाटलपाटलाः । काश्चाद्रिकाम्बराः काश्चित्पराः श्यामलकोमलाः ॥२८

स्फुरित तीन नेत्रों वाली और सिन्दूर के तिलक की कान्ति वाली देवी ने पद्म के तुल्य सुन्दर और मणियों के कंकण की कान्ति से सम्पन्न कर से तूणीर के मुख से खींचे हुए बाण को घुमा रही थी। वहाँ पर वर्धन हो—वर्धन हो—इसकी ध्वनि चारों ओर हो रही थी ।२२-२३। दिव्य मुनि-गण प्रसन्नता से नृत्य करते हुए वचनामृतों से आशीर्वाद दे रहे थे। गेय चक्र रथेन्द्र के पहियों का विघटन हो रहा था। इससे दैत्यों के हृदय के साथ ही भूमि को विदीर्ण कर रही थी। उस समय में गीतों का भी बन्ध चल रहा था जो अलौकिक और विश्व के मन को मोहन करने वाला था। बहुत-सी मरीचियां गीत का गान कर रही थी ।२४-२५। आठ हजार अक्षौहिणी सेना समर की उद्धत थी। कल्पान्त में मर्यादा से रहित सागर के