संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविशुक विशंग वध वर्णन ] [ ३८७
समान ही वह कर्षण कर रही थी ।२६। उसकी शक्तियों की सेना के चक्र में विविध वेषभूषा वाली शक्तियाँ विद्यमान थीं । कुछ की कांति तो सुवर्ण के समान थी—कुछ दाड़िम के तुल्य थीं और कुछ मेघों के तुल्य थीं ।२७। अन्य सिन्दूर जैसी कान्ति वाली थीं—कुछ पाटल वर्ण की थीं—कुछ कांच के अम्बरों की महाद्रि के सदृश थीं और दूसरी श्यामल एवं कोमल थीं ।२८।
अन्यास्तु हीरकप्रख्याः परा गरुत्मतोपमाः । विरुद्धैः पञ्चभिर्बाणैर्मिश्रितैः शतकोटिभिः ॥२९॥ व्यञ्जयंत्यो देहरुचं कतिचिद्विविधायुधाः । असंख्याः शक्तयश्चेलुर्दण्डिन्यास्सैनिकैस्तथा ॥३०॥ तथैव सैन्यसन्नाहो मन्त्रिण्याः कुम्भसम्भव । यथा भूषणवेषादि यथा प्रभावलक्षणम् ॥३१॥ यथा सद्गुणशालित्वं यथा चाश्रितलक्षणम् । यथा दैत्यौघसंहारो यथा सर्वैश्च पूजिता ॥३२॥ यथा शक्तिर्महाराज्ञ्या दण्डिन्याश्च तथाखिलम् । विशेषस्तु परं तस्याः साचिव्ये तत्करे स्थितम् । महाराज्ञीवितीर्णं तदाज्ञामुद्रांगुलीयकम् ॥३३॥ इत्थं प्रचलिते सैन्ये मंत्रिणीदण्डनाथयोः । तद्भारभंगुरा भूमिर्दोलालीलामलंबत ॥३४॥ ततः प्रवृत्ते युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् । उद्धृतधूलिजंबालीभूतसप्तार्णवीजलम् ॥३५॥
अन्य हीरे के सदृश थीं और कुछ गरुत्मत मणि के समान थीं । विरुद्ध पाँच बाणों से मिश्रित शत कोटियों से कुछ अनेक आयुधों वाली अपनी शारीरिक कान्ति को प्रकाशित कर रही थीं । ऐसी अगणित शक्तियाँ दण्डिनी के सैनिकों के साथ वहाँ पर युद्ध के लिए चली थीं ।२९-३०। हे कुम्भसम्भव ! जैसा उनका भूषण-वेषादि था और प्रभाव का लक्षण था वैसा ही मन्त्रिणी की सेना का भी सन्नाह भी था ।३१। जैसी सद्गुण शालिता थी और जो भी आश्रितों का लक्षण था तथा जैसा भी दैत्यों के