भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३८८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

समुदाय का संहार था वैसी ही वे सबके द्वारा पूजित भी हुई थीं ।३२। महाराज्ञी की जैसी शक्ति थी वैसी ही सम्पूर्ण दंडिनी की भी थी किन्तु विशेषता यही थी कि उसके हाथ में साचिव्य था। महाराज्ञी ने उसकी आज्ञा की मुद्रांगुलीयक वितीर्ण कर दी थी ।३३। मन्त्रिणी और दण्डनाथा की सेना इस प्रकार से चली थी। उस सेना के भार से यह भूमि भगुर हो गयी थी और वह झूला की तरह ही हिलने लग गयी थी ।३४। इसके अनन्तर महान् तुमुल और रोमहर्षण युद्ध प्रवृत्त हो गया था। उस युद्ध में उठी हुई धूलि में जो जम्बाल के ही समान हो गयी थी सातों सागरों के जल को छा लिया था ।३५।

हयस्थैर्ह्ययसादिन्यो रथस्थै रथसस्थिताः । आधोरणैर्हस्तिपकाः खड्गैः पद्गाश्च सङ्गताः ॥३६॥ दण्डनाथाविषंगेण समयुध्यंत सङ्गरे । विशुक्रेण समं श्यामा विकृष्टमणिकार्मुका ॥३७॥ अश्वारूढा चकारोच्चैः सहोलूकजिता रणम् । सम्पदीशा च जग्राह पुरुषेण युयुत्सया ॥३८॥ विषेण नकुली देवी समाहवास्त युयुत्सया । कुन्तिषेणेन समरं महामाया तदाकरोत् ॥३९॥ मलदेन समं चक्रे युद्धमुन्मत्तभैरवी । लघुश्यामा चकारोच्चैः कुशूरेण समं रणम् ॥४०॥ स्वप्नेशी मंगलाख्येन दैत्येन्द्रेण रणं व्यधात् । वाग्वादिनी तु जघटे द्रुघणेन समं रणे ॥४१॥ कोलाटेन च दुष्टेन चण्डकाल्यकरोद्रणम् । अक्षौहिणीभिर्दैत्यानां शताक्षौहिणिकास्तथा । महान्तं समरे चक्रू रन्योन्यं क्रोधमूर्च्छिताः ॥४२॥

जो अश्वों पर सवार थे उन्होंने घुड़ सवारों के साथ—एवं हस्तिपकों ने आधोरणों के साथ और पदातियों ने पैदल सैनिकों से सङ्गत होकर खड्गों से युद्ध किया था ।३६। संग्राम में दण्डनाथा ने विषङ्ग के साथ युद्ध था। अपने मणियों के कार्मुक को खींचकर श्यामा ने विशुक्र के साथ युद्ध