संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविशुक्र विषंग वध वर्णन ] [ ३८६
किया था ।३७। अश्वारूढ़ा ने बहुत भारी उलूक जितु के साथ रण किया था सम्पद्दीक्षा ने युद्ध की इच्छा से पुरुष के साथ युद्ध ग्रहण किया था ।३८। नकुली देवी ने युद्ध करने की इच्छा से विष को बुलाया था। माहमाया ने कुन्तिषेण के साथ युद्ध किया था ।३६। उन्मत्त भैरवी ने मलद के साथ संग्राम किया था और लघुश्यामा ने कुशूर के साथ रण किया था ।४०। स्वप्नेशी ने मङ्गल के साथ युद्ध किया था। वाग्वादिनी ने द्रुघण के साथ रण में भिड़न्त की थी ।४१। चण्डकाली ने कोलाट के साथ रण किया था। दैत्यों की अक्षौहिणियों के साथ सौ अक्षौहिणी सेनाओं ने परस्पर में बड़ा भारी युद्ध क्रोध में मूर्च्छित होकर किया था ।४२।
प्रवर्त्तमाने समरे विशुक्रो दुष्टदानवः ।
वर्धमानां शक्तिचमूं हीयमानां निजां चमूम् ॥४३॥
अवलोक्य रुषाविष्टः स कृष्टगुरुकार्मुकः ।
शक्तिसैन्ये समस्तेऽपि तृषास्त्रं प्रमुमोच ह ॥४४॥
तेन दावानलज्वालादीप्तेन मथितं बलम् ।
तृतीये युद्धदिवसे याममात्रं गते रवौ ।
विशुक्रमुक्ततर्षास्त्रव्याकुलाः शक्तयोऽभवन् ॥४५॥
क्षोभयन्निन्द्रियग्रामं तालुमूलं विशोषयन् ।
रूक्षयन्कर्णकुहरमंगदौर्बल्यमावहन् ॥४६॥
पातयन्पृथिवीपृष्ठे देहं विस्रंसितायुधम् ।
आविर्बभूव शक्तीनाममिततीव्रतृषाज्वरः ॥४७॥
युद्धेष्वनुद्यमकृता सर्वोत्साहविरोधिना ।
तर्षेण तेन क्वथितं शक्तिसैन्यं विलोक्य सा ।
मन्त्रिणी सह पोत्रिण्या भृशं चिंतामवाप ह ॥४८॥
उवाच तां दण्डनाथामत्याहितविशंकिनीम् ।
रथस्थिता रथगतां तत्प्रतीकारकर्मणे ।
सखि पोत्रिणि दुष्टस्य तर्षास्त्रमिदमागतम् ॥४९॥