भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

उस युद्ध के प्रवृत्त होने पर दुष्ट दानव विशुक्र ने जब यह देखा था कि शक्तियों की सेना बढ़ रही है और अपनी क्षीण हो रही है तो क्रोध में भरकर उसने एक बड़ा धनुष खींचा था और उस समस्त शक्तियों की सेना में तृषास्त्र छोड़ दिया था । ४३-४४। उसने जो दावानल की ज्वाला के समान दीप्त था उस बड़ी सेना को मथ दिया था । तीसरे युद्ध के दिन में एक प्रहर मात्र रवि के गत होने पर विशुक्र के द्वारा छोड़े हुए तृषास्त्र से शक्तियां व्याकुल हो उठी थीं ।४५। उन तालु के मूल का शोषण कर रहा था। कानों के छिद्र भी रूक्ष हो रहे थे और अङ्गों में दुर्बलता हो रही थी तथा आयुधों को छोड़कर देहों को भूमि पर गिरा रहा था । ४६-४७। युद्ध में अनुद्यम करने वाले तथा समस्त उत्साह के विरोधी उस तर्ष के द्वारा क्व- थित शक्तियों की सेना को देखकर वह मन्त्रिणी पोत्रिणी के साथ बहुत ही चिन्तित हो गयी थी ।४८। अतीव अहित विशंका वाली उस दण्डनाथा से बोली रथ में स्थित और रथगता होकर उसके प्रतिकार कर्म के लिए कहा था हे सखि ! पोत्रिणि ! यह दुष्ट का तृषास्त्र आ गया है । इसका हमारी सेना पर बहुत ही बुरा प्रभाव हो गया है ।४९।

शिथिलीकुरुते सैन्यमस्माकं हा विधेः क्रमः । विशुष्कतालिमूलानां विभ्रष्टायुधतेजसाम् । शक्तीनां मंडलेनात्र समरे समुपेक्षितम् ॥५० न कापि कुरुते युद्धं न धारयति चायुधम् । विशुष्कतालिमूलत्वाद्वक्तुमप्यालि न क्षमाः ॥५१ ईदृशीन्नो गतिं श्रुत्वा किं वक्ष्यति महेश्वरी । कृता चापकृतिर्दैत्यैरुपायः प्रविचिंत्यताम् ॥५२ सर्वत्र द्वयष्टसाहस्राक्षौहिण्यामत्र पोत्रिणि । एकापि शक्तिर्नैवास्ति या तर्षेण न पीडिता ॥५३ अत्रैवावसरे दृष्ट्वा मुक्तशस्त्रा पताकिनीम् । रंध्रप्रहारिणो हंत बाणैर्निघ्नंति दानवाः ॥५४ अत्रोपायस्त्वया कार्यो मया च समरोद्यमे । त्वदीयरथपर्वस्थो योऽस्ति शीतमहार्णवः ॥५५