भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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विशुक्र विषंग वध वर्णन ] [ ३६१

तमादिश समस्तानां शक्तीनां तर्षनुत्तये । नाल्पैः पानीयपानाद्यैरेतासां तर्षसंक्षयः ॥५६॥

हा ! विधाता का क्या क्रम है । यह अस्त्र तो हमारी सेना को शिथिल कर रहा है । सबके तालुमूल सूख गये हैं और सबके आयुध भ्रष्ट हो गये हैं । इस युद्ध में शक्तियों का मण्डल उपेक्षित हो गया है ।५०। न तो कोई भी युद्ध करती है और न कोई आयुध ही ग्रहण कर रही है । हे आलि ! तालुमूलों के शुष्क हो जाने से ये तो बोलने में भी असमर्थ हो गयी हैं ।५१। हमारी ऐसी दशा को सुनकर महेश्वरी क्या कहेगी । दैत्यों ने तो हमारा बड़ा ही अपकार किया है । इसका कोई उपाय सोचना चाहिए ।५२। हे पोत्रिणि ! सोलह हजार सर्वत्र यहाँ पर अक्षौहिणी हैं । ऐसी एक भी शक्ति नहीं है जो तर्ष से पीड़ित न होवे ।५३। इसी अवसर सेना को हथियारों को छोड़ने वाली देखकर ये दानव छिद्रों में प्रहार करने वाले हैं और बाणों से निहनन कर रहे हैं । यह बड़े ही खेद की बात है ।५४। यहाँ पर तुमको और मुझको कोई उपाय करना चाहिए । उस समरोद्यम में कुछ करना ही है । तुम्हारे रथ के पर्व में स्थित जो शीत का महार्णव है ।५५। उसको ही शक्तियों की तृषा के छेदन के लिए आदेश दो क्योंकि अल्प पानीय के पानों से उनकी तृषा का क्षय नहीं होगा ।५६।

स एव मदिरासिंधुः शक्त्यौघं तर्पयिष्यति । तमादिश महात्मानं समरोत्साहकारिणम् । सर्वतर्षप्रशमनं महाबलविवर्धनम् ॥५७॥ इत्युक्ते दण्डनाथा सा सदुपायेन हर्षिता । आजुहाव सुधासिंधुमाज्ञां चक्रेश्वरी रणे ॥५८॥ स मदालसरक्ताक्षो हेमाभः स्रग्विभूषितः ॥५९॥ प्रणम्य दण्डनाथां तां तदाज्ञापरिपालकः ॥६०॥ आत्मानं बहुधा कृत्वा तरुणादित्यपाटलम् । क्वचित्तापिज्छवच्छ्यामं क्वचिच्च धवलद्युतिम् ॥६१॥ कोटिशो मधुराधारा करिहस्तसमाकृतीः । ववर्ष सिंधुराजोऽय वायुना बहुलीकृतः ॥६२॥