संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
पुष्करावर्तकाद्यैस्तु कल्पक्षयबलाहकैः ।
निषिच्यमानो मध्येऽब्धिः शक्तिसैन्ये पपात ह ॥६३॥
वही मदिरा का सिन्धु शक्तियों के समूहों को तृप्त करेगा। समर के उत्साह करने वाले महान आत्मा वाले उसी को आदेश दो। वह समस्त तर्ष का प्रशमन करने वाला है और महान बल के बढ़ानेवाला है ।५७। ऐसा कहने पर वह दण्डनाथा इस समुदाय से परम हर्षित हुई थी। चक्रेश्वरी ने रथ में सुधा के सिन्धु को आज्ञा देकर बुलाया था ।५८। वह मद से अलस और रक्त नेत्रों वाला था—हेम के समान उसकी आभा थी। मालाओं से वह भूषित था ।५९। उसकी आज्ञा के पालक उसने दण्डनाथा को प्रणाम किया था ।६०। उसने अनेक प्रकार का अपना स्वरूप बना लिया था—कहीं तो तरुण सूर्य के समान वह पाटल था और कहीं पर तापिच्छ के तुल्य श्यामल था और कहीं पर धवल कान्ति वाला था ।६१। इस सिन्धुराज ने वायु के द्वारा अधिक होकर हाथी के सूँड के समान आकार वाली करोड़ों धाराएँ वर्षायी थीं ।६२। कल्प के क्षय के समय पुष्कलावर्त्तक आदि बलाहकों से निषिच्यमान शक्तियों के मध्य में वह सागर गिरा था ।६३।
यद्गन्धाघ्राणमात्रेण मृत उत्तिष्ठते स्फुटम् ।
दुर्बलः प्रबलश्च स्यात्तद्ववर्ष सुरांबुधिः ॥६४॥
परार्द्धसंख्यातीतास्ता मधुधारापरम्पराः ।
प्रपिबन्त्यः पिपासार्तैर्मुखैः शक्तय उत्थिताः ॥६५॥
यथा सा मदिरासिंधुवृष्टिर्दैत्येषु नो पतेत् ।
तथा सैन्यस्य परितो महाप्राकारमण्डलम् ॥६६॥
लघुहस्ततया मुक्तै शरजातैः सहस्रशः ।
चकार विस्मयकरी कदम्बवनवासिनी ॥६७॥
मर्मणा तेन सर्वेऽपि विस्मिता मरुतोऽभवन् ।
अथ ताः शक्तयो भूरि पिबन्ति स्म रणांतरे ॥६८॥
विविधा मदिराधारा बलोत्साहविवर्धनीः ।
यस्या यस्या मनः प्रीती रुचिः स्वादो यथा यथा ॥६९॥