भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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विशुक्र विषंग वध वर्णन ] [ ३६३

तृतीये युद्धदिवसे प्रहरद्वितयावधि । संततं मद्यधाराभिः प्रववर्ष सुरांबुधिः ॥७०॥

जिसकी गन्ध मात्र से ही मृत प्राणी स्पष्ट उठकर खड़ा हो जाया करता है और जो दुर्बल होता है वह प्रबल हो जाया करता है वह सुराम्बुधि वर्षा था ।६४। परार्ध संख्या से अतीत मधु धाराओं की परम्पराएँ थीं उनका पान करती हुई पिपासा से आर्त्तमुखों से उनने पान किया था और वे शक्तियां उठकर खड़ी हो गयी थीं ।६५। उस सेना के चारों ओर ऐसा एक प्रकार का मण्डल था कि जिससे वह मदिरा सिन्धु की वृष्टि दैत्यों पर न जाकर पड़ जावे ।६६। कदम्ब वन वासिनी ने लघु हस्तता से छोड़े गये सहस्रों शरों से विस्मयकरी किया था ।६७। उस कर्म से सभी मरुत विस्मित हो गये थे । इसके अनन्तर उन शक्तियों ने रण के मध्य में पान बहुत किया था ।६८। अनेक मदिरा की धाराएँ बल और उत्साह के वर्धन करने वाली थीं । जिस-जिस के मन की जो-जो भी प्रीति थी वैसी-वैसी ही पी थी ।६६। तीसरे युद्ध के दिन में दो प्रहर की अवधि तक सुराम्बुधि ने निरन्तर मद्य की धाराओं से वर्षा की थी ।७०।

गौडी पैष्टी च माध्वी च वरा कादम्बरी तथा । हैताली लांगलेया च तालजातास्तथा सुराः ॥७१॥ कल्पवृक्षोद्भवा दिव्या नानादेशसमुद्भवाः । सुस्वादुसौरभाद्याश्च शुभगंधसुखप्रदाः ॥७२॥ बकुलप्रसवामोदाः ध्वनंत्यो बुदबुदोज्ज्वलाः । कटुकाश्च कषायाश्च मधुरास्तिक्ततास्पृशः ॥७३॥ बहुवर्णसमाविष्टाश्छेदिनीः पिच्छलास्तथा । ईषदम्लाश्च कट्वम्ला मधुराम्लास्तथा पराः ॥७४॥ शस्त्रक्षतरुगाहन्त्री चास्थिसंधानदायिनी । रणभ्रमहराः शीता लघ्व्यस्तद्वत्कवोष्ठकाः ॥७५॥ संतापहारिणीश्चैव वारुणीस्त। जयप्रदाः । नानाविधाः सुराधारा ववर्ष मदिराणवः ॥७६॥ अविच्छिन्नं याममात्रमेकैका तत्र योगिनी । ऐरावतकरप्रख्यां सुराधारां मुदा पपौ ॥७७॥