संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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सुराएँ कितनी ही प्रकार की थीं। अब उनके प्रकारों को बताया जाता है—गौड़ी-पैष्टी-माध्वी-वरा-कादम्बरी-हैताली-लाङ्गलेया-और ताल जाता सुराएँ थी ।७१। कल्प वृक्ष से समुत्पन्न-दिव्या-अनेक देशों में उत्पन्ना थी। ये सुन्दर स्वाद वाली और सौरभ वाली थीं और इनसे शुभ गन्ध निकलती थी ।७२। बकुल के प्रसवा-आमोदा-स्रवन्ती-बुद्बुदा-उज्ज्वला थी। कटुका-कषाया-मधुरा-तिक्तता के स्पर्श वाली थी ।७४। बहुत वर्णों से समाविष्टा-छेदिनी-पिच्छिला-ईषद् अम्ला-कट्वम्ला-तथा मधुराम्ला थी ।७४। शस्त्र से होने वाले क्षत के रोग का हनन करने वाली-अस्थियों के सन्धान को देने वाली-लघ्वी और कवोष्णका थी ।७५। सन्ताप का हरण करने वाली तथा वारुणी-जय प्रदान करने वाली-इस तरह से उस सुधार्णव ने अनेक प्रकार की सुराओं की धाराओं की वर्षा की थी ।७६। वहाँ पर एक-एक योगिनी ने एक प्रहर तक अविच्छिन्न रूप से ऐरावत करप्रख्या सुरा की धारा को आनन्द के साथ पान किया था।
उत्तानं वदनं कृत्वा विलोलरसनाञ्चलम् । शक्तयः प्रपपुः सीधु मुदा मीलितलोचनाः ॥७७
इत्थं बहुविधं माध्वीधारापातैः सुधांबुधिः । आगतस्तर्पयित्वा तु दिव्यरूपं समास्थितः ॥७८
पुनर्गत्वा दण्डनाथां प्रणम्य स सुरांबुधिः । स्निग्धगंभीरघोषेण वाक्यं चेदमुवाच ताम् ॥८०
देवि पश्य महाराज्ञि दण्डमण्डलनायिके । मया संतर्पिता मुग्धरूपा शक्तिवरूथिनी ॥८१
काश्चिन्नृत्यंति गायंत्यो कलक्वणितमेखलाः । नृत्यंतीनां पुरः काश्चित्करतालं वितन्वते ॥८२
काश्चिद्धसंति व्यावल्गद्बलगुवक्षोजमण्डलाः । पतंत्यन्योन्यमङ्गेषु काश्चिदानन्दमन्थराः ॥८३
काश्चिद्वल्गंति च श्रोणिविगलन्मेखलांबराः । काश्चिदुत्थाय संनद्धा घूर्णयन्ति निरायुधाः ॥८४