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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

३६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

पुष्करावर्तकाद्यैस्तु कल्पक्षयबलाहकैः ।
निषिच्यमानो मध्येऽब्धिः शक्तिसैन्ये पपात ह ॥६३॥

वही मदिरा का सिन्धु शक्तियों के समूहों को तृप्त करेगा। समर के उत्साह करने वाले महान आत्मा वाले उसी को आदेश दो। वह समस्त तर्ष का प्रशमन करने वाला है और महान बल के बढ़ानेवाला है ।५७। ऐसा कहने पर वह दण्डनाथा इस समुदाय से परम हर्षित हुई थी। चक्रेश्वरी ने रथ में सुधा के सिन्धु को आज्ञा देकर बुलाया था ।५८। वह मद से अलस और रक्त नेत्रों वाला था—हेम के समान उसकी आभा थी। मालाओं से वह भूषित था ।५९। उसकी आज्ञा के पालक उसने दण्डनाथा को प्रणाम किया था ।६०। उसने अनेक प्रकार का अपना स्वरूप बना लिया था—कहीं तो तरुण सूर्य के समान वह पाटल था और कहीं पर तापिच्छ के तुल्य श्यामल था और कहीं पर धवल कान्ति वाला था ।६१। इस सिन्धुराज ने वायु के द्वारा अधिक होकर हाथी के सूँड के समान आकार वाली करोड़ों धाराएँ वर्षायी थीं ।६२। कल्प के क्षय के समय पुष्कलावर्त्तक आदि बलाहकों से निषिच्यमान शक्तियों के मध्य में वह सागर गिरा था ।६३।

यद्गन्धाघ्राणमात्रेण मृत उत्तिष्ठते स्फुटम् ।
दुर्बलः प्रबलश्च स्यात्तद्ववर्ष सुरांबुधिः ॥६४॥
परार्द्धसंख्यातीतास्ता मधुधारापरम्पराः ।
प्रपिबन्त्यः पिपासार्तैर्मुखैः शक्तय उत्थिताः ॥६५॥
यथा सा मदिरासिंधुवृष्टिर्दैत्येषु नो पतेत् ।
तथा सैन्यस्य परितो महाप्राकारमण्डलम् ॥६६॥
लघुहस्ततया मुक्तै शरजातैः सहस्रशः ।
चकार विस्मयकरी कदम्बवनवासिनी ॥६७॥
मर्मणा तेन सर्वेऽपि विस्मिता मरुतोऽभवन् ।
अथ ताः शक्तयो भूरि पिबन्ति स्म रणांतरे ॥६८॥
विविधा मदिराधारा बलोत्साहविवर्धनीः ।
यस्या यस्या मनः प्रीती रुचिः स्वादो यथा यथा ॥६९॥

विशुक्र विषंग वध वर्णन ] [ ३६३

तृतीये युद्धदिवसे प्रहरद्वितयावधि । संततं मद्यधाराभिः प्रववर्ष सुरांबुधिः ॥७०॥

जिसकी गन्ध मात्र से ही मृत प्राणी स्पष्ट उठकर खड़ा हो जाया करता है और जो दुर्बल होता है वह प्रबल हो जाया करता है वह सुराम्बुधि वर्षा था ।६४। परार्ध संख्या से अतीत मधु धाराओं की परम्पराएँ थीं उनका पान करती हुई पिपासा से आर्त्तमुखों से उनने पान किया था और वे शक्तियां उठकर खड़ी हो गयी थीं ।६५। उस सेना के चारों ओर ऐसा एक प्रकार का मण्डल था कि जिससे वह मदिरा सिन्धु की वृष्टि दैत्यों पर न जाकर पड़ जावे ।६६। कदम्ब वन वासिनी ने लघु हस्तता से छोड़े गये सहस्रों शरों से विस्मयकरी किया था ।६७। उस कर्म से सभी मरुत विस्मित हो गये थे । इसके अनन्तर उन शक्तियों ने रण के मध्य में पान बहुत किया था ।६८। अनेक मदिरा की धाराएँ बल और उत्साह के वर्धन करने वाली थीं । जिस-जिस के मन की जो-जो भी प्रीति थी वैसी-वैसी ही पी थी ।६६। तीसरे युद्ध के दिन में दो प्रहर की अवधि तक सुराम्बुधि ने निरन्तर मद्य की धाराओं से वर्षा की थी ।७०।

गौडी पैष्टी च माध्वी च वरा कादम्बरी तथा । हैताली लांगलेया च तालजातास्तथा सुराः ॥७१॥ कल्पवृक्षोद्भवा दिव्या नानादेशसमुद्भवाः । सुस्वादुसौरभाद्याश्च शुभगंधसुखप्रदाः ॥७२॥ बकुलप्रसवामोदाः ध्वनंत्यो बुदबुदोज्ज्वलाः । कटुकाश्च कषायाश्च मधुरास्तिक्ततास्पृशः ॥७३॥ बहुवर्णसमाविष्टाश्छेदिनीः पिच्छलास्तथा । ईषदम्लाश्च कट्वम्ला मधुराम्लास्तथा पराः ॥७४॥ शस्त्रक्षतरुगाहन्त्री चास्थिसंधानदायिनी । रणभ्रमहराः शीता लघ्व्यस्तद्वत्कवोष्ठकाः ॥७५॥ संतापहारिणीश्चैव वारुणीस्त। जयप्रदाः । नानाविधाः सुराधारा ववर्ष मदिराणवः ॥७६॥ अविच्छिन्नं याममात्रमेकैका तत्र योगिनी । ऐरावतकरप्रख्यां सुराधारां मुदा पपौ ॥७७॥

३६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

सुराएँ कितनी ही प्रकार की थीं। अब उनके प्रकारों को बताया जाता है—गौड़ी-पैष्टी-माध्वी-वरा-कादम्बरी-हैताली-लाङ्गलेया-और ताल जाता सुराएँ थी ।७१। कल्प वृक्ष से समुत्पन्न-दिव्या-अनेक देशों में उत्पन्ना थी। ये सुन्दर स्वाद वाली और सौरभ वाली थीं और इनसे शुभ गन्ध निकलती थी ।७२। बकुल के प्रसवा-आमोदा-स्रवन्ती-बुद्बुदा-उज्ज्वला थी। कटुका-कषाया-मधुरा-तिक्तता के स्पर्श वाली थी ।७४। बहुत वर्णों से समाविष्टा-छेदिनी-पिच्छिला-ईषद् अम्ला-कट्वम्ला-तथा मधुराम्ला थी ।७४। शस्त्र से होने वाले क्षत के रोग का हनन करने वाली-अस्थियों के सन्धान को देने वाली-लघ्वी और कवोष्णका थी ।७५। सन्ताप का हरण करने वाली तथा वारुणी-जय प्रदान करने वाली-इस तरह से उस सुधार्णव ने अनेक प्रकार की सुराओं की धाराओं की वर्षा की थी ।७६। वहाँ पर एक-एक योगिनी ने एक प्रहर तक अविच्छिन्न रूप से ऐरावत करप्रख्या सुरा की धारा को आनन्द के साथ पान किया था।

उत्तानं वदनं कृत्वा विलोलरसनाञ्चलम् । शक्तयः प्रपपुः सीधु मुदा मीलितलोचनाः ॥७७

इत्थं बहुविधं माध्वीधारापातैः सुधांबुधिः । आगतस्तर्पयित्वा तु दिव्यरूपं समास्थितः ॥७८

पुनर्गत्वा दण्डनाथां प्रणम्य स सुरांबुधिः । स्निग्धगंभीरघोषेण वाक्यं चेदमुवाच ताम् ॥८०

देवि पश्य महाराज्ञि दण्डमण्डलनायिके । मया संतर्पिता मुग्धरूपा शक्तिवरूथिनी ॥८१

काश्चिन्नृत्यंति गायंत्यो कलक्वणितमेखलाः । नृत्यंतीनां पुरः काश्चित्करतालं वितन्वते ॥८२

काश्चिद्धसंति व्यावल्गद्बलगुवक्षोजमण्डलाः । पतंत्यन्योन्यमङ्गेषु काश्चिदानन्दमन्थराः ॥८३

काश्चिद्वल्गंति च श्रोणिविगलन्मेखलांबराः । काश्चिदुत्थाय संनद्धा घूर्णयन्ति निरायुधाः ॥८४

विशुक्र विषंग वध वर्णन ] [ ३६५

शक्तियों ने अपने मुख को ऊपर की ओर उठाकर चञ्चल रसना वाली होते हुए अपनी आँखों को मूँदकर आनन्द से उस चल सुरा का पान किया था। ७८। इस रीति से उस सुधाम्बुद्धि ने बहुत तरह के माध्वी की धाराओं के पातों से तृप्त करके दिव्य रूप में समास्थित हो गया था। ७९। फिर वह सुराम्बुधि दण्डनाथा को प्रणाम करके परम स्निग्ध और गम्भीर ध्वनि से उस देवी से यह वाक्य बोला था। ८०। हे महाराज्ञि ! हे देवि ! हे दण्ड मण्डलनायिके ! आप देख लीजिए। मैंने मुग्धरूप वाली शक्तियों की सेना को भली-भाँति तृप्त कर दिया है। ८१। उनमें कुछ तो नृत्य कर रही हैं कुछ कल क्वणित मेखलाओं वाली गान कर रहीं हैं। नृत्य करने वाली शक्तियों के आगे कुछ करों से ताल दे रही हैं। ८२। कुछ व्यावलगद्बलु उरोजमण्डलों वाली हंस रही हैं। कुछ आनन्दोद्रेक में मन्थर होती हुई परस्पर में अंगों में पतन कर रही हैं। ८३। कुछ अपनी श्रोणियों पर से गिरते हुए मेखलाम्बरों काली वल्ग कर रही है। कुछ उठाकर सन्नद्ध हो रही हैं और बिना ही आयुधों के घूर्णन कर रही हैं। ८४।

इत्थं निर्दिश्यमानास्ताः शक्ती मैरेय सिंधुना ।
अवलोक्य भृशं तुष्टा दण्डिनी तमुवाच ह ॥८५

परितुष्टास्मि मद्याब्धे त्वया साह्यमनुष्ठितम् ।
देवकार्यमिदं किं च निर्विघ्नतमिदं कृतम् ॥८६

अतः परं मत्प्रसादाद्द्वापरे याज्ञिकैर्मखे ।
सोमपानवदत्यंतमुपयोज्यो भविष्यसि ॥८७

मन्त्रेण पूतं त्वां यागे पास्यंत्यखिलदेवताः ।
यागेषु मन्त्रपूतेन पीतेन भवता जनाः ॥८८

सिद्धिंमृद्धिं बलं स्वर्गमपवर्गं च बिभ्रतु ।
महेश्वरी महादेवो बलदेवश्च भार्गवः ।
दत्तात्रेयो विधिविष्णुस्त्वां पास्यंति महाजनाः ॥८९

यागे समचितस्त्वं तु सर्वसिद्धि प्रदास्यसि ॥६०

इत्थं वरप्रदानेन तोषयित्वा सुरांबुधिम् ॥६१

३६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

इस तरह से दिखाई गयीं उन शक्तियों को देखकर जो मैरेय सीधु से आनन्दित हो रही थीं दण्डिनी अत्यन्त प्रसन्न हुई थी और उससे कहा था ।८५। हे मद्याब्धे ! मैं बहुत ही यदि तुष्ट हुई हूँ। आपने हमारी सहायता की है। यह देव कार्य है इसको आपने विघ्न रहित कर दिया है ।८६। अब इससे आगे द्वापर युग में मेरे प्रसाद से मख में याज्ञिकों के द्वारा सोम के पान के ही समान आप अत्यन्त उपयोग के योग्य होंगे ।८७। समस्त देवगण याग में मन्त्र से पूत करके इसका पान किया करेंगे। यागों में मन्त्र से पवित्र का पान भक्तजन करेंगे ।८८। इसके प्रभाव से सिद्धि-ऋद्धि-स्वर्ग-अपवर्ग को प्राप्त करेंगे। महेश्वरो-महादेव-बलदेव-भार्गव-दत्तात्रेय-विधि-विष्णु-ऐसे महान सिद्धि जन भी तुम्हारा पान करेंगे ।८६। याग में समन्वित तू सब प्रकार की प्रदान करोगी ।६०। इस प्रकार से वरदान के द्वारा सुराम्बुधि को तुष्ट किया था ।६१।

मन्त्रिणी त्वरयामास पुनर्युद्धाय दण्डिनी ।
पुनः प्रवृत्ते युद्धं शक्तीनां दानवैः सह ॥६२

मुदाट्टहासनिर्भिन्नदिगष्टकधरा धरम् ।
प्रत्यग्रमदिरामत्ताः पाटलीकृतलोचनाः ।
शक्तयो दैत्यचक्रेषु न्यपतन्नेकहेलया ॥६३

द्वयेन द्वयमारेजे शक्तीनां समदर्शियाम् ।
मदरागेण चक्षूंषि दैत्यरक्तेन शस्त्रिका ॥६४

तथा बभूव तुमुलं युद्धं शक्तिसुरद्विषाम् ।
यथा मृत्युरवित्रस्तः प्रजाः संहरते स्वयम् ॥६५

संस्खलत्पदविन्यासामदेनारक्तदृष्टयः ।
स्खलदक्षरसंदर्भवीरभाषा रणोद्धताः ॥६६

कदम्बगोलकाकारा हृष्टसर्वांगदृष्टयः ।
युवराजस्य सैन्यानि शक्तयः समनाशयन् ॥६७

अक्षौहिणीशतं तत्र दण्डिनी सा व्यदारयत् ।
अक्षौहिणीसार्द्धशतं नाशयामास मन्त्रिणी ॥६८

विशुक्र विषंग वध वर्णन ] [ ३६७

मन्त्रिणी और दण्डिनी दोनों ने पुनः युद्ध करने के लिए शीघ्रता की थी और फिर शक्तियों का दानवों के साथ युद्ध प्रवृत्त हो गया था।६२। प्रसन्नता से अट्टहास जो उन्होंने किया था तो आठों दिशाओं को और धरा को हिला दिया था। नवीन मदिरा से मत्त हो गयी थीं और उनके लोचन पाटल वर्ण के थे। वे शक्तियाँ दैत्यों के चक्र में एक ही हल्ला के साथ निपतित हो गयी थीं ।६३। मद की श्री से सम्पन्न शक्तियों का युद्ध ऐसा हुआ था कि दो से दो ही भिड़ गयी थीं और शोभित हुई थीं। मद के राग से तो नेत्र लाल हो गयी थीं और दैत्यों के रक्त से शस्त्र रक्त हो गये थे ।६४। शक्ति और असुरों का बड़ा तुमुल युद्ध हुआ था जैसे अवित्रस्त मृत्यु स्वयं ही प्रजाओं का संहार करता हो ।६५। उनके चरणों के न्यास स्खलित हो रहे थे तथा मद से कुछ रक्त वर्ण के नेत्र हो रहे थे। वीरभाषा भी ऐसी थी कि उनमें अक्षरों का सन्दर्भ स्खलित हो रहा था। ऐसी वे रण में उद्धत हो गयी थीं ।६६। कदम्ब गोलक के आकार से युक्त और हृष्ट सर्वाङ्ग दृष्टि वाली शक्तियों ने युवराज की सेनाओं का विनाश कर दिया था ।६७। उस दण्डिनी ने वहाँ पर सौ अक्षौहिणियों को विदीर्ण कर दिया था और डेढ़ सौ अक्षौहिणी का विनाश मन्त्रिणी ने कर दिया था ।६८।

अश्वारूढप्रभृतयो मदारुणविलोचनाः ।
अक्षौहिणीसार्धशतं निन्युरंतकमन्दिरम् ॥६९
अंकुशेनाति तीक्ष्णेन तुरगा रोहिणी रणे ।
उलूकजितमुन्मथ्य परलोकातिथि व्यधात् ॥१००
सम्पत्करीप्रभृतयः शक्तिदण्डाधिनायिकाः ।
परुषेण मुखान्यन्यान्यवरुद्धा व्यदारयन् ॥१०१
अस्तं गते सवितरि ध्वस्तसर्वबलं ततः ।
विशुक्रं योधयामास श्यामला कोपशालिनी ॥१०२
अस्त्रप्रत्यस्त्रमोक्षेण भीषणेन दिवौकसाम् ।
महता रणकृत्येन योधयामास मन्त्रिणी ॥१०३
आयुधानि सुतीक्ष्णानि विशुक्रस्य महौजसः ।
क्रमशः खंडयंती सा केतनं रथसारथिम् ॥१०४

३६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

धनुर्गुणं धनुर्दंडं खंडयंती शिलीमुखैः । अस्त्रेण ब्रह्मशिरसा ज्वलत्पावकरोचिषा ।।१०५

मद से अरुण लोचनों वाली अश्वारूढ़ा आदि ने डेढ़ सौ अक्षौहिणी को यमराज के पुर में भेज दिया था ।६६। अत्यन्त तीक्ष्ण अंकुश से अश्वारोहिणी ने युद्ध में उलूक जित् का उन्मथन करके उसे परलोक भेज दिया था ।१००। सम्पत्करी प्रभृति शक्ति दण्डाधिनायियों ने अपने कठोर प्रहार से परस्पर में अवरुद्धों को विदीर्ण कर दिया था ।१०१। सूर्य के अस्ताचलगामी होने पर समस्त सेना के ध्वस्त होने वाले विशुक्र के साथ कोपशालिनी श्यामा ने युद्ध किया था ।१०२। मन्त्रिणी ने अस्त्र प्रत्यस्त्रों के छोड़ने के द्वारा देवों को भी भीषण महान रण कृत्य से युद्ध किया था ।१०३। महान ओज वाले विशुक्र के परम तीक्ष्ण आयुधों का क्रम से खण्डन करती हुई उसने बाणों के द्वारा ध्वजा रथ के सारथि-धनुष की प्रत्यञ्चा-धनुष का खण्डन करती हुई जलती हुई अग्नि की कान्ति वाले ब्रह्मशिर अस्त्र से विशुक्र का मर्दन किया था ।१०४-१०५।

विशुक्रं मर्दयामास सोऽपतच्चूर्णविग्रहः । विषंगं च महादैत्यं दण्डनाथा मदोद्धता ।।१०६

योधयामास चंडेन मुसलेन विनिघ्नती । स चापि दुष्टो दनुजः कालदंडनिभां गदाम् । उद्यम्य बाहुना युद्धं चकाराशेषभीषणम् ।।१०७

अन्योन्यमंगं मृद्नंतौ गदायुद्धप्रवर्तिनौ । चण्डाट्टहासमुखरौ परिभ्रमणकारिणौ ।।१०८

कुर्वाणौ विविधांश्चारान्घूर्णंतौ तूर्णवेष्टिनौ । अन्योन्यदंडहननैर्मोहयंतौ मुहुर्मुहुः ।।१०६

अन्योन्यप्रहृतौ रंध्रमीक्षमाणौ महोद्धतौ । महामुसलदंडाग्रघट्टनक्षोभितांबरौ । अयुध्येतां दुराधर्षौ दंडिनीदैत्यशेखरौ ।।११०

अथार्द्धरात्रिसमयपर्यंतं कृतसंगरा ।

विशुक्र विषंग वध वर्णन ] [ ३६६

संक्रुद्धा हन्तुमारेभे विषंगं दंडनायिका ॥१११ तं मूर्द्धनि निमग्नेन हलेनाकृष्य वैरिणम् । कठोरं ताडनं चक्रे मुसलेनाथ पोत्रिणी ॥११२ ततो मुसलघातेन त्यक्तप्राणो महासुरः । चूर्णितेन शतांगेन समं भूतलाश्रयत् ॥११३ इति कृत्वा महत्कर्म मंत्रिणीडंडनायिके । तत्रैव तं निशाशेषं निन्यतु शिविरं प्रति ॥११४

विशुक्र का ऐसा विमर्दन किया था कि वह चूर-चूर होकर भूमि पर गिर गया था। मदोद्धता दण्डनाथा ने महान् दैत्य विषंग के साथ युद्ध किया था और अपने प्रचण्ड मुसल से उस पर प्रहार किया था और वह दुष्ट दानव भी कालदण्ड के समान गदा को लेकर प्रस्तुत हो गया था और उसने बाहु से महान् भीषण युद्ध किया था।१०६-१०७। परस्पर में एक दूसरे का मर्दन करते हुए महान् गदा युद्ध में प्रवृत्त हुए थे। चण्ड चट्टहास से दोनों शब्दायमान हो रहे थे और उधर-उधर परिभ्रमण करने वाले थे।१०८। अनेक चारों को करते हुए घूर्णन करते थे और तूर्ण वेष्टी हो रहे थे। परस्पर में प्रहारों से एक दूसरे को बार-बार मूर्च्छित करते हुए दोनों मदोद्धत छिद्रों को देख रहे थे। मूसल के दण्ड के प्रघट्टन से अम्बर को क्षुब्ध करते हुए वे दुराधर्ष दंडिनी और वह दैत्य शिरोमणि युद्ध कर रहे थे ।१०६-११०। आधी रात तक युद्ध करने वाली दण्डनायिका ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर विषंग को मारना आरम्भ कर दिया था ।१११। इसके शिर में गढ़े हुए हल से उस शत्रु को खींचकर पोत्रिणी ने मुसल ने खूब ताड़न किया था ।११२। फिर मुंसल की चोट से महान् असुर गत प्राण वाला हुआ था और चूर्ण होकर भूमि पर गिर पड़ा था ।११३। उन मन्त्रिणी और दण्डनायिका ने यह महान् कर्म करके वहाँ पर ही शिविर में उस रात्रि को व्यतीत किया था ।११४।

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४०० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

॥ भंडासुर वध वर्णन ॥

अगस्त्य उवाच- अश्वानन महाप्राज्ञ वर्णितं मन्त्रिणीबलम् । विषंगस्य वधो युद्धे वर्णितो दण्डनाथया ॥१॥ श्रीदेव्याः श्रोतुमिच्छामि रणचक्रे पराक्रमम् । सोदरस्यापदं दृष्ट्वा भण्डः किमकरोच्छ्रुचा ॥२॥ कथं तस्य रणोत्साहः कैः समं समयुध्यत । सहायाः केऽभवंस्तस्य हतभ्रातृतनूभुवः ॥३॥ हयग्रीव उवाच- इदं शृणु महाप्राज्ञ सर्वपापनिकृन्तनम् । ललिताचरितं पुण्यमणिमादिगुणप्रदम् ॥४॥ वैषुवायनकालेषु पुण्येषु समयेषु च । सिद्धिदं सर्वपापघ्नं कीर्तिदं पञ्चपर्वसु ॥५॥ तदा हतौ रणे तत्र श्रुत्वा निजसहोदरौ । शोकेन महताविष्टो भण्डः प्रविललाप सः ॥६॥ विकीर्णकेशो धरणी मूच्छितः पतितस्तदा । न लेभे किञ्चिदाश्वासं भ्रातृव्यसनकर्शितः ॥७॥

अगस्त्यजी ने कहा—हे महाप्राज्ञ ! हे अश्वानन ! आपने मन्त्रिणी के बल का वर्णन कर दिया है और दण्डनाथा ने युद्ध में विषंग वध किया था वह भी वर्णन कर दिया है ।१। अब मैं युद्ध में श्रीदेवी के पराक्रम के श्रवण करने की इच्छा करता हूँ और भण्ड ने भाई के हनन को सुनकर शोक से क्या किया था ? फिर उसका रण में उत्साह कैसे हुआ था और उसने किनके साथ युद्ध किया था । जब उसके भाई पुत्र मर गये तो फिर उसके सहायक कौन हुए थे ।२-३। हयग्रीवजी ने कहा—हे महाप्राज्ञ ! अब यह भी आप सुनिए जो कि सब पापों का छेदन करने वाला है। यह श्री ललिता देवी का चरित परम पुण्यमय है और अणिमादिक आठों महा-

भंडासुर वध वर्णन ] [ ४०१

सिद्धियों के प्रदान करने वाला है ।४। वैषुवायन कालों में और पुण्य समयों में यह सिद्धि के देने वाला— सब पापों का विनाशक और पञ्च पर्वों में कीर्त्ति का दाता है ।५। उस समय में रण में अपने सहोदरों को मरे हुए सुनकर भंड महान् शोक से समाविष्ट हो गया था और उस भंडासुर ने बड़ा भारी विलाप किया था ।६। विकीर्ण केशों वाला वह मूच्छित होकर भूमि पर गिर गया था और भाइयों के दुःख से कशित होकर कुछ भी आश्वासन उसने प्राप्त नहीं किया था ।७।

पुनः पुनः प्रलपन्कुटिलाक्षेण भूरिशः । आश्वास्यमानः शोकेन युक्तः कोपमवाप सः ॥८ फालं वहन्नतिक्रूरं भ्रमद्भ्रुकुटिभीषणम् । अंगारपाटलाक्षश्च निःश्वसन्कृष्णसर्पवत् ॥९ उवाच कुटिलाक्षं द्राक्समस्तपृतनापतिम् । क्षिप्रं मुहुर्मुहुः स्पृष्ट्वा धुन्वानः करवालिकाम् ॥१० क्रोधहुंकारमातन्वन्गर्जन्नुत्पातमेघवत् ॥११ ययैव दृष्ट्या मायाबलाद्युद्धे विनाशिताः । भ्रातरो मम पुत्राश्च सेनानाथाः सहस्रशः ॥१२ तस्याः स्त्रियाः प्रमत्तायाः कण्ठोत्थैः शोणितद्रवैः । भ्रातृपुत्रमहाशोकवह्निं निर्वापयाम्यहम् ॥१३ गच्छ रे कुटिलाक्ष त्वं सज्जीकुरु पताकिनीम् । इत्युक्त्वा कठिनं वर्म वज्रपातसहं महत् ॥१४

वह बार-बार प्रलविलाप कर रहा था तब कुटिलाक्ष ने उसको आश्वासन दिया था । जब बहुत कुछ समझाया तो शोक से युक्त उसने क्रोध किया था ।८। उसने अत्यन्त क्रूर फाल को ग्रहण किया था और अपनी भ्रुकुटियों को तिरछी करके बहुत ही भीषण हो गया था । उसकी आँखें अङ्गारों के समान रक्त हो गयी थीं और वह काले सर्प की तरह फुङ्कारें मार रहा था ।९। फिर सब सेनाओं के स्वामी कुटिलाक्ष से शीघ्र ही बोला था और बार-बार खड्ग को छूकर उसे घुमाता जा रहा था ।१०। वह क्रोध से हुङ्कार कर रहा था और उत्पात के समय में होने वाले मेघों के समान

४०२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

गर्ज रहा था। १२। जिस दुष्टा ने माया के बल से युद्ध में मेरे भाइयों और पुत्रों को मार दिया है और सहस्रों सेनापतियों का विनाश कर दिया है उसी स्त्री के जब वह युद्ध में प्रवृत्त होगी तो उसके कण्ठ से निकले हुए रुधिर से भाई और पुत्रों के शोक की अग्नि को मैं शान्त करूँगा। १२-१३। रे कुटिलाक्ष ! चले जाओ और सेना को तैयार करो। इतना ही कहकर उसने वज्रपात को भी सहन करने वाले कठिन कवच को धारण किया था। १४।

दधानो भुजमध्येन बध्नन्पृष्ठे तथेषुधी ।
उद्दाममौर्वनिः श्वासकठोरं भ्रामयन्धनुः ॥१५
कालाग्निरिव संक्रुद्धो निर्जगाम निजात्पुरात् ।
तालजंघादिकैः सार्द्धं पूर्वद्वारे निवेशिते ॥१६
चतुर्भिर्धृतशस्त्रौघैर्धृतवर्माभिरुद्धतैः ।
पञ्चत्रिंशच्चमूनाथैः कुटिलाक्षपुरः सरैः ॥१७
सर्वसेनापतीन्द्रेण कुटिलाक्षेण स क्रुधा ।
मिलितेन च भण्डेन चत्वारिंशच्चमूवराः ॥१८
दीप्तायुधा दीप्तकेशा निर्जग्मुर्दीप्तकंकटाः ।
द्विसहस्राक्षौहिणीनां पञ्चाशीतिः पराधिका ॥१९
तदेनमन्वगादेकहेलया मथितुं द्विषः ।
भण्डासुरे विनिर्याते सर्वसैनिकसंकुले ॥२०
शून्यके नगरे तत्र स्त्रीमात्रमवशेषितम् ।
आभिलो नाम दैत्येन्द्रो रथवर्ये महारथः ।
सहस्रयुग्यसिंहाढ्यमारुरोह रणोद्धतः ॥२१

वर्म को भुजाओं के मध्यभाग से धारण करके उसने पृष्ठ में तूणीर कहा था। उद्दाम मौर्वी के निःश्वास से कठोर धनुष को घुमाते हुए कालाग्नि के समान से क्रुद्ध होकर वह अपने नगर से निकलकर चल दिया था और तालजंघादिक उसके साथ थे तथा पूर्व द्वार पर सुरक्षा के लिए भी सेनाओं को निवेशित किया था। १५-१६। चार शस्त्रों के समूहों को धारण करने वाले—कवचों को पहिन हुए और उद्धत वीर वहाँ पर थे। पैंतीस सेना-

भंडासुर वध वर्णन ] [ ४०३

पतियों के सहित जिनमें कुटिलाक्ष भी आगे थे वह चला था ।१७। सब सेना- पतियों का स्वामी कुटिलाक्ष के साथ वह क्रोध से युक्त हुआ था भंड को भी मिलाकर चालीस चमूवर थे ।१८। इनके आयुध परम दीप्त थे और इनके केश भी दीप्त थी ऐसे दीप्त कंकट वाले निकल गये थे दो सहस्र अक्षौहिणी सेना थी और पराधिक पिशाची थीं ।१९। शत्रु का मंथन करने को एक ही साथ उसके पीछे गये थे । भंडासुर के निकल कर जाने पर जो सभी सेनाओं से संकुल थी ।२०। उस शून्यक नगर में केवल स्त्रियाँ ही रह गयी थीं । आभिल नामक दैत्येन्द्र जो रथवर्य और महारथी था एक सहस्र युज्य सिंहों से युक्त रथ पर रणोद्धत होकर सवार हुआ था ।२१।

सत्वरे विज्ज्वलज्वालाकालाग्निरिव दीप्तिमान् । घातको नाम वै खड्गश्चन्द्रहाससमाकृतिः ॥२२ इतस्ततश्चलंतीनां सेनानां धूलिरुत्थिता । वोढुं तासां भरं भूमिरक्षमेव दिवं ययौ ॥२३ केचिद्भूमेरपर्याप्तां प्रलेलुर्व्योमवर्त्मना । केषांचित्स्कन्धमारूढाः केचिच्चेलुर्महारथाः ॥२४ न दिक्षु न च भूचक्रे न व्योमनि च ते ममुः । दुःखदुखेन ते चेलुरन्योन्याश्लेषपीडिताः ॥२५ अत्यन्त सेनासंमर्दाद्रथचक्रैर्विचूर्णिताः । केचित्पादेन नागानां मर्दिता न्यपतन्भुवि ॥२६ इत्थं प्रचलिता तेन समं सर्वैश्च सैनिकैः । वज्रनिष्पेषसदृशो मेघनादो व्यधीयत ॥२७ तेनातीव कठोरेण सिंहनादेन भूयसा । भंडदैत्यमुखोत्थेन विदीर्णमभवज्जगत् ॥२८

वह जलती हुई ज्वाला वाले कालाग्नि के तुल्य ही दीप्ति वाला था । उसके खड्ग का नाम घातक था जो चन्द्रहास खड्ग के ही समान आकृति वाला था ।२२। इधर-उधर चलने वाली सेनाओं से धूलि उड़कर ऊपर उठ गयी थी । मानों भूमि उन सेनाओं के भार को सम्हालने में असमर्थ होकर ही आकाश में जा रही थी ।२३। उनमें कुछ तो भूमि पर स्थान न पाकर

४०४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

व्योम के ही मार्ग से चल दिये थे। कुछ महारथी कुछ लोगों के स्कन्ध पर समारूढ़ होकर चले थे। २४। जब उस भंडासुर की सेनाएँ चली थीं तो कहीं पर भी स्थान नहीं रहा था। एक दूसरे से रगड़ खाकर पीड़ित से होते हुए जा रहे थे। न तो दिशाओं में न भूमि में ओर न नभ में वे समाये थे। बड़े ही दुःख से चल रहे थे। २५। अत्यन्त सेना के संमर्द से और रथों के पहियों से चूर्ण होते हुए जा रहे थे। कुछ हाथियों के पैरों से मर्दित होकर भूमि पर गिर गये थे। २६। इस रीति से उसके साथ सभी सैनिक गमन कर रहे थे और वज्रपात के समान उनने सिंहनाद किया था। उस प्रबल और बड़े भारी सिंहनाद से एवं कठोर से जो भंड के मुख से किया गया था सम्पूर्ण जगत विदीर्ण हो गया था। २७-२८।

सागराः शोषमापन्नाश्चन्द्राकौँ प्रपलायितौ ।
उडूनि न्यपतन्व्योंम्नो भूमिर्दोलायिताभवत् ॥२९
दिङ्नागाश्चाभवंस्त्रस्ता मूर्च्छिताश्च दिवौकसः ।
शक्तीनां कटकं चासीदकांडत्रासविह्वलम् ॥३०
प्राणान्संधारयामासुः कथंचिन्मध्य आहवे ।
शक्तयो भयविभ्रश्यान्यायुधानि पुनर्दधुः ॥३१
वह्निप्राकारवलयं प्रशांतं पुनरुत्थितम् ।
दैत्येन्द्रसिंहनादेन चमूनाथधनुः स्वनैः ॥३२
क्रन्दनैश्चापि योद्धॄणामभूच्छब्दमयं जगत् ।
तेन नादेन महता भंडदैत्यविनिर्गमम् ।
निश्चित्य ललिता देवी स्वयं योद्धुं प्रचक्रमे ॥३३
अशक्यमन्यशक्तीनामाकलय्य महाहवम् ।
भंडदैत्येन दुष्टेन स्वयमुद्योगमास्थिता ॥३४
चक्रराजरथस्तस्याः प्रचचाल महोदयः ।
चतुर्वेदमहाचक्रपुरुषार्थमहाभयः ॥३५

समस्त सागर सूख गये थे। चन्द्र और सूर्य भी भाग गये थे। तारागण आकाश से गिर रहे थे और समस्त पृथ्वी काँप रही थी। २९। दिक्पाल भयभीत हो गये थे और देवगण मूच्छित हो गये थे उस समय में शक्तियों

भण्डासुर वध वर्णन ] [ ४०५

की सेना अकाण्डत्रास से विह्वल हो गयी थीं।३०। उस युद्ध में मध्य में किसी प्रकार से प्राणों को धारण किया था। शक्तियों ने भय से विश्रष्ट आयुधों को पुनः धारण किया था।३१। वह्नि प्राकार वलय प्रशान्त फिर उत्थित हो गया था। उस दैत्येन्द्र के सिंहनाद से और सेना यतियों के धनुषों को टङ्कारों से तथा योद्धाओं के कृन्दनों से समस्त जगत ही शाकायमान हो गया था। उस महान् नाद से भण्डासुर के समागमन का निश्चय करके ललिता देवी ने स्वयं ही युद्ध करने की इच्छा की थी।३२-३३। यह महान संग्राम शक्तियों के द्वारा नहीं किया जा सकता है ऐसा विचार करके दुष्ट भण्ड दैत्य के साथ स्वयं ही युद्ध करने के लिए उद्योग में समास्थित हुई थीं।३४। उसका चक्रराज रथ जो महान हृदय वाला था वहाँ से चल दिया था। चारों वेद उसके चक्र थे और पुरुषार्थ महान भय वाला था।३५।

आनन्दध्वजसंयुक्तो नवभिः पर्वभिर्युतः।
नवपर्वस्थदेवीभिराकृष्टगुरुधन्विभिः ॥३६॥
परार्द्धाधिकसंख्यातपरिवारसमृद्धिभिः ।
पर्वस्थानेषु सर्वेषु पालितः सर्वतो दिशम् ॥३७॥
दशयोजनमुन्नद्धश्चतुर्योजनविस्तृतः ।
महाराजीचक्रराजो रथेंद्रः प्रचलन्नभौ ॥३८॥
तस्मिन्प्रचलिते जुष्टे श्यामया दंडनाथया ।
गेयचक्रं तु बालाग्रे किरिचक्रं तु पृष्ठतः ॥३९॥
अन्यासामपि शक्तीनां वाहनानि परार्द्धशः ।
न सिंहोष्ट्रनरव्यालमृगपक्षियास्तथा ॥४०॥
गजभेरुण्डशरभव्याघ्रवातमृगास्तथा ।
एतादृशश्च तिर्यंचोऽप्यन्ये वाहनतां गताः ॥४१॥
मुहुरुच्चावचाः शक्तीर्भांडासुरवधोद्यताः ।
योजनायामविस्तारमपि तद्वारमंडलम् ।
वह्निप्राकारचक्रस्य न पर्याप्तं चमूपतेः ॥४२॥

वह रथ आनन्द की ध्वजा से युक्त था और उसमें नौ पर्व थे। नौ पर्वों पर देवियाँ स्थित थीं जिन्होंने बड़े-बड़े धनुषों को चढ़ा रक्खा था।३६।

४०६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

परार्ध से अधिक संख्या वाले परिवारों की समृद्धियों से समस्त पर्व स्थानों में सब दिशाओं में उसकी सुरक्षा भी थी ।३७। वह रथ दश योजन ऊँचा और चार योजन चौड़ा था। ऐसा वह महाराज्ञी का चक्रराज रथेन्द्र गमन करता हुआ शोभित हुआ था ।३८। श्यामा और दण्डनाथा के द्वारा सेवित वह रथ रवाना हुआ था। उस बाला के आगे गेय चक्र था ।३६। अन्य शक्तियों के भी वाहन परार्द्ध के नृसिंह—उष्ट्र—नर—व्याल—मृग—पक्षी और हय थे ।४०। हाथी—भेरूण्ड—व्याघ्र—वात—मृग ऐसे और तिर्यक योनि वाले भी उनके वाहन थे ।४१। बार-बार उच्चावच शक्तियाँ भंडासुर के वध करने के लिए उद्यत हुई थीं। उसका द्वारमंडल भी योजन आयाम विस्तार वाला था जो वह्निप्राकार चक्र के सेनापति को पर्याप्त नहीं था। ।४२।

ज्वालामालिनिका नित्या द्वारस्यात्यंतविस्तुतिम् ।
विततान समस्तानां सैन्यानां निर्गमैषिणी ॥४३॥
अथ सा जगतां माता महाराज्ञी महोदया ।
निर्जगामाग्निपुरतो वरद्वारात्प्रतापिनी ॥४४॥
देवदुन्दुभयो नेदुः पतिताः पुष्पवृष्टयः ।
महामुक्तातपत्रं तद्दिवि दीप्तमदृश्यत ॥४५॥
निमित्तानि प्रसन्नानि शंसकानि जयश्रियाः ।
अभवंल्ललितासैन्ये उत्पातास्तु द्विषां बले ॥४६॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं सेनयोरुभयोरपि ।
प्रसर्पद्विशिखैः स्तोमबद्धान्धतमसच्छटम् ॥४७॥
हन्यमानगजस्तोमसृतशोणितबिंदुभिः ।
ह्रीयमाणशिरश्छन्नदैत्यश्वेतातपत्रकम् ॥४८॥
न दिशो न नभो नापो न भूमिर्न च किंचन ।
दृश्यते केवलं दृष्टं रजोमात्रं च मूर्च्छितम् ॥४९॥

ज्वाला मालिनिका नित्या ने द्वारकी अत्यन्त विस्तुति को विस्तृत किया था। यह समस्त सेनाओं की निर्गम की चाहने वाली थी ।४३। इसके उपरान्त जगतों की माता महोदया महाराज्ञी प्रतापिनी वरद्वार से अग्निपुर

४०८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

उस नदी में थे । चक्र से कटे हुए करियों के समुदाय ही उसमें कूर्मों की परम्परा थीं ।५१। शक्तियों के द्वारा ध्वस्त महान् दैत्यों के गलगण्ड ही उस नदी में शिलोच्चय थे । जिनके काण्ड विलून होगये हैं ऐस चमर जो उसमें थे वे ही फेन थे ।५२। तीक्ष्ण जो असियां थीं वे ही बल्लरी थीं जिनके कारण उस नदी की तटभूमि निविड़ हो रही थी । दैत्यों के नेत्रों के श्रेणियाँ ही मुक्ति सम्पुट थे जिससे वह नदी भासुर थी ।५३। दैत्य वाहनों के समुदाय ही उस शोणित की नदी में सैकड़ों नक्र और मछलियाँ थीं जिनसे वह घिरी हुई थी । दोनों सेनाओं का युद्ध होने पर वहाँ रुधिर की नदी प्रवाहित हो रही थी ।५४। इसके अनन्तर श्री ललिता देवी और भण्ड का युद्ध हुआ था । उसमें अस्त्रों और प्रत्यस्त्र का ऐसा संक्षोभ हुआ था कि समस्त दिशायें तुमुलि कृत हो गयीं थीं ।५६।

धनुर्ज्यातलटंकारहुंकारैरतिभीषणः । तूणीरवदनात्कृष्टधनुर्वरविनिःसृतैः । विमुक्तैर्विशिखैर्भीमैराहवे प्राणहारिभिः ॥५७

हस्तलाघववेगेन न प्राज्ञायत किंचन । महाराज्ञीकरांभोजव्यापारं शरमोक्षणे । शृणु सर्वं प्रवक्ष्यामि कुम्भसंभव सङ्गरे ॥५८

संधाने त्वेकधा तस्य दशधा चापनिर्गमे । शतधा गगने दैत्यसैन्यप्राप्तौ सहस्रधा । दैत्यांगसंगे संप्राप्ताः कोटिसंख्याः शिलीमुखाः ॥५९

परांधकारं सृजती भिदती रोदसी शरैः । मर्माभिनत्प्रचंडस्य महाराज्ञी महेषुभिः ॥६०

वहत्कोपारुणं नेत्रं ततो भंडः स दानवः । ववर्ष शरजालेन महता ललितेश्वरीम् ॥६१

अन्धतामिस्रकं नाम महास्त्रं प्रमुमोच सः । महातरणिबाणेन तन्नुनोद महेश्वरी ॥६२

पाखंडास्त्रं महावीरो भंडः प्रमुमुचे रणे । गायत्र्यस्त्रं तस्य नुत्त्यै ससर्ज जगदम्बिका ॥६३॥

भंडासुर वध वर्णन ] [ ४०६

वह युद्ध धनुष की डोरी की टंकारों और हुङ्कारों से अत्यन्त भीषण हो गया था। तूणीर से निकालकर खींचे हुए धनुषों से छोड़े गये महान् भयंकर बाणों से जो युद्ध में प्राणों के हरण करने वाले थे वह रण बहुत ही भयानक था ।५७। शरों के छोड़ने में महाराज्ञी के कर कमलों का व्यापार हाथ की सफाई के वेग से कुछ भी नहीं जाना गया था । हे कुम्भ सम्भव ! संग्राम में जो हुआ था उस सबको मैं बतलाऊँगा—आप श्रवण कीजिए ।५८। वे बाण ऐसे थे कि सन्धान के समय में एक ही प्रकार का था—वही चाप से निकलने पर दश प्रकार का हो जाता था—गगन में सौ प्रकार का—दैत्यों की सेना में प्राप्त होने पर सहस्र प्रकार का होना था और दैत्यों के अङ्गों के संगम में सम्प्राप्त होकर करोड़ों प्रकार का हो जाता था ।५९। परान्धकार का सृजन करती हुई और रोदसी को शरों से भेदन करती हुई महाराज्ञी ने विशाल बाणों से प्रचण्ड के मर्मों का भेदन कर दिया था ।६०। भंड ने क्रोध से लाल नेत्रों को वहन करते हुए उस दैत्य ने बड़े भारी शरों के जालों की ललितेश्वरी के ऊपर वर्षा की थी ।६१। उसने अन्ध तामिस्र नाम वाले महास्त्र को छोड़ा था । महेश्वरी ने महातरणि बाण से उसको काट दिया था ।६२। महावीर भंड ने रण में पाखण्डास्त्र को छोड़ा था उसके निवारण के लिए जगदम्बा ने गायत्र्यस्त्र को छोड़ दिया था ।६३।

अन्धास्त्रमसृजद्भंडः शक्तिदृष्टिविनाशनम् ।
चाक्षुष्मतमहास्त्रेण शमयामास तत्प्रसः ॥६४॥
शक्तिनाशाभिधं भंडो मुमोचास्त्रं महारणे ।
विश्वावसोर्वास्त्रेण तस्य दर्पमपाकरोत् ॥६५॥
अन्तकास्त्रं ससर्जाच्चैः संक्रुद्धो भंडदानवः ।
महामृत्युञ्जयास्त्रेण नाशयामास तद्बलम् ॥६६॥
सर्वास्त्रस्मृतिनाशाख्यमस्त्रं भंडो व्यमुञ्चत ।
धारणास्त्रेण चक्रेशी तद्बलं समनाशयत् ॥६७॥
भयास्त्रमसृजद्भंडः शक्तीनां भीतिदायकम् ।
अभयंकरमैन्द्रास्त्रं मुमुचे जगदम्बिका ॥६८॥
महारोगास्त्रमसृजच्छक्तिसेनासु दानवः ।
राजयक्ष्मादयो रोगास्ततोऽभूवन्सहस्रशः ॥६९॥

४१० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तन्निवारणसिद्ध्यर्थं ललिता परमेश्वरी ।
नामत्रयमहामन्त्रमहास्त्रं सा मुमोच ह ॥७०॥

भंड ने दृष्टि के विनाशक अन्धास्त्र का प्रहार किया था। देवी ने चाक्षुष्मन्महास्त्र के द्वारा उसका शमन कर दिया था ।६४। उस महाररण में भंड ने शक्ति नाशक नाम वाले अस्त्र को छोड़ा था उसका दर्प विश्वावसु अस्त्र के प्रयोग से दूर कर दिया था ।६५। भंड दानव ने अन्तकास्त्र को छोड़ा था और बहुत क्रोधित हुआ था। उसके बल को देवी ने महामृत्युञ्जयास्त्र से दूर कर दिया था ।६६। फिर भंड ने सब अस्त्रों की स्मृति के विनाश करने वाले अस्त्र को छोड़ा था, चक्रेशी ने धारणास्त्र के द्वारा उसका विनाश कर दिया था ।६७। शक्तियों को भय देने वाले भयास्त्र का प्रयोग भंड ने किया था और जगदम्बिका ने अभयंकर ऐन्द्रास्त्र को छोड़ दिया था ।६८। दानव ने शक्तिसेनाओं में महारोगास्त्र छोड़ दिया था जिससे राजयक्ष्मा आदि सहस्रों रोग होते थे । उसके निवारण की सिद्धि के लिए परमेश्वरी ललितादेवी ने नाम त्रय महामन्त्र महास्त्र का प्रयोग किया था । ।६६-७०।

अच्युतश्चाप्यनंतश्च गोविन्दस्तु शरोत्थिताः ।
हुंकारमात्रतो दग्ध्वा रोगांस्ताननयन्मुदम् ॥७१

नत्वा च तां महेशानीं तद्भक्तव्याधिमर्दनम् ।
विधातुं त्रिषु लोकेषु नियुक्ताः स्वपदं ययुः ॥७२

आयुर्नाशनमस्त्रं तु मुक्तवान्भंडदानवः ।
कालसंकर्षणीरूपमस्त्रं राज्ञी व्यमुञ्चत ॥७३

महासुरास्त्रमुद्दामं व्यसृजद्भंडदानवः ।
ततः सहस्रशो जाता महाकाया महाबलाः ॥७४

मधुश्च कैटभश्चैव महिषासुर एव च ।
धूम्रलोचनदैत्यश्च चंडमुण्डादयोऽसुराः ॥७५

चिक्षुभश्चामरश्चैव रक्तबीजोऽसुरस्तथा ।
शुम्भश्चैव निशुम्भश्च कालकेया महाबलाः ॥७६

भंडासुर वध वर्णन ] [ ४११

धूम्राभिधानाश्च परे तस्मादस्त्रात्समुत्थिताः । ते सर्वे दानवश्रेष्ठाः कठोरैः शस्त्रमण्डलैः ॥७७॥

उस महेशानी को नमस्कार करके उसके भक्तों ने व्याधि मर्दन को करने के लिए तीनों लोकों में नियुक्त अपने स्थान को चले गये थे । शरों से उत्थित अच्युत-अनन्तर और गोविन्द हुङ्कार मात्र से ही रोगों को दग्ध करके उनको प्रसन्न किया था ।७१-७२। इसके उपरान्त उस महान् भीषण युद्ध स्थल में पराक्रमी फिर भण्ड ने आयुर्नाशन अस्त्र छोड़ा था और राज्ञी ने काल संकर्षिणी रूप अस्त्र को प्रयुक्त किया था ।७३। भंड दानव ने उद्दाम महासुरास्त्र को छोड़ दिया था । उससे सहस्रों ही महाकाय और महाबली उत्पन्न हो गये थे । मधु-कैटभ- महिषासुर-धूम्रलोचन और चंड-मुंड प्रभृति असुर थे ।७४-७५। चिक्षुम-चामर-रक्तबीज-निशुम्भ और महान् बलवान कालकेय थे ।७६। दूसरे धूमाभिधान वाले उस अस्त्र से उत्थित हो गये थे । वे सभी श्रेष्ठ दानव कठोर शस्त्रों के मंडलों से प्रहार कर रहे थे ।७७।

शक्तीसेना मर्दयन्तो नर्दन्तश्च भयंकरम् । हाहेति क्रन्दमानाश्च शक्तयो दैत्यमर्दिताः ॥७८॥ ललितां शरणं प्राप्ताः पाहि पाहीति सत्वरम् । अथ देवी भृशं क्रुद्धा रुषाट्टहासमातनोत् ॥७९॥ ततः समुत्थिता काचिद्दुर्गा नाम यशस्विनी । समस्तदेवतेजोभिर्निर्मिता विश्वरूपिणी ॥८०॥ शूलं च शूलिना दत्तं चक्रं चक्रिसमर्पितम् । शंखं वरुणदत्तञ्च शक्तिं दत्तां हविर्भुजा ॥८१॥ चापमक्षयतूणीरौ मरुद्दत्तौ महामृधे । वज्रिदत्तं च कुलिशं चषकं धनदार्पितम् ॥८२॥ कालदण्डं महादण्डं पाशं पाशधरार्पितम् । ब्रह्मदत्तां कुण्डिकां च घण्टामैरावतार्पिताम् ॥८३॥ मृत्युदत्तौ खड्गखेटौ हारं जलधिनार्पितम् । विश्वकर्मप्रदत्तानि भूषणानि च बिभ्रती ॥८४॥

४१२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

वे सब शक्ति सेना का मर्दन कर रहे थे और भयानक नर्दन कर रहे थे । हा-हा-कहकर क्रन्दन करती हुई शक्तियां दैत्यों से मर्दित हो रही थीं ॥७८॥ वे सभी शक्तियां ललिता देवी की शरण में शीघ्रता से प्राप्त हुई थीं और रक्षा करो-रक्षा करो ऐसा कह रही थीं । इसके पश्चात् वह देवी क्रोध से रुष्ट हो गई थी और उसने अट्टहास किया था ॥७९॥ फिर कोई दुर्गा नाम वाली उत्पन्न हुई थी जो बहुत यशस्विनी थी । यह विश्व रूपिणी सब देवों के तेजों से निर्मित हुई थी ।८०। उसको शूली ने शूल दिया था और विष्णु ने चक्र समर्पित किया था । वरुण ने शंख दिया था और अग्नि ने शक्ति दी थी ॥८१। उस युद्ध में मरुत् ने अक्षय चाप और तूणीर किया था । वज्री ने कुलिश दिया था और धनद ने नखरु दिया था । पाशधर ने काल-दंड-महादंड और पाश दिया था । ब्रह्मा ने कुण्डिका दी थी और ऐरावत ने घण्टा दिया था ॥८२।८३। मृत्यु ने खड्ग और खेट दिया था तथा जल विधि ने हार अर्पित किया था । विश्वकर्मा ने भूषण दिये थे जिनको वह धारण कर रही थी ।८४।

अङ्गैः सहस्रकिरणश्रेणिभासुररश्मिभिः ।
आयुधानि समस्तानि दीपयंति महोदयैः ॥८५
अन्यदत्तैरथान्यैश्च शोभमाना परिच्छदैः ।
सिंहवाहनमारुह्य युद्धं नारायणी व्यधात् ॥८६
तया ते महिषप्रख्या दानवा विनिपातिताः ।
चण्डिकासप्तशत्यां तु यथा कर्म पुराकरोत् ॥८७
तथैव समरं चक्रे महिषादिमदापहम् ।
तत्कृत्वा दुष्करं कर्म ललितां प्रणनाम सा ॥८८
मूकास्त्रमसृजद्दुष्टः शक्तिसेनासु दानवः ।
महावाग्वादिनी नाम ससर्जास्त्रं जगत्प्रसूः ॥८९
विद्यारूपस्य वेदस्य तस्करानसुराधमान् ।
ससर्ज तत्र समरे दुर्मदो भण्डदानवः ॥९०
दक्षहस्ताङ्गुष्ठनखान्महाराज्ञा तिरस्कृतः ।
अर्णवास्त्रं महावीरो भण्डदैत्यो रणेऽसृजत् ॥९१