भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४०६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

परार्ध से अधिक संख्या वाले परिवारों की समृद्धियों से समस्त पर्व स्थानों में सब दिशाओं में उसकी सुरक्षा भी थी ।३७। वह रथ दश योजन ऊँचा और चार योजन चौड़ा था। ऐसा वह महाराज्ञी का चक्रराज रथेन्द्र गमन करता हुआ शोभित हुआ था ।३८। श्यामा और दण्डनाथा के द्वारा सेवित वह रथ रवाना हुआ था। उस बाला के आगे गेय चक्र था ।३६। अन्य शक्तियों के भी वाहन परार्द्ध के नृसिंह—उष्ट्र—नर—व्याल—मृग—पक्षी और हय थे ।४०। हाथी—भेरूण्ड—व्याघ्र—वात—मृग ऐसे और तिर्यक योनि वाले भी उनके वाहन थे ।४१। बार-बार उच्चावच शक्तियाँ भंडासुर के वध करने के लिए उद्यत हुई थीं। उसका द्वारमंडल भी योजन आयाम विस्तार वाला था जो वह्निप्राकार चक्र के सेनापति को पर्याप्त नहीं था। ।४२।

ज्वालामालिनिका नित्या द्वारस्यात्यंतविस्तुतिम् ।
विततान समस्तानां सैन्यानां निर्गमैषिणी ॥४३॥
अथ सा जगतां माता महाराज्ञी महोदया ।
निर्जगामाग्निपुरतो वरद्वारात्प्रतापिनी ॥४४॥
देवदुन्दुभयो नेदुः पतिताः पुष्पवृष्टयः ।
महामुक्तातपत्रं तद्दिवि दीप्तमदृश्यत ॥४५॥
निमित्तानि प्रसन्नानि शंसकानि जयश्रियाः ।
अभवंल्ललितासैन्ये उत्पातास्तु द्विषां बले ॥४६॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं सेनयोरुभयोरपि ।
प्रसर्पद्विशिखैः स्तोमबद्धान्धतमसच्छटम् ॥४७॥
हन्यमानगजस्तोमसृतशोणितबिंदुभिः ।
ह्रीयमाणशिरश्छन्नदैत्यश्वेतातपत्रकम् ॥४८॥
न दिशो न नभो नापो न भूमिर्न च किंचन ।
दृश्यते केवलं दृष्टं रजोमात्रं च मूर्च्छितम् ॥४९॥

ज्वाला मालिनिका नित्या ने द्वारकी अत्यन्त विस्तुति को विस्तृत किया था। यह समस्त सेनाओं की निर्गम की चाहने वाली थी ।४३। इसके उपरान्त जगतों की माता महोदया महाराज्ञी प्रतापिनी वरद्वार से अग्निपुर