संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभण्डासुर वध वर्णन ] [ ४०५
की सेना अकाण्डत्रास से विह्वल हो गयी थीं।३०। उस युद्ध में मध्य में किसी प्रकार से प्राणों को धारण किया था। शक्तियों ने भय से विश्रष्ट आयुधों को पुनः धारण किया था।३१। वह्नि प्राकार वलय प्रशान्त फिर उत्थित हो गया था। उस दैत्येन्द्र के सिंहनाद से और सेना यतियों के धनुषों को टङ्कारों से तथा योद्धाओं के कृन्दनों से समस्त जगत ही शाकायमान हो गया था। उस महान् नाद से भण्डासुर के समागमन का निश्चय करके ललिता देवी ने स्वयं ही युद्ध करने की इच्छा की थी।३२-३३। यह महान संग्राम शक्तियों के द्वारा नहीं किया जा सकता है ऐसा विचार करके दुष्ट भण्ड दैत्य के साथ स्वयं ही युद्ध करने के लिए उद्योग में समास्थित हुई थीं।३४। उसका चक्रराज रथ जो महान हृदय वाला था वहाँ से चल दिया था। चारों वेद उसके चक्र थे और पुरुषार्थ महान भय वाला था।३५।
आनन्दध्वजसंयुक्तो नवभिः पर्वभिर्युतः।
नवपर्वस्थदेवीभिराकृष्टगुरुधन्विभिः ॥३६॥
परार्द्धाधिकसंख्यातपरिवारसमृद्धिभिः ।
पर्वस्थानेषु सर्वेषु पालितः सर्वतो दिशम् ॥३७॥
दशयोजनमुन्नद्धश्चतुर्योजनविस्तृतः ।
महाराजीचक्रराजो रथेंद्रः प्रचलन्नभौ ॥३८॥
तस्मिन्प्रचलिते जुष्टे श्यामया दंडनाथया ।
गेयचक्रं तु बालाग्रे किरिचक्रं तु पृष्ठतः ॥३९॥
अन्यासामपि शक्तीनां वाहनानि परार्द्धशः ।
न सिंहोष्ट्रनरव्यालमृगपक्षियास्तथा ॥४०॥
गजभेरुण्डशरभव्याघ्रवातमृगास्तथा ।
एतादृशश्च तिर्यंचोऽप्यन्ये वाहनतां गताः ॥४१॥
मुहुरुच्चावचाः शक्तीर्भांडासुरवधोद्यताः ।
योजनायामविस्तारमपि तद्वारमंडलम् ।
वह्निप्राकारचक्रस्य न पर्याप्तं चमूपतेः ॥४२॥
वह रथ आनन्द की ध्वजा से युक्त था और उसमें नौ पर्व थे। नौ पर्वों पर देवियाँ स्थित थीं जिन्होंने बड़े-बड़े धनुषों को चढ़ा रक्खा था।३६।