संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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व्योम के ही मार्ग से चल दिये थे। कुछ महारथी कुछ लोगों के स्कन्ध पर समारूढ़ होकर चले थे। २४। जब उस भंडासुर की सेनाएँ चली थीं तो कहीं पर भी स्थान नहीं रहा था। एक दूसरे से रगड़ खाकर पीड़ित से होते हुए जा रहे थे। न तो दिशाओं में न भूमि में ओर न नभ में वे समाये थे। बड़े ही दुःख से चल रहे थे। २५। अत्यन्त सेना के संमर्द से और रथों के पहियों से चूर्ण होते हुए जा रहे थे। कुछ हाथियों के पैरों से मर्दित होकर भूमि पर गिर गये थे। २६। इस रीति से उसके साथ सभी सैनिक गमन कर रहे थे और वज्रपात के समान उनने सिंहनाद किया था। उस प्रबल और बड़े भारी सिंहनाद से एवं कठोर से जो भंड के मुख से किया गया था सम्पूर्ण जगत विदीर्ण हो गया था। २७-२८।
सागराः शोषमापन्नाश्चन्द्राकौँ प्रपलायितौ ।
उडूनि न्यपतन्व्योंम्नो भूमिर्दोलायिताभवत् ॥२९
दिङ्नागाश्चाभवंस्त्रस्ता मूर्च्छिताश्च दिवौकसः ।
शक्तीनां कटकं चासीदकांडत्रासविह्वलम् ॥३०
प्राणान्संधारयामासुः कथंचिन्मध्य आहवे ।
शक्तयो भयविभ्रश्यान्यायुधानि पुनर्दधुः ॥३१
वह्निप्राकारवलयं प्रशांतं पुनरुत्थितम् ।
दैत्येन्द्रसिंहनादेन चमूनाथधनुः स्वनैः ॥३२
क्रन्दनैश्चापि योद्धॄणामभूच्छब्दमयं जगत् ।
तेन नादेन महता भंडदैत्यविनिर्गमम् ।
निश्चित्य ललिता देवी स्वयं योद्धुं प्रचक्रमे ॥३३
अशक्यमन्यशक्तीनामाकलय्य महाहवम् ।
भंडदैत्येन दुष्टेन स्वयमुद्योगमास्थिता ॥३४
चक्रराजरथस्तस्याः प्रचचाल महोदयः ।
चतुर्वेदमहाचक्रपुरुषार्थमहाभयः ॥३५
समस्त सागर सूख गये थे। चन्द्र और सूर्य भी भाग गये थे। तारागण आकाश से गिर रहे थे और समस्त पृथ्वी काँप रही थी। २९। दिक्पाल भयभीत हो गये थे और देवगण मूच्छित हो गये थे उस समय में शक्तियों