संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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धनुर्गुणं धनुर्दंडं खंडयंती शिलीमुखैः । अस्त्रेण ब्रह्मशिरसा ज्वलत्पावकरोचिषा ।।१०५
मद से अरुण लोचनों वाली अश्वारूढ़ा आदि ने डेढ़ सौ अक्षौहिणी को यमराज के पुर में भेज दिया था ।६६। अत्यन्त तीक्ष्ण अंकुश से अश्वारोहिणी ने युद्ध में उलूक जित् का उन्मथन करके उसे परलोक भेज दिया था ।१००। सम्पत्करी प्रभृति शक्ति दण्डाधिनायियों ने अपने कठोर प्रहार से परस्पर में अवरुद्धों को विदीर्ण कर दिया था ।१०१। सूर्य के अस्ताचलगामी होने पर समस्त सेना के ध्वस्त होने वाले विशुक्र के साथ कोपशालिनी श्यामा ने युद्ध किया था ।१०२। मन्त्रिणी ने अस्त्र प्रत्यस्त्रों के छोड़ने के द्वारा देवों को भी भीषण महान रण कृत्य से युद्ध किया था ।१०३। महान ओज वाले विशुक्र के परम तीक्ष्ण आयुधों का क्रम से खण्डन करती हुई उसने बाणों के द्वारा ध्वजा रथ के सारथि-धनुष की प्रत्यञ्चा-धनुष का खण्डन करती हुई जलती हुई अग्नि की कान्ति वाले ब्रह्मशिर अस्त्र से विशुक्र का मर्दन किया था ।१०४-१०५।
विशुक्रं मर्दयामास सोऽपतच्चूर्णविग्रहः । विषंगं च महादैत्यं दण्डनाथा मदोद्धता ।।१०६
योधयामास चंडेन मुसलेन विनिघ्नती । स चापि दुष्टो दनुजः कालदंडनिभां गदाम् । उद्यम्य बाहुना युद्धं चकाराशेषभीषणम् ।।१०७
अन्योन्यमंगं मृद्नंतौ गदायुद्धप्रवर्तिनौ । चण्डाट्टहासमुखरौ परिभ्रमणकारिणौ ।।१०८
कुर्वाणौ विविधांश्चारान्घूर्णंतौ तूर्णवेष्टिनौ । अन्योन्यदंडहननैर्मोहयंतौ मुहुर्मुहुः ।।१०६
अन्योन्यप्रहृतौ रंध्रमीक्षमाणौ महोद्धतौ । महामुसलदंडाग्रघट्टनक्षोभितांबरौ । अयुध्येतां दुराधर्षौ दंडिनीदैत्यशेखरौ ।।११०
अथार्द्धरात्रिसमयपर्यंतं कृतसंगरा ।