भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 809, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 809

विशुक्र विषंग वध वर्णन ] [ ३६६

संक्रुद्धा हन्तुमारेभे विषंगं दंडनायिका ॥१११ तं मूर्द्धनि निमग्नेन हलेनाकृष्य वैरिणम् । कठोरं ताडनं चक्रे मुसलेनाथ पोत्रिणी ॥११२ ततो मुसलघातेन त्यक्तप्राणो महासुरः । चूर्णितेन शतांगेन समं भूतलाश्रयत् ॥११३ इति कृत्वा महत्कर्म मंत्रिणीडंडनायिके । तत्रैव तं निशाशेषं निन्यतु शिविरं प्रति ॥११४

विशुक्र का ऐसा विमर्दन किया था कि वह चूर-चूर होकर भूमि पर गिर गया था। मदोद्धता दण्डनाथा ने महान् दैत्य विषंग के साथ युद्ध किया था और अपने प्रचण्ड मुसल से उस पर प्रहार किया था और वह दुष्ट दानव भी कालदण्ड के समान गदा को लेकर प्रस्तुत हो गया था और उसने बाहु से महान् भीषण युद्ध किया था।१०६-१०७। परस्पर में एक दूसरे का मर्दन करते हुए महान् गदा युद्ध में प्रवृत्त हुए थे। चण्ड चट्टहास से दोनों शब्दायमान हो रहे थे और उधर-उधर परिभ्रमण करने वाले थे।१०८। अनेक चारों को करते हुए घूर्णन करते थे और तूर्ण वेष्टी हो रहे थे। परस्पर में प्रहारों से एक दूसरे को बार-बार मूर्च्छित करते हुए दोनों मदोद्धत छिद्रों को देख रहे थे। मूसल के दण्ड के प्रघट्टन से अम्बर को क्षुब्ध करते हुए वे दुराधर्ष दंडिनी और वह दैत्य शिरोमणि युद्ध कर रहे थे ।१०६-११०। आधी रात तक युद्ध करने वाली दण्डनायिका ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर विषंग को मारना आरम्भ कर दिया था ।१११। इसके शिर में गढ़े हुए हल से उस शत्रु को खींचकर पोत्रिणी ने मुसल ने खूब ताड़न किया था ।११२। फिर मुंसल की चोट से महान् असुर गत प्राण वाला हुआ था और चूर्ण होकर भूमि पर गिर पड़ा था ।११३। उन मन्त्रिणी और दण्डनायिका ने यह महान् कर्म करके वहाँ पर ही शिविर में उस रात्रि को व्यतीत किया था ।११४।

---x---