संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 821, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ें४१२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
वे सब शक्ति सेना का मर्दन कर रहे थे और भयानक नर्दन कर रहे थे । हा-हा-कहकर क्रन्दन करती हुई शक्तियां दैत्यों से मर्दित हो रही थीं ॥७८॥ वे सभी शक्तियां ललिता देवी की शरण में शीघ्रता से प्राप्त हुई थीं और रक्षा करो-रक्षा करो ऐसा कह रही थीं । इसके पश्चात् वह देवी क्रोध से रुष्ट हो गई थी और उसने अट्टहास किया था ॥७९॥ फिर कोई दुर्गा नाम वाली उत्पन्न हुई थी जो बहुत यशस्विनी थी । यह विश्व रूपिणी सब देवों के तेजों से निर्मित हुई थी ।८०। उसको शूली ने शूल दिया था और विष्णु ने चक्र समर्पित किया था । वरुण ने शंख दिया था और अग्नि ने शक्ति दी थी ॥८१। उस युद्ध में मरुत् ने अक्षय चाप और तूणीर किया था । वज्री ने कुलिश दिया था और धनद ने नखरु दिया था । पाशधर ने काल-दंड-महादंड और पाश दिया था । ब्रह्मा ने कुण्डिका दी थी और ऐरावत ने घण्टा दिया था ॥८२।८३। मृत्यु ने खड्ग और खेट दिया था तथा जल विधि ने हार अर्पित किया था । विश्वकर्मा ने भूषण दिये थे जिनको वह धारण कर रही थी ।८४।
अङ्गैः सहस्रकिरणश्रेणिभासुररश्मिभिः ।
आयुधानि समस्तानि दीपयंति महोदयैः ॥८५
अन्यदत्तैरथान्यैश्च शोभमाना परिच्छदैः ।
सिंहवाहनमारुह्य युद्धं नारायणी व्यधात् ॥८६
तया ते महिषप्रख्या दानवा विनिपातिताः ।
चण्डिकासप्तशत्यां तु यथा कर्म पुराकरोत् ॥८७
तथैव समरं चक्रे महिषादिमदापहम् ।
तत्कृत्वा दुष्करं कर्म ललितां प्रणनाम सा ॥८८
मूकास्त्रमसृजद्दुष्टः शक्तिसेनासु दानवः ।
महावाग्वादिनी नाम ससर्जास्त्रं जगत्प्रसूः ॥८९
विद्यारूपस्य वेदस्य तस्करानसुराधमान् ।
ससर्ज तत्र समरे दुर्मदो भण्डदानवः ॥९०
दक्षहस्ताङ्गुष्ठनखान्महाराज्ञा तिरस्कृतः ।
अर्णवास्त्रं महावीरो भण्डदैत्यो रणेऽसृजत् ॥९१