भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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भंडासुर वध वर्णन ] । ४१३

सहस्रों किरणों की श्रेणियां सेनापुर अङ्गों से सहस्रों आयुधों आयुधों को दीप्त कर रही थीं। अन्यों के द्वारा दिये हुए परिच्छदों से यह शोभमान थी और सिंह के वाहन पर आरूढ़ होकर उस नारायणी ने युद्ध किया था। उसने वे महिष मुख्य जो दानव थे वे सब मार गिराये थे। चण्डिका ने सप्तशती में पहिले जो कर्म किया था। ८५-८७। उसी भाँति से महिष प्रभृति के मद का अपहारक युद्ध किया था। उस महान दुष्कर कर्म को करके उसने ललिता देवी को प्रणाम किया था। ८८। उस दुष्ट दानव ने शक्तियों की सेना में मूकास्त्र छोड़ा था। उसके प्रतिकार के लिए जगदम्बाने महा वाग्वादिनी नामक अस्त्र का प्रयोग किया था। ८६। उस दुष्ट दानव ने तस्कर अधम असुरों के ऊपर विद्या रूप वेद का सृजन किया था । ६०। महाराज्ञी ने दाहिने हाथ के अँगूठे के नख से उसका तिरस्कार कर दिया था। भण्ड-दैत्य ने अणवास्त्र का रण में प्रयोग किया था । ६१।

तत्रोद्दामपयः पूरे शक्तिसैन्यं ममज्ज च । अथ श्रीललितादक्षहस्ततर्जनिकानखात् । आदिकूर्मः समुत्पन्नो योजनायतविस्तरः ॥६२ धृतास्तेन महाभोगखर्परेण प्रथीयसा । शक्तयो हर्षमापन्नाः सागरास्त्रभयं जहुः ॥६३ तत्सामुद्रं च भगवान्सकलं सलिलं पपौ । हैरण्याक्षं महास्त्रं तु विजहौ दुष्टदानवः ॥६४ तस्मात्सहस्रशो जाता हिरण्याक्षा गदायुधाः । तैर्हन्यमाने शक्तीनां सैन्ये सन्त्रासविह्वले । इतस्ततः प्रचलिते शिथिले रणकर्मणि ॥६५ अथ श्रीललितादक्षहस्तमध्याङ्गुलीनखात् । महावराहः समभूच्छ्वेतः कैलाससंनिभः ॥६६ तेन वज्रसमानेन पोत्रिणाभिविदारिताः । कोटिशस्ते हिरण्याक्षा मर्द्यमानाः क्षयं गताः ॥६७ अथ भण्ड स्तवतिक्रोधाद्भ्रुकुटीं विततान ह । तस्य भ्रुकुटितो जाता हिरण्याः कोटिसंख्यकाः ॥६८