संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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वहाँ पर उद्दाम पूर्ण जल के समुदाय में शक्ति सेना को डुबा दिया था इसके अनन्तर श्री ललिता के दाहिने हाथ की तर्जनी के नख से योजन पर्यन्त आयत विस्तार से युक्त आदि कूर्म समुत्पन्न हुआ था ।६२। उस महान प्रथीय़ान भोग खर्पर से धारण किया था । शक्तियां बहुत हर्षित हुई थीं और उन्होंने सागरास्त्र का भय त्याग दिया था ।६३। उस समुद्र जल को पूर्ण रूप से भगवान् कूर्म ने जल का पान कर लिया था । दुष्ट दानव ने हैरण्याक्ष महान् अस्त्र को छोड़ा था ।६४। उससे सहस्रों हिरण्याक्ष गदा लिये हुए थे । उनके द्वारा शक्तियों के हन्यमान होने पर शक्ति सेना में संत्रास से विह्वलता हो गयी और वे रण के कर्म से शिथिल होकर इधर-उधर चलने लग गयीं थीं।६५। इसके उपरान्त श्री ललितादेवी के दक्षिण हाथ की मध्यमा अंगुलि के नख से कैलास के समान श्वेत महान वराह उत्पन्न हुए थे ।६६। उसने वज्र के समान पोत्रि से करोड़ों हिरण्याक्ष विदीर्ण कर दिये थे और मर्दित होते हुए वे सब क्षीण हो गये थे ।६७। इसके पश्चात् भंडासुर ने महान क्रोध से भौंहें तान ली थीं । उसकी भृकुटी से करोड़ों हिरण्य समुत्पन्न हुए थे ।६८।
ज्वलदादित्यवद्दीप्ता दीपप्रहरणाश्च ते ।
अमर्द्यञ्छक्तिसैन्यं प्रह्लादं चाप्यमर्द्यन् ।।६६
यः प्रह्लादोऽस्ति शक्तीनां परमानन्दलक्षणः ।
स एव बालको भूत्वा हिरण्यपरिपीडितः ।।१००
ललितां शरणं प्राप्तस्तेन राज्ञी कृपामगात् ।
अथ शक्त्या नन्दरूपं प्रह्लादं परिरक्षितुम् ।।१०१
दक्षहस्तानामिकाग्रं धुनोति स्म महेश्वरी ।
तस्माद् धूतसटाजालः प्रज्वलल्लोचनत्रयः ।।१०२
सिंहास्यः पुरुषाकारः कंठस्याधो जनार्दनः ।
नखायुधः कालरुद्ररूपी घोराट्टहासवान् ।।१०३
सहस्रसंख्यदोर्दण्डो ललिताज्ञानुपालकः ।
हिरण्यकशिपुन्सर्वान्भंडभ्रुकुटिसंभवान् ।।१०४
क्षणाद्विदारयामास नखैः कुलिशकर्कशैः ।
अमुञ्चल्ललिता देवी प्रतिभंडमहासुरम् ।।१०५