संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
विशुक्र विषंग वध वर्णन ] [ ३८३
विशुक्र विषंग वध वर्णन
समाप्तश्च द्वितीययुद्धदिवसः—
रणे भग्नं महादैत्यं भण्डदैत्यः सहोदरम् ।
सेनानां कदनं श्रुत्वा सन्तप्तो बहुचिन्तया ॥१॥
उभावपि समेतौ तौ युक्तौ सर्वैश्च सैनिकैः ।
प्रेषयामास युद्धाय भण्डदैत्यः सहोदरौ ॥२॥
तावुभौ परमक्रुद्धौ भण्डदैत्येन देशितौ ।
विषंगश्च विशुक्रश्च महोद्यममवापतुः ॥३॥
कनिष्ठसहितं तत्र युवराजं महाबलम् ।
विशुक्रमनुवव्राज सेना त्रैलोक्यकम्पिनी ॥४॥
अक्षौहिणीचतुः शत्या सेनानामावृतश्च सः ।
युवराजः प्रववृधे प्रतापेन महीयसा ॥५॥
उलूकजित्प्रभृतयो भागिनेया दशोद्धताः ।
भंडस्य च भगिन्यां तु धूमिन्यां जातयोनयः ॥६॥
कृतास्त्रशिक्षा भंडेन मातुलेन महीयसा ।
विक्रमेण बलन्तस्ते सेनानाथाः प्रतस्थिरे ॥७॥
रण में अपने सहोदर महादैत्य को भग्न हुआ देखकर और सेनाओं का रुदन सुनकर भंड दैत्य अधिक चिन्ता से सन्तप्त हो गया था ।१। फिर भंड दैत्य ने दो सहोदरों को जो सब सैनिकों से संयुत थे युद्ध करने के लिए वहाँ पर भेजा था ।२। वे दोनों भाई परमाधिक क्रुद्ध हो रहे थे और भंड दैत्य के द्वारा उन्हें आज्ञा दी गयी थी । फिर विशुक्र और विषंग ने महान उद्यम को प्राप्त किया था ।३। वहाँ पर छोटे भाई के सहित महान बल वाले युवराज को भी पीछे भेजा था । उसकी सेना तीनों लोकों को कम्पन देने वाली थी ।४। वह चार सौ अक्षौहिणी सेनाओं से आवृत था । युवराज महान प्रताप से बढ़ गया था ।५। उलूकजित् प्रभृति उसके दश भानजे थे जो बहुत ही उद्धत थे और भंड की धूमिनी भगिनी में समुत्पन्न हुए थे ।६। महान मातुल भंड के द्वारा ही उनको अस्त्रों की शिक्षा दी गयी थीं । वे विक्रम से बलन करते हुए सेनापति भी रवाना हुए थे ।७।
३८४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
प्रोद्गतैश्चापनिर्घोषैर्घोषयन्तो दिशो दश ।
द्वयोर्मातुलयोः प्रीतिं भागिनेया वितेनिरे ॥८
आरूढयानाः प्रत्येकं गाढाहंकारशालिनः ।
आकृष्टगुरुधन्वानो विशुक्रं मनुवव्रजुः ॥९
यौवराज्यप्रभाचिह्नच्छत्रचामरशोभितः ।
आरूढवारणः प्राप विशुक्रो युद्धमेदिनीम् ॥१०
ततः कलकलारावकारिण्या सेनया वृतः ।
विशुक्रः पटु दध्वान सिंहनादं भयंकरम् ॥११
तत्क्षोभात्क्षुभितस्वान्ताः शक्तयः संभ्रमोद्धताः ।
अग्निप्राकारवलयान्निर्जग्मुर्बद्धपङ्क्तयः ॥१२
तडिन्मयमिवाकाशं कुर्वत्यः स्वस्वरोचिषा ।
रक्ताम्बुजावृतमिव व्योमचक्रं रणोन्मुखाः ॥१३
अथ भंडकनीयांसावागतौ युद्धदुर्मदौ ।
निशम्य युगपद्योद्धुं मंत्रिणिदंडनायके ॥१४
वे प्रोद्गत धनुषों की ध्वनियों से दश दिशाओं को भर रहे थे । उन दोनों मातुलों की प्रीति को उन भानजों ने विस्तृत किया था ।८। प्रत्येक गहरे अहंकार वाले यानों पर समारूढ़ हुए थे । उन्होंने धनुषों को चढ़ाकर विशुक्र के पीछे अनुगमन किया था ।९। यौवराज्य की प्रभा के चिह्न छत्र और चामरों से शोभित वारण पर समारूढ़ होकर विशुक्र युद्ध भूमि में प्राप्त हुआ था ।१०। इसके पश्चात् कलकल के घोष को करने वाली सेना से समावृत विशुक्र ने महान भयंकर सिंहनाद किया था ।११। उसके क्षोभ से क्षुब्ध हृदयों वाली शक्तियां संभ्रम से उद्धत हो गई थीं और पंक्तियां बांधकर वे उस अग्नि के प्राकार के वलय से निकली थी ।१२। अपनी कान्ति से आकाश को विद्युत से परिपूर्ण कर रही थीं । रण को उन्मुख उन्होंने व्योम चक्र को रक्त कमल के सदृश बना दिया था ।१३। इसके बाद भंड के दोनों छोटे भाई वहाँ पर समागत हो गये थे जो युद्ध दुर्मद थे । एक ही साथ युद्ध करने के लिए आये हुए उनको मन्त्रिणी और दण्डनायिका ने सुना था ।१४।
विशुक्र विषंग वध वर्णन ] [ ३८५
किरिचक्रं ज्ञेयचक्रमारूढे रथशेखरम् । धृतातपत्रवलये चामराभ्यां च वीजिते ॥१५ अप्सरोभिः प्रनृत्ताभिर्गीयमानमहोदये । निर्जग्मतू रणं कर्तुमुभाभ्यां ललिताज्ञया ॥१६ श्रीचक्ररथराजस्य रक्षणार्थं निवेशिते । शताक्षौहिणिकां सेनां वर्जयित्वास्त्रभीषणम् ॥१७ अन्यत्सर्वं चमूजालं निर्जगाम रणोन्मुखी । पुरतः प्राचलद्दण्डनाथा रथनिषेदुषी ॥१८ एकयैव कराङ्गुल्या घूर्णयन्ती हलायुधम् । मुसलं चान्यहस्तेन भ्रामयन्ती मुहुर्मुहुः ॥१९ तरलेन्दुकलाचूडास्फुरत्पोत्रमुखाम्बुजा । पुरः प्रहर्त्री समरे सर्वदा विक्रमोद्धता । अस्या अनुप्रचलिता गेयचक्ररथस्थिता ॥२० धनुषो ध्वनिना विश्वं पूरयन्ती महोद्धता । वेणीकृतकचन्यस्तविलसच्चन्द्रपल्लवा ॥२१
उन दोनों ने रथों में शिरोमणि किरिचक्र और ज्ञेय चक्र रथों पर समारोहण किया था। उन दोनों ने छत्रों को धारण किया था और चमर उन पर ढुलाये जा रहे थे। वे दोनों ही प्रवृत्त अप्सराओं के द्वारा ले जायी जा रही थीं। वे दोनों ही ललिता देवी की आज्ञा पाकर युद्ध करने के लिए वहाँ से निकल कर चलीं थीं ।१५-१६। श्री चक्रराज रथ की रक्षा के लिए ये निवेशित थीं। इन्होंने सौ अक्षौहिणी सेना और भीषण अस्त्रों को वर्जित कर दिया था ।१७। अन्य समस्त चमू का जाल के साथ रण को उन्मुखी वह निकल कर चली थी। आगे रथ पर बैठी हुई दंडनाथा रवाना हुई थी ।१८। वह एक ही की अंगुली से हलायुध को घुमाती हुई और दूसरे हाथ से मुसल को बार-२ घुमा रही थी ।१९। तरल चन्द्र की कला से स्फुरण करते हुए पोत्र मुखकमल वाली वह युद्धमें सबसे आगे सदा वह विक्रम से उद्धत रहती थी। इसके पीछे गेय चक्र रथ में विराजमान अनुगमन कर रही थी ।२०। यह मद से उद्धत धनुष की ध्वनि से सम्पूर्ण विश्व को भर रही थी। उसने अपने
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जूड़े की चोटी बनी रक्खी थी। जिसमें चन्द्र की कला शोभित हो रही थी ॥२१॥
स्फुरत्त्रितननेत्रेण सिन्दूरतिलकत्विषा । पाणिना पद्मरम्येण मणिकंकणचारुणा ॥२२ तूणीरमुखतः कृष्टं भ्रामयन्ती शिलीमुखम् । जय वर्धस्ववर्धस्वेत्यतिहर्षसमाकुले ।२३ नृत्यद्भिर्दिव्यमुनिभिर्वर्द्धिताशीर्वचोऽमृतैः । गेयचक्ररथेन्द्रस्य चक्रनेमिविघट्टनैः ॥२४ दारयन्ती क्षितितलं दैत्यानां हृदयैः सह । लोकातिशायिता विश्वमनोमोहनकारिणा । गीतिबन्धेनामरीभिर्बह्वीभिर्गीतवैभवा ॥२५ अक्षौहिणीसहस्त्राणामष्टकं समरोद्धतम् । कर्षती कल्पविश्लेषणनिर्मर्यादाब्धिसंनिभम् ॥२६ तस्याः शक्तिचमूचक्रे काश्चित्कनकरोचिषः । काश्चिद्दाडिमसंकाशाः काश्चिज्जीमूतरोचिषः ॥२७ अन्याः सिंदूररुचयः पराः पाटलपाटलाः । काश्चाद्रिकाम्बराः काश्चित्पराः श्यामलकोमलाः ॥२८
स्फुरित तीन नेत्रों वाली और सिन्दूर के तिलक की कान्ति वाली देवी ने पद्म के तुल्य सुन्दर और मणियों के कंकण की कान्ति से सम्पन्न कर से तूणीर के मुख से खींचे हुए बाण को घुमा रही थी। वहाँ पर वर्धन हो—वर्धन हो—इसकी ध्वनि चारों ओर हो रही थी ।२२-२३। दिव्य मुनि-गण प्रसन्नता से नृत्य करते हुए वचनामृतों से आशीर्वाद दे रहे थे। गेय चक्र रथेन्द्र के पहियों का विघटन हो रहा था। इससे दैत्यों के हृदय के साथ ही भूमि को विदीर्ण कर रही थी। उस समय में गीतों का भी बन्ध चल रहा था जो अलौकिक और विश्व के मन को मोहन करने वाला था। बहुत-सी मरीचियां गीत का गान कर रही थी ।२४-२५। आठ हजार अक्षौहिणी सेना समर की उद्धत थी। कल्पान्त में मर्यादा से रहित सागर के
विशुक विशंग वध वर्णन ] [ ३८७
समान ही वह कर्षण कर रही थी ।२६। उसकी शक्तियों की सेना के चक्र में विविध वेषभूषा वाली शक्तियाँ विद्यमान थीं । कुछ की कांति तो सुवर्ण के समान थी—कुछ दाड़िम के तुल्य थीं और कुछ मेघों के तुल्य थीं ।२७। अन्य सिन्दूर जैसी कान्ति वाली थीं—कुछ पाटल वर्ण की थीं—कुछ कांच के अम्बरों की महाद्रि के सदृश थीं और दूसरी श्यामल एवं कोमल थीं ।२८।
अन्यास्तु हीरकप्रख्याः परा गरुत्मतोपमाः । विरुद्धैः पञ्चभिर्बाणैर्मिश्रितैः शतकोटिभिः ॥२९॥ व्यञ्जयंत्यो देहरुचं कतिचिद्विविधायुधाः । असंख्याः शक्तयश्चेलुर्दण्डिन्यास्सैनिकैस्तथा ॥३०॥ तथैव सैन्यसन्नाहो मन्त्रिण्याः कुम्भसम्भव । यथा भूषणवेषादि यथा प्रभावलक्षणम् ॥३१॥ यथा सद्गुणशालित्वं यथा चाश्रितलक्षणम् । यथा दैत्यौघसंहारो यथा सर्वैश्च पूजिता ॥३२॥ यथा शक्तिर्महाराज्ञ्या दण्डिन्याश्च तथाखिलम् । विशेषस्तु परं तस्याः साचिव्ये तत्करे स्थितम् । महाराज्ञीवितीर्णं तदाज्ञामुद्रांगुलीयकम् ॥३३॥ इत्थं प्रचलिते सैन्ये मंत्रिणीदण्डनाथयोः । तद्भारभंगुरा भूमिर्दोलालीलामलंबत ॥३४॥ ततः प्रवृत्ते युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् । उद्धृतधूलिजंबालीभूतसप्तार्णवीजलम् ॥३५॥
अन्य हीरे के सदृश थीं और कुछ गरुत्मत मणि के समान थीं । विरुद्ध पाँच बाणों से मिश्रित शत कोटियों से कुछ अनेक आयुधों वाली अपनी शारीरिक कान्ति को प्रकाशित कर रही थीं । ऐसी अगणित शक्तियाँ दण्डिनी के सैनिकों के साथ वहाँ पर युद्ध के लिए चली थीं ।२९-३०। हे कुम्भसम्भव ! जैसा उनका भूषण-वेषादि था और प्रभाव का लक्षण था वैसा ही मन्त्रिणी की सेना का भी सन्नाह भी था ।३१। जैसी सद्गुण शालिता थी और जो भी आश्रितों का लक्षण था तथा जैसा भी दैत्यों के
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समुदाय का संहार था वैसी ही वे सबके द्वारा पूजित भी हुई थीं ।३२। महाराज्ञी की जैसी शक्ति थी वैसी ही सम्पूर्ण दंडिनी की भी थी किन्तु विशेषता यही थी कि उसके हाथ में साचिव्य था। महाराज्ञी ने उसकी आज्ञा की मुद्रांगुलीयक वितीर्ण कर दी थी ।३३। मन्त्रिणी और दण्डनाथा की सेना इस प्रकार से चली थी। उस सेना के भार से यह भूमि भगुर हो गयी थी और वह झूला की तरह ही हिलने लग गयी थी ।३४। इसके अनन्तर महान् तुमुल और रोमहर्षण युद्ध प्रवृत्त हो गया था। उस युद्ध में उठी हुई धूलि में जो जम्बाल के ही समान हो गयी थी सातों सागरों के जल को छा लिया था ।३५।
हयस्थैर्ह्ययसादिन्यो रथस्थै रथसस्थिताः । आधोरणैर्हस्तिपकाः खड्गैः पद्गाश्च सङ्गताः ॥३६॥ दण्डनाथाविषंगेण समयुध्यंत सङ्गरे । विशुक्रेण समं श्यामा विकृष्टमणिकार्मुका ॥३७॥ अश्वारूढा चकारोच्चैः सहोलूकजिता रणम् । सम्पदीशा च जग्राह पुरुषेण युयुत्सया ॥३८॥ विषेण नकुली देवी समाहवास्त युयुत्सया । कुन्तिषेणेन समरं महामाया तदाकरोत् ॥३९॥ मलदेन समं चक्रे युद्धमुन्मत्तभैरवी । लघुश्यामा चकारोच्चैः कुशूरेण समं रणम् ॥४०॥ स्वप्नेशी मंगलाख्येन दैत्येन्द्रेण रणं व्यधात् । वाग्वादिनी तु जघटे द्रुघणेन समं रणे ॥४१॥ कोलाटेन च दुष्टेन चण्डकाल्यकरोद्रणम् । अक्षौहिणीभिर्दैत्यानां शताक्षौहिणिकास्तथा । महान्तं समरे चक्रू रन्योन्यं क्रोधमूर्च्छिताः ॥४२॥
जो अश्वों पर सवार थे उन्होंने घुड़ सवारों के साथ—एवं हस्तिपकों ने आधोरणों के साथ और पदातियों ने पैदल सैनिकों से सङ्गत होकर खड्गों से युद्ध किया था ।३६। संग्राम में दण्डनाथा ने विषङ्ग के साथ युद्ध था। अपने मणियों के कार्मुक को खींचकर श्यामा ने विशुक्र के साथ युद्ध
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किया था ।३७। अश्वारूढ़ा ने बहुत भारी उलूक जितु के साथ रण किया था सम्पद्दीक्षा ने युद्ध की इच्छा से पुरुष के साथ युद्ध ग्रहण किया था ।३८। नकुली देवी ने युद्ध करने की इच्छा से विष को बुलाया था। माहमाया ने कुन्तिषेण के साथ युद्ध किया था ।३६। उन्मत्त भैरवी ने मलद के साथ संग्राम किया था और लघुश्यामा ने कुशूर के साथ रण किया था ।४०। स्वप्नेशी ने मङ्गल के साथ युद्ध किया था। वाग्वादिनी ने द्रुघण के साथ रण में भिड़न्त की थी ।४१। चण्डकाली ने कोलाट के साथ रण किया था। दैत्यों की अक्षौहिणियों के साथ सौ अक्षौहिणी सेनाओं ने परस्पर में बड़ा भारी युद्ध क्रोध में मूर्च्छित होकर किया था ।४२।
प्रवर्त्तमाने समरे विशुक्रो दुष्टदानवः ।
वर्धमानां शक्तिचमूं हीयमानां निजां चमूम् ॥४३॥
अवलोक्य रुषाविष्टः स कृष्टगुरुकार्मुकः ।
शक्तिसैन्ये समस्तेऽपि तृषास्त्रं प्रमुमोच ह ॥४४॥
तेन दावानलज्वालादीप्तेन मथितं बलम् ।
तृतीये युद्धदिवसे याममात्रं गते रवौ ।
विशुक्रमुक्ततर्षास्त्रव्याकुलाः शक्तयोऽभवन् ॥४५॥
क्षोभयन्निन्द्रियग्रामं तालुमूलं विशोषयन् ।
रूक्षयन्कर्णकुहरमंगदौर्बल्यमावहन् ॥४६॥
पातयन्पृथिवीपृष्ठे देहं विस्रंसितायुधम् ।
आविर्बभूव शक्तीनाममिततीव्रतृषाज्वरः ॥४७॥
युद्धेष्वनुद्यमकृता सर्वोत्साहविरोधिना ।
तर्षेण तेन क्वथितं शक्तिसैन्यं विलोक्य सा ।
मन्त्रिणी सह पोत्रिण्या भृशं चिंतामवाप ह ॥४८॥
उवाच तां दण्डनाथामत्याहितविशंकिनीम् ।
रथस्थिता रथगतां तत्प्रतीकारकर्मणे ।
सखि पोत्रिणि दुष्टस्य तर्षास्त्रमिदमागतम् ॥४९॥
३६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
उस युद्ध के प्रवृत्त होने पर दुष्ट दानव विशुक्र ने जब यह देखा था कि शक्तियों की सेना बढ़ रही है और अपनी क्षीण हो रही है तो क्रोध में भरकर उसने एक बड़ा धनुष खींचा था और उस समस्त शक्तियों की सेना में तृषास्त्र छोड़ दिया था । ४३-४४। उसने जो दावानल की ज्वाला के समान दीप्त था उस बड़ी सेना को मथ दिया था । तीसरे युद्ध के दिन में एक प्रहर मात्र रवि के गत होने पर विशुक्र के द्वारा छोड़े हुए तृषास्त्र से शक्तियां व्याकुल हो उठी थीं ।४५। उन तालु के मूल का शोषण कर रहा था। कानों के छिद्र भी रूक्ष हो रहे थे और अङ्गों में दुर्बलता हो रही थी तथा आयुधों को छोड़कर देहों को भूमि पर गिरा रहा था । ४६-४७। युद्ध में अनुद्यम करने वाले तथा समस्त उत्साह के विरोधी उस तर्ष के द्वारा क्व- थित शक्तियों की सेना को देखकर वह मन्त्रिणी पोत्रिणी के साथ बहुत ही चिन्तित हो गयी थी ।४८। अतीव अहित विशंका वाली उस दण्डनाथा से बोली रथ में स्थित और रथगता होकर उसके प्रतिकार कर्म के लिए कहा था हे सखि ! पोत्रिणि ! यह दुष्ट का तृषास्त्र आ गया है । इसका हमारी सेना पर बहुत ही बुरा प्रभाव हो गया है ।४९।
शिथिलीकुरुते सैन्यमस्माकं हा विधेः क्रमः । विशुष्कतालिमूलानां विभ्रष्टायुधतेजसाम् । शक्तीनां मंडलेनात्र समरे समुपेक्षितम् ॥५० न कापि कुरुते युद्धं न धारयति चायुधम् । विशुष्कतालिमूलत्वाद्वक्तुमप्यालि न क्षमाः ॥५१ ईदृशीन्नो गतिं श्रुत्वा किं वक्ष्यति महेश्वरी । कृता चापकृतिर्दैत्यैरुपायः प्रविचिंत्यताम् ॥५२ सर्वत्र द्वयष्टसाहस्राक्षौहिण्यामत्र पोत्रिणि । एकापि शक्तिर्नैवास्ति या तर्षेण न पीडिता ॥५३ अत्रैवावसरे दृष्ट्वा मुक्तशस्त्रा पताकिनीम् । रंध्रप्रहारिणो हंत बाणैर्निघ्नंति दानवाः ॥५४ अत्रोपायस्त्वया कार्यो मया च समरोद्यमे । त्वदीयरथपर्वस्थो योऽस्ति शीतमहार्णवः ॥५५
विशुक्र विषंग वध वर्णन ] [ ३६१
तमादिश समस्तानां शक्तीनां तर्षनुत्तये । नाल्पैः पानीयपानाद्यैरेतासां तर्षसंक्षयः ॥५६॥
हा ! विधाता का क्या क्रम है । यह अस्त्र तो हमारी सेना को शिथिल कर रहा है । सबके तालुमूल सूख गये हैं और सबके आयुध भ्रष्ट हो गये हैं । इस युद्ध में शक्तियों का मण्डल उपेक्षित हो गया है ।५०। न तो कोई भी युद्ध करती है और न कोई आयुध ही ग्रहण कर रही है । हे आलि ! तालुमूलों के शुष्क हो जाने से ये तो बोलने में भी असमर्थ हो गयी हैं ।५१। हमारी ऐसी दशा को सुनकर महेश्वरी क्या कहेगी । दैत्यों ने तो हमारा बड़ा ही अपकार किया है । इसका कोई उपाय सोचना चाहिए ।५२। हे पोत्रिणि ! सोलह हजार सर्वत्र यहाँ पर अक्षौहिणी हैं । ऐसी एक भी शक्ति नहीं है जो तर्ष से पीड़ित न होवे ।५३। इसी अवसर सेना को हथियारों को छोड़ने वाली देखकर ये दानव छिद्रों में प्रहार करने वाले हैं और बाणों से निहनन कर रहे हैं । यह बड़े ही खेद की बात है ।५४। यहाँ पर तुमको और मुझको कोई उपाय करना चाहिए । उस समरोद्यम में कुछ करना ही है । तुम्हारे रथ के पर्व में स्थित जो शीत का महार्णव है ।५५। उसको ही शक्तियों की तृषा के छेदन के लिए आदेश दो क्योंकि अल्प पानीय के पानों से उनकी तृषा का क्षय नहीं होगा ।५६।
स एव मदिरासिंधुः शक्त्यौघं तर्पयिष्यति । तमादिश महात्मानं समरोत्साहकारिणम् । सर्वतर्षप्रशमनं महाबलविवर्धनम् ॥५७॥ इत्युक्ते दण्डनाथा सा सदुपायेन हर्षिता । आजुहाव सुधासिंधुमाज्ञां चक्रेश्वरी रणे ॥५८॥ स मदालसरक्ताक्षो हेमाभः स्रग्विभूषितः ॥५९॥ प्रणम्य दण्डनाथां तां तदाज्ञापरिपालकः ॥६०॥ आत्मानं बहुधा कृत्वा तरुणादित्यपाटलम् । क्वचित्तापिज्छवच्छ्यामं क्वचिच्च धवलद्युतिम् ॥६१॥ कोटिशो मधुराधारा करिहस्तसमाकृतीः । ववर्ष सिंधुराजोऽय वायुना बहुलीकृतः ॥६२॥
३६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
पुष्करावर्तकाद्यैस्तु कल्पक्षयबलाहकैः ।
निषिच्यमानो मध्येऽब्धिः शक्तिसैन्ये पपात ह ॥६३॥
वही मदिरा का सिन्धु शक्तियों के समूहों को तृप्त करेगा। समर के उत्साह करने वाले महान आत्मा वाले उसी को आदेश दो। वह समस्त तर्ष का प्रशमन करने वाला है और महान बल के बढ़ानेवाला है ।५७। ऐसा कहने पर वह दण्डनाथा इस समुदाय से परम हर्षित हुई थी। चक्रेश्वरी ने रथ में सुधा के सिन्धु को आज्ञा देकर बुलाया था ।५८। वह मद से अलस और रक्त नेत्रों वाला था—हेम के समान उसकी आभा थी। मालाओं से वह भूषित था ।५९। उसकी आज्ञा के पालक उसने दण्डनाथा को प्रणाम किया था ।६०। उसने अनेक प्रकार का अपना स्वरूप बना लिया था—कहीं तो तरुण सूर्य के समान वह पाटल था और कहीं पर तापिच्छ के तुल्य श्यामल था और कहीं पर धवल कान्ति वाला था ।६१। इस सिन्धुराज ने वायु के द्वारा अधिक होकर हाथी के सूँड के समान आकार वाली करोड़ों धाराएँ वर्षायी थीं ।६२। कल्प के क्षय के समय पुष्कलावर्त्तक आदि बलाहकों से निषिच्यमान शक्तियों के मध्य में वह सागर गिरा था ।६३।
यद्गन्धाघ्राणमात्रेण मृत उत्तिष्ठते स्फुटम् ।
दुर्बलः प्रबलश्च स्यात्तद्ववर्ष सुरांबुधिः ॥६४॥
परार्द्धसंख्यातीतास्ता मधुधारापरम्पराः ।
प्रपिबन्त्यः पिपासार्तैर्मुखैः शक्तय उत्थिताः ॥६५॥
यथा सा मदिरासिंधुवृष्टिर्दैत्येषु नो पतेत् ।
तथा सैन्यस्य परितो महाप्राकारमण्डलम् ॥६६॥
लघुहस्ततया मुक्तै शरजातैः सहस्रशः ।
चकार विस्मयकरी कदम्बवनवासिनी ॥६७॥
मर्मणा तेन सर्वेऽपि विस्मिता मरुतोऽभवन् ।
अथ ताः शक्तयो भूरि पिबन्ति स्म रणांतरे ॥६८॥
विविधा मदिराधारा बलोत्साहविवर्धनीः ।
यस्या यस्या मनः प्रीती रुचिः स्वादो यथा यथा ॥६९॥
विशुक्र विषंग वध वर्णन ] [ ३६३
तृतीये युद्धदिवसे प्रहरद्वितयावधि । संततं मद्यधाराभिः प्रववर्ष सुरांबुधिः ॥७०॥
जिसकी गन्ध मात्र से ही मृत प्राणी स्पष्ट उठकर खड़ा हो जाया करता है और जो दुर्बल होता है वह प्रबल हो जाया करता है वह सुराम्बुधि वर्षा था ।६४। परार्ध संख्या से अतीत मधु धाराओं की परम्पराएँ थीं उनका पान करती हुई पिपासा से आर्त्तमुखों से उनने पान किया था और वे शक्तियां उठकर खड़ी हो गयी थीं ।६५। उस सेना के चारों ओर ऐसा एक प्रकार का मण्डल था कि जिससे वह मदिरा सिन्धु की वृष्टि दैत्यों पर न जाकर पड़ जावे ।६६। कदम्ब वन वासिनी ने लघु हस्तता से छोड़े गये सहस्रों शरों से विस्मयकरी किया था ।६७। उस कर्म से सभी मरुत विस्मित हो गये थे । इसके अनन्तर उन शक्तियों ने रण के मध्य में पान बहुत किया था ।६८। अनेक मदिरा की धाराएँ बल और उत्साह के वर्धन करने वाली थीं । जिस-जिस के मन की जो-जो भी प्रीति थी वैसी-वैसी ही पी थी ।६६। तीसरे युद्ध के दिन में दो प्रहर की अवधि तक सुराम्बुधि ने निरन्तर मद्य की धाराओं से वर्षा की थी ।७०।
गौडी पैष्टी च माध्वी च वरा कादम्बरी तथा । हैताली लांगलेया च तालजातास्तथा सुराः ॥७१॥ कल्पवृक्षोद्भवा दिव्या नानादेशसमुद्भवाः । सुस्वादुसौरभाद्याश्च शुभगंधसुखप्रदाः ॥७२॥ बकुलप्रसवामोदाः ध्वनंत्यो बुदबुदोज्ज्वलाः । कटुकाश्च कषायाश्च मधुरास्तिक्ततास्पृशः ॥७३॥ बहुवर्णसमाविष्टाश्छेदिनीः पिच्छलास्तथा । ईषदम्लाश्च कट्वम्ला मधुराम्लास्तथा पराः ॥७४॥ शस्त्रक्षतरुगाहन्त्री चास्थिसंधानदायिनी । रणभ्रमहराः शीता लघ्व्यस्तद्वत्कवोष्ठकाः ॥७५॥ संतापहारिणीश्चैव वारुणीस्त। जयप्रदाः । नानाविधाः सुराधारा ववर्ष मदिराणवः ॥७६॥ अविच्छिन्नं याममात्रमेकैका तत्र योगिनी । ऐरावतकरप्रख्यां सुराधारां मुदा पपौ ॥७७॥
३६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
सुराएँ कितनी ही प्रकार की थीं। अब उनके प्रकारों को बताया जाता है—गौड़ी-पैष्टी-माध्वी-वरा-कादम्बरी-हैताली-लाङ्गलेया-और ताल जाता सुराएँ थी ।७१। कल्प वृक्ष से समुत्पन्न-दिव्या-अनेक देशों में उत्पन्ना थी। ये सुन्दर स्वाद वाली और सौरभ वाली थीं और इनसे शुभ गन्ध निकलती थी ।७२। बकुल के प्रसवा-आमोदा-स्रवन्ती-बुद्बुदा-उज्ज्वला थी। कटुका-कषाया-मधुरा-तिक्तता के स्पर्श वाली थी ।७४। बहुत वर्णों से समाविष्टा-छेदिनी-पिच्छिला-ईषद् अम्ला-कट्वम्ला-तथा मधुराम्ला थी ।७४। शस्त्र से होने वाले क्षत के रोग का हनन करने वाली-अस्थियों के सन्धान को देने वाली-लघ्वी और कवोष्णका थी ।७५। सन्ताप का हरण करने वाली तथा वारुणी-जय प्रदान करने वाली-इस तरह से उस सुधार्णव ने अनेक प्रकार की सुराओं की धाराओं की वर्षा की थी ।७६। वहाँ पर एक-एक योगिनी ने एक प्रहर तक अविच्छिन्न रूप से ऐरावत करप्रख्या सुरा की धारा को आनन्द के साथ पान किया था।
उत्तानं वदनं कृत्वा विलोलरसनाञ्चलम् । शक्तयः प्रपपुः सीधु मुदा मीलितलोचनाः ॥७७
इत्थं बहुविधं माध्वीधारापातैः सुधांबुधिः । आगतस्तर्पयित्वा तु दिव्यरूपं समास्थितः ॥७८
पुनर्गत्वा दण्डनाथां प्रणम्य स सुरांबुधिः । स्निग्धगंभीरघोषेण वाक्यं चेदमुवाच ताम् ॥८०
देवि पश्य महाराज्ञि दण्डमण्डलनायिके । मया संतर्पिता मुग्धरूपा शक्तिवरूथिनी ॥८१
काश्चिन्नृत्यंति गायंत्यो कलक्वणितमेखलाः । नृत्यंतीनां पुरः काश्चित्करतालं वितन्वते ॥८२
काश्चिद्धसंति व्यावल्गद्बलगुवक्षोजमण्डलाः । पतंत्यन्योन्यमङ्गेषु काश्चिदानन्दमन्थराः ॥८३
काश्चिद्वल्गंति च श्रोणिविगलन्मेखलांबराः । काश्चिदुत्थाय संनद्धा घूर्णयन्ति निरायुधाः ॥८४
विशुक्र विषंग वध वर्णन ] [ ३६५
शक्तियों ने अपने मुख को ऊपर की ओर उठाकर चञ्चल रसना वाली होते हुए अपनी आँखों को मूँदकर आनन्द से उस चल सुरा का पान किया था। ७८। इस रीति से उस सुधाम्बुद्धि ने बहुत तरह के माध्वी की धाराओं के पातों से तृप्त करके दिव्य रूप में समास्थित हो गया था। ७९। फिर वह सुराम्बुधि दण्डनाथा को प्रणाम करके परम स्निग्ध और गम्भीर ध्वनि से उस देवी से यह वाक्य बोला था। ८०। हे महाराज्ञि ! हे देवि ! हे दण्ड मण्डलनायिके ! आप देख लीजिए। मैंने मुग्धरूप वाली शक्तियों की सेना को भली-भाँति तृप्त कर दिया है। ८१। उनमें कुछ तो नृत्य कर रही हैं कुछ कल क्वणित मेखलाओं वाली गान कर रहीं हैं। नृत्य करने वाली शक्तियों के आगे कुछ करों से ताल दे रही हैं। ८२। कुछ व्यावलगद्बलु उरोजमण्डलों वाली हंस रही हैं। कुछ आनन्दोद्रेक में मन्थर होती हुई परस्पर में अंगों में पतन कर रही हैं। ८३। कुछ अपनी श्रोणियों पर से गिरते हुए मेखलाम्बरों काली वल्ग कर रही है। कुछ उठाकर सन्नद्ध हो रही हैं और बिना ही आयुधों के घूर्णन कर रही हैं। ८४।
इत्थं निर्दिश्यमानास्ताः शक्ती मैरेय सिंधुना ।
अवलोक्य भृशं तुष्टा दण्डिनी तमुवाच ह ॥८५
परितुष्टास्मि मद्याब्धे त्वया साह्यमनुष्ठितम् ।
देवकार्यमिदं किं च निर्विघ्नतमिदं कृतम् ॥८६
अतः परं मत्प्रसादाद्द्वापरे याज्ञिकैर्मखे ।
सोमपानवदत्यंतमुपयोज्यो भविष्यसि ॥८७
मन्त्रेण पूतं त्वां यागे पास्यंत्यखिलदेवताः ।
यागेषु मन्त्रपूतेन पीतेन भवता जनाः ॥८८
सिद्धिंमृद्धिं बलं स्वर्गमपवर्गं च बिभ्रतु ।
महेश्वरी महादेवो बलदेवश्च भार्गवः ।
दत्तात्रेयो विधिविष्णुस्त्वां पास्यंति महाजनाः ॥८९
यागे समचितस्त्वं तु सर्वसिद्धि प्रदास्यसि ॥६०
इत्थं वरप्रदानेन तोषयित्वा सुरांबुधिम् ॥६१
३६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
इस तरह से दिखाई गयीं उन शक्तियों को देखकर जो मैरेय सीधु से आनन्दित हो रही थीं दण्डिनी अत्यन्त प्रसन्न हुई थी और उससे कहा था ।८५। हे मद्याब्धे ! मैं बहुत ही यदि तुष्ट हुई हूँ। आपने हमारी सहायता की है। यह देव कार्य है इसको आपने विघ्न रहित कर दिया है ।८६। अब इससे आगे द्वापर युग में मेरे प्रसाद से मख में याज्ञिकों के द्वारा सोम के पान के ही समान आप अत्यन्त उपयोग के योग्य होंगे ।८७। समस्त देवगण याग में मन्त्र से पूत करके इसका पान किया करेंगे। यागों में मन्त्र से पवित्र का पान भक्तजन करेंगे ।८८। इसके प्रभाव से सिद्धि-ऋद्धि-स्वर्ग-अपवर्ग को प्राप्त करेंगे। महेश्वरो-महादेव-बलदेव-भार्गव-दत्तात्रेय-विधि-विष्णु-ऐसे महान सिद्धि जन भी तुम्हारा पान करेंगे ।८६। याग में समन्वित तू सब प्रकार की प्रदान करोगी ।६०। इस प्रकार से वरदान के द्वारा सुराम्बुधि को तुष्ट किया था ।६१।
मन्त्रिणी त्वरयामास पुनर्युद्धाय दण्डिनी ।
पुनः प्रवृत्ते युद्धं शक्तीनां दानवैः सह ॥६२मुदाट्टहासनिर्भिन्नदिगष्टकधरा धरम् ।
प्रत्यग्रमदिरामत्ताः पाटलीकृतलोचनाः ।
शक्तयो दैत्यचक्रेषु न्यपतन्नेकहेलया ॥६३द्वयेन द्वयमारेजे शक्तीनां समदर्शियाम् ।
मदरागेण चक्षूंषि दैत्यरक्तेन शस्त्रिका ॥६४तथा बभूव तुमुलं युद्धं शक्तिसुरद्विषाम् ।
यथा मृत्युरवित्रस्तः प्रजाः संहरते स्वयम् ॥६५संस्खलत्पदविन्यासामदेनारक्तदृष्टयः ।
स्खलदक्षरसंदर्भवीरभाषा रणोद्धताः ॥६६कदम्बगोलकाकारा हृष्टसर्वांगदृष्टयः ।
युवराजस्य सैन्यानि शक्तयः समनाशयन् ॥६७अक्षौहिणीशतं तत्र दण्डिनी सा व्यदारयत् ।
अक्षौहिणीसार्द्धशतं नाशयामास मन्त्रिणी ॥६८
विशुक्र विषंग वध वर्णन ] [ ३६७
मन्त्रिणी और दण्डिनी दोनों ने पुनः युद्ध करने के लिए शीघ्रता की थी और फिर शक्तियों का दानवों के साथ युद्ध प्रवृत्त हो गया था।६२। प्रसन्नता से अट्टहास जो उन्होंने किया था तो आठों दिशाओं को और धरा को हिला दिया था। नवीन मदिरा से मत्त हो गयी थीं और उनके लोचन पाटल वर्ण के थे। वे शक्तियाँ दैत्यों के चक्र में एक ही हल्ला के साथ निपतित हो गयी थीं ।६३। मद की श्री से सम्पन्न शक्तियों का युद्ध ऐसा हुआ था कि दो से दो ही भिड़ गयी थीं और शोभित हुई थीं। मद के राग से तो नेत्र लाल हो गयी थीं और दैत्यों के रक्त से शस्त्र रक्त हो गये थे ।६४। शक्ति और असुरों का बड़ा तुमुल युद्ध हुआ था जैसे अवित्रस्त मृत्यु स्वयं ही प्रजाओं का संहार करता हो ।६५। उनके चरणों के न्यास स्खलित हो रहे थे तथा मद से कुछ रक्त वर्ण के नेत्र हो रहे थे। वीरभाषा भी ऐसी थी कि उनमें अक्षरों का सन्दर्भ स्खलित हो रहा था। ऐसी वे रण में उद्धत हो गयी थीं ।६६। कदम्ब गोलक के आकार से युक्त और हृष्ट सर्वाङ्ग दृष्टि वाली शक्तियों ने युवराज की सेनाओं का विनाश कर दिया था ।६७। उस दण्डिनी ने वहाँ पर सौ अक्षौहिणियों को विदीर्ण कर दिया था और डेढ़ सौ अक्षौहिणी का विनाश मन्त्रिणी ने कर दिया था ।६८।
अश्वारूढप्रभृतयो मदारुणविलोचनाः ।
अक्षौहिणीसार्धशतं निन्युरंतकमन्दिरम् ॥६९
अंकुशेनाति तीक्ष्णेन तुरगा रोहिणी रणे ।
उलूकजितमुन्मथ्य परलोकातिथि व्यधात् ॥१००
सम्पत्करीप्रभृतयः शक्तिदण्डाधिनायिकाः ।
परुषेण मुखान्यन्यान्यवरुद्धा व्यदारयन् ॥१०१
अस्तं गते सवितरि ध्वस्तसर्वबलं ततः ।
विशुक्रं योधयामास श्यामला कोपशालिनी ॥१०२
अस्त्रप्रत्यस्त्रमोक्षेण भीषणेन दिवौकसाम् ।
महता रणकृत्येन योधयामास मन्त्रिणी ॥१०३
आयुधानि सुतीक्ष्णानि विशुक्रस्य महौजसः ।
क्रमशः खंडयंती सा केतनं रथसारथिम् ॥१०४
३६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
धनुर्गुणं धनुर्दंडं खंडयंती शिलीमुखैः । अस्त्रेण ब्रह्मशिरसा ज्वलत्पावकरोचिषा ।।१०५
मद से अरुण लोचनों वाली अश्वारूढ़ा आदि ने डेढ़ सौ अक्षौहिणी को यमराज के पुर में भेज दिया था ।६६। अत्यन्त तीक्ष्ण अंकुश से अश्वारोहिणी ने युद्ध में उलूक जित् का उन्मथन करके उसे परलोक भेज दिया था ।१००। सम्पत्करी प्रभृति शक्ति दण्डाधिनायियों ने अपने कठोर प्रहार से परस्पर में अवरुद्धों को विदीर्ण कर दिया था ।१०१। सूर्य के अस्ताचलगामी होने पर समस्त सेना के ध्वस्त होने वाले विशुक्र के साथ कोपशालिनी श्यामा ने युद्ध किया था ।१०२। मन्त्रिणी ने अस्त्र प्रत्यस्त्रों के छोड़ने के द्वारा देवों को भी भीषण महान रण कृत्य से युद्ध किया था ।१०३। महान ओज वाले विशुक्र के परम तीक्ष्ण आयुधों का क्रम से खण्डन करती हुई उसने बाणों के द्वारा ध्वजा रथ के सारथि-धनुष की प्रत्यञ्चा-धनुष का खण्डन करती हुई जलती हुई अग्नि की कान्ति वाले ब्रह्मशिर अस्त्र से विशुक्र का मर्दन किया था ।१०४-१०५।
विशुक्रं मर्दयामास सोऽपतच्चूर्णविग्रहः । विषंगं च महादैत्यं दण्डनाथा मदोद्धता ।।१०६
योधयामास चंडेन मुसलेन विनिघ्नती । स चापि दुष्टो दनुजः कालदंडनिभां गदाम् । उद्यम्य बाहुना युद्धं चकाराशेषभीषणम् ।।१०७
अन्योन्यमंगं मृद्नंतौ गदायुद्धप्रवर्तिनौ । चण्डाट्टहासमुखरौ परिभ्रमणकारिणौ ।।१०८
कुर्वाणौ विविधांश्चारान्घूर्णंतौ तूर्णवेष्टिनौ । अन्योन्यदंडहननैर्मोहयंतौ मुहुर्मुहुः ।।१०६
अन्योन्यप्रहृतौ रंध्रमीक्षमाणौ महोद्धतौ । महामुसलदंडाग्रघट्टनक्षोभितांबरौ । अयुध्येतां दुराधर्षौ दंडिनीदैत्यशेखरौ ।।११०
अथार्द्धरात्रिसमयपर्यंतं कृतसंगरा ।
विशुक्र विषंग वध वर्णन ] [ ३६६
संक्रुद्धा हन्तुमारेभे विषंगं दंडनायिका ॥१११ तं मूर्द्धनि निमग्नेन हलेनाकृष्य वैरिणम् । कठोरं ताडनं चक्रे मुसलेनाथ पोत्रिणी ॥११२ ततो मुसलघातेन त्यक्तप्राणो महासुरः । चूर्णितेन शतांगेन समं भूतलाश्रयत् ॥११३ इति कृत्वा महत्कर्म मंत्रिणीडंडनायिके । तत्रैव तं निशाशेषं निन्यतु शिविरं प्रति ॥११४
विशुक्र का ऐसा विमर्दन किया था कि वह चूर-चूर होकर भूमि पर गिर गया था। मदोद्धता दण्डनाथा ने महान् दैत्य विषंग के साथ युद्ध किया था और अपने प्रचण्ड मुसल से उस पर प्रहार किया था और वह दुष्ट दानव भी कालदण्ड के समान गदा को लेकर प्रस्तुत हो गया था और उसने बाहु से महान् भीषण युद्ध किया था।१०६-१०७। परस्पर में एक दूसरे का मर्दन करते हुए महान् गदा युद्ध में प्रवृत्त हुए थे। चण्ड चट्टहास से दोनों शब्दायमान हो रहे थे और उधर-उधर परिभ्रमण करने वाले थे।१०८। अनेक चारों को करते हुए घूर्णन करते थे और तूर्ण वेष्टी हो रहे थे। परस्पर में प्रहारों से एक दूसरे को बार-बार मूर्च्छित करते हुए दोनों मदोद्धत छिद्रों को देख रहे थे। मूसल के दण्ड के प्रघट्टन से अम्बर को क्षुब्ध करते हुए वे दुराधर्ष दंडिनी और वह दैत्य शिरोमणि युद्ध कर रहे थे ।१०६-११०। आधी रात तक युद्ध करने वाली दण्डनायिका ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर विषंग को मारना आरम्भ कर दिया था ।१११। इसके शिर में गढ़े हुए हल से उस शत्रु को खींचकर पोत्रिणी ने मुसल ने खूब ताड़न किया था ।११२। फिर मुंसल की चोट से महान् असुर गत प्राण वाला हुआ था और चूर्ण होकर भूमि पर गिर पड़ा था ।११३। उन मन्त्रिणी और दण्डनायिका ने यह महान् कर्म करके वहाँ पर ही शिविर में उस रात्रि को व्यतीत किया था ।११४।
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४०० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
॥ भंडासुर वध वर्णन ॥
अगस्त्य उवाच- अश्वानन महाप्राज्ञ वर्णितं मन्त्रिणीबलम् । विषंगस्य वधो युद्धे वर्णितो दण्डनाथया ॥१॥ श्रीदेव्याः श्रोतुमिच्छामि रणचक्रे पराक्रमम् । सोदरस्यापदं दृष्ट्वा भण्डः किमकरोच्छ्रुचा ॥२॥ कथं तस्य रणोत्साहः कैः समं समयुध्यत । सहायाः केऽभवंस्तस्य हतभ्रातृतनूभुवः ॥३॥ हयग्रीव उवाच- इदं शृणु महाप्राज्ञ सर्वपापनिकृन्तनम् । ललिताचरितं पुण्यमणिमादिगुणप्रदम् ॥४॥ वैषुवायनकालेषु पुण्येषु समयेषु च । सिद्धिदं सर्वपापघ्नं कीर्तिदं पञ्चपर्वसु ॥५॥ तदा हतौ रणे तत्र श्रुत्वा निजसहोदरौ । शोकेन महताविष्टो भण्डः प्रविललाप सः ॥६॥ विकीर्णकेशो धरणी मूच्छितः पतितस्तदा । न लेभे किञ्चिदाश्वासं भ्रातृव्यसनकर्शितः ॥७॥
अगस्त्यजी ने कहा—हे महाप्राज्ञ ! हे अश्वानन ! आपने मन्त्रिणी के बल का वर्णन कर दिया है और दण्डनाथा ने युद्ध में विषंग वध किया था वह भी वर्णन कर दिया है ।१। अब मैं युद्ध में श्रीदेवी के पराक्रम के श्रवण करने की इच्छा करता हूँ और भण्ड ने भाई के हनन को सुनकर शोक से क्या किया था ? फिर उसका रण में उत्साह कैसे हुआ था और उसने किनके साथ युद्ध किया था । जब उसके भाई पुत्र मर गये तो फिर उसके सहायक कौन हुए थे ।२-३। हयग्रीवजी ने कहा—हे महाप्राज्ञ ! अब यह भी आप सुनिए जो कि सब पापों का छेदन करने वाला है। यह श्री ललिता देवी का चरित परम पुण्यमय है और अणिमादिक आठों महा-
भंडासुर वध वर्णन ] [ ४०१
सिद्धियों के प्रदान करने वाला है ।४। वैषुवायन कालों में और पुण्य समयों में यह सिद्धि के देने वाला— सब पापों का विनाशक और पञ्च पर्वों में कीर्त्ति का दाता है ।५। उस समय में रण में अपने सहोदरों को मरे हुए सुनकर भंड महान् शोक से समाविष्ट हो गया था और उस भंडासुर ने बड़ा भारी विलाप किया था ।६। विकीर्ण केशों वाला वह मूच्छित होकर भूमि पर गिर गया था और भाइयों के दुःख से कशित होकर कुछ भी आश्वासन उसने प्राप्त नहीं किया था ।७।
पुनः पुनः प्रलपन्कुटिलाक्षेण भूरिशः । आश्वास्यमानः शोकेन युक्तः कोपमवाप सः ॥८ फालं वहन्नतिक्रूरं भ्रमद्भ्रुकुटिभीषणम् । अंगारपाटलाक्षश्च निःश्वसन्कृष्णसर्पवत् ॥९ उवाच कुटिलाक्षं द्राक्समस्तपृतनापतिम् । क्षिप्रं मुहुर्मुहुः स्पृष्ट्वा धुन्वानः करवालिकाम् ॥१० क्रोधहुंकारमातन्वन्गर्जन्नुत्पातमेघवत् ॥११ ययैव दृष्ट्या मायाबलाद्युद्धे विनाशिताः । भ्रातरो मम पुत्राश्च सेनानाथाः सहस्रशः ॥१२ तस्याः स्त्रियाः प्रमत्तायाः कण्ठोत्थैः शोणितद्रवैः । भ्रातृपुत्रमहाशोकवह्निं निर्वापयाम्यहम् ॥१३ गच्छ रे कुटिलाक्ष त्वं सज्जीकुरु पताकिनीम् । इत्युक्त्वा कठिनं वर्म वज्रपातसहं महत् ॥१४
वह बार-बार प्रलविलाप कर रहा था तब कुटिलाक्ष ने उसको आश्वासन दिया था । जब बहुत कुछ समझाया तो शोक से युक्त उसने क्रोध किया था ।८। उसने अत्यन्त क्रूर फाल को ग्रहण किया था और अपनी भ्रुकुटियों को तिरछी करके बहुत ही भीषण हो गया था । उसकी आँखें अङ्गारों के समान रक्त हो गयी थीं और वह काले सर्प की तरह फुङ्कारें मार रहा था ।९। फिर सब सेनाओं के स्वामी कुटिलाक्ष से शीघ्र ही बोला था और बार-बार खड्ग को छूकर उसे घुमाता जा रहा था ।१०। वह क्रोध से हुङ्कार कर रहा था और उत्पात के समय में होने वाले मेघों के समान
४०२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
गर्ज रहा था। १२। जिस दुष्टा ने माया के बल से युद्ध में मेरे भाइयों और पुत्रों को मार दिया है और सहस्रों सेनापतियों का विनाश कर दिया है उसी स्त्री के जब वह युद्ध में प्रवृत्त होगी तो उसके कण्ठ से निकले हुए रुधिर से भाई और पुत्रों के शोक की अग्नि को मैं शान्त करूँगा। १२-१३। रे कुटिलाक्ष ! चले जाओ और सेना को तैयार करो। इतना ही कहकर उसने वज्रपात को भी सहन करने वाले कठिन कवच को धारण किया था। १४।
दधानो भुजमध्येन बध्नन्पृष्ठे तथेषुधी ।
उद्दाममौर्वनिः श्वासकठोरं भ्रामयन्धनुः ॥१५
कालाग्निरिव संक्रुद्धो निर्जगाम निजात्पुरात् ।
तालजंघादिकैः सार्द्धं पूर्वद्वारे निवेशिते ॥१६
चतुर्भिर्धृतशस्त्रौघैर्धृतवर्माभिरुद्धतैः ।
पञ्चत्रिंशच्चमूनाथैः कुटिलाक्षपुरः सरैः ॥१७
सर्वसेनापतीन्द्रेण कुटिलाक्षेण स क्रुधा ।
मिलितेन च भण्डेन चत्वारिंशच्चमूवराः ॥१८
दीप्तायुधा दीप्तकेशा निर्जग्मुर्दीप्तकंकटाः ।
द्विसहस्राक्षौहिणीनां पञ्चाशीतिः पराधिका ॥१९
तदेनमन्वगादेकहेलया मथितुं द्विषः ।
भण्डासुरे विनिर्याते सर्वसैनिकसंकुले ॥२०
शून्यके नगरे तत्र स्त्रीमात्रमवशेषितम् ।
आभिलो नाम दैत्येन्द्रो रथवर्ये महारथः ।
सहस्रयुग्यसिंहाढ्यमारुरोह रणोद्धतः ॥२१
वर्म को भुजाओं के मध्यभाग से धारण करके उसने पृष्ठ में तूणीर कहा था। उद्दाम मौर्वी के निःश्वास से कठोर धनुष को घुमाते हुए कालाग्नि के समान से क्रुद्ध होकर वह अपने नगर से निकलकर चल दिया था और तालजंघादिक उसके साथ थे तथा पूर्व द्वार पर सुरक्षा के लिए भी सेनाओं को निवेशित किया था। १५-१६। चार शस्त्रों के समूहों को धारण करने वाले—कवचों को पहिन हुए और उद्धत वीर वहाँ पर थे। पैंतीस सेना-