संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
भंड पुत्र वध वर्णन ] [ ३६३
तस्यां रणे प्रवृत्तायां सर्वपर्वस्थदेवताः । बद्धांजलिपुटा नेमुः प्रधृतासिपरम्पराः ॥८८॥ ताभिः प्रणम्यमाना सा चक्रराजरथोत्तमात् । अवरुह्य तले सैन्यं वर्तमानमगाहत ॥८९॥ तामायांतीमथो दृष्ट्वा कुमारीं कोपपाटलाम् । मंत्रिणीदण्डनाथे च सभये वाचमूचतुः ॥६०॥ किं भर्तृदारिके युद्धे व्यवसायः कृतस्त्वया । अकांडे किं महाराज्ञा प्रेषितासि रणं प्रति ॥६१॥
श्री ललिता अम्बा से उस कुमारी का परम दृढ़ निश्चय समझकर अपनी बाहुओं से खूब अच्छी तरह समालिङ्गन करके उसको युद्ध करने की आज्ञा दी थी ।८५। ललिता देवी ने अपने कवच से एक कवच निकाल कर उसको दिया था और अपने आयुधों से आयुध देकर उसको विदा किया था ।८६। चाप और दंड से समुद्धृत महाराज्ञी का कर्णी रथ था जो सैकड़ों हंसों से युक्त था उस पर कुमारिका ने समारोहण किया था ।८७। उसके रण में प्रवृत्त हो जाने पर सभी पर्वों पर स्थित देवता हाथों को जोड़े हुए असियों को प्रधृत करके प्रणाम करने लगे थे ।८८। उनके द्वारा प्रणाम किये जाने पर वह देवी चक्रराज रथोत्तम से नीचे उतर गयी और वहाँ पर जो सेना थी उसका अवगाहन किया था ।८९। इसके अनन्तर उस कुमारी को कोप से पाटल और आती हुई देखा तो मन्त्रिणी और दंडनाथा ने भययुक्त होकर यह वचन कहे थे ।६०। हे भर्तृदारिके ! क्या आपने युद्ध में व्यवसाय किया है ? महाराज्ञी ने अकाण्ड में यह क्या रण की ओर आपको भेज दिया है ? ।६१।
तदेतदुचितं नैव वर्तमानेऽपि सैनिके । त्वं मूर्तं जीवितमसि श्रीदेव्या बालिके यतः ॥६२॥ निवर्तस्व रणोत्साहात्प्रणामस्ते विधीयते । इति ताभ्यां प्रार्थितापि प्राचलद्दृढनिश्चया ॥६३॥ अत्यन्तं विस्मयाविष्टे मंत्रिणोदण्डनायिके । सहैव तस्या रक्षार्थं चेलतुः पार्श्वयोर्द्वयोः ॥६४॥
३६४ । [ ब्रह्माण्ड पुराण
अथाग्निवरणद्वारा ताभ्यामनुगता सती । प्रभूतसेनायुक्ताभ्यां निर्जगाम कुमारिका ॥६५॥ सनाथशक्तिसेनानां सर्वासामनुगृह्णती । प्रणामांजलिजालानि कर्णीरथकृतासना ॥६६॥ भंडस्य तनयान्दुष्टानभ्यद्रवदरिंदमा । तस्याः प्रादेशिकं सैन्यं कुमार्या न हि विद्यते ॥६७॥ सर्वं हि ललितासैन्यं तत्सैन्यं समजायत । ततः प्रवृत्ते युद्धमत्युद्धतपराक्रमम् ॥६८॥
'हे बालिके ! क्योंकि आप तो श्री देवी के मूर्त्तिमान् जीवन ही हैं अतएव यह उचित नहीं है जबकि सेनाएं विद्यमान हैं ।६२। आप तो इस समय इस रण करने के उत्साह को त्याग कर लौट जाइए । आपको हमारे प्रणाम किये जाते हैं । इस तरह से उन दोनों के द्वारा प्रार्थना भी की गयी थी तो भी दृढ़ निश्चय वाली वहां चल दी थी ।६३। मन्त्रिणी और दण्डनायिका दोनों अत्यधिक विस्मय से समाविष्ट हो गईं थीं और उसके दोनों ओर उसी की रक्षा करने के लिए चल दी थीं ।६४। इसके अनन्तर अग्नि के वरण के द्वारा उन दोनों से अनुगता होती हुई जो बहुत सेना से युक्त थीं कुमारिका वह वहां से निर्गत हुई थी ।६५। कर्णीरथ पर विराजमान स्वामी के सहित समस्त शक्तियों की सेनाओं पर अनुग्रह करती हुई वह रवाना हुई थी । उसको मार्ग में सभी प्रणामाञ्जलियां कर रहे थे ।६६। शत्रुओं का दमन करने वाली ने भंडासुर के पुत्रों पर आक्रमण कर दिया था । उस कुमारी की प्रादेशिक सेना नहीं थी ।६७। समस्त ललिता की ही सेना हो उसकी सेना हो गयी थी । इसके अनन्तर अतीव उद्धत पराक्रम से संयुत महान् युद्ध प्रवृत्त हो गया था ।६८।
ववर्ष शरजालानि दैत्येन्द्रेषु कुमारिका । भण्डासुरकुमारैस्तैर्महाराज्ञो कुमारिका । यद्युद्धमतनोत्तत्तु स्पृहणीयं सुरासुरैः ॥६६॥ अत्यन्तविस्मिता दैत्यकुमारा नववर्षिणीम् । कर्णीरथस्थामलोक्य किरन्तीं शरमंडलम् ॥१००॥
भंडपुत्र वध वर्णन ] [ ३६५
क्षणे क्षणे बालिकया क्रियमाणं महार णम् । व्यजिज्ञपन्महाराज्ञयै भ्रमन्त्यः परिचारिकाः ॥१०१॥ मंत्रिणीदण्डनाथे च न तां विजहतू रणे । प्रेक्षकत्वमनुप्राप्ते तूष्णीमेव बभूवतुः ॥१०२॥ सर्वेषां दैत्यपुत्राणामेकरूपा कुमारिका । प्रत्येकभिन्ना ददृशे विम्बमालेव भास्वतः ॥१०३॥ सायकैरग्निचूडालैस्तेषां मर्माणि भिदती । रक्तोत्पलामिव क्रोधसंरक्तं बिभ्रती मुखम् ॥१०४॥ आश्चर्यं ब्रुवतो व्योम्नि पश्यतां त्रिदिवौकसाम् । साधुवादैर्बहुविधैर्मन्त्रिणीदण्डनाथयोः ॥१०५॥
उस कुमारिका ने अपने बाणों के जालों की उन दैत्येन्द्रों पर वर्षा की थी । उन भंडासुर के पुत्रों के साथ उस महाराज्ञी की कुमारिका का जो युद्ध उस समय में हुआ था वह सभी सुरों और असुरों के द्वारा स्पृहा करने के ही योग्य था ।६६। कर्णीरथ पर स्थित हुई बाणों के मण्डल की वर्षा करने वाली उस नौ वर्ष की कुमारिका को देखकर दैत्यराज के पुत्र अत्यन्त अधिक विस्मित हो गये थे ।१००। प्रतिक्षण उस बालिका के द्वारा किये जाने वाले युद्ध का समाचार परिचारिकाएं भ्रमण करती हुई महाराज्ञी को बता रही थी ।१०१। मन्त्रिणी और दण्डनाथाओं ने उस कुमारिका को कभी भी युद्ध में साथ नहीं छोड़ा था। ये दोनों प्रेक्षक थीं और चुप ही हो गयी थीं ।१०२। सूर्य देव की विम्बमाला के ही तुल्य वह एक ही स्वरूप वाली कुमारी समस्त दैत्य के पुत्रों को प्रत्येक को भिन्न दिखाई दे रही थी ।१०३। अग्नि चूडाल बाणों से उनके कर्मों का भेदन करती हुई युद्ध कर रही थी और उसका मुख क्रोध से लाल रक्त कमल के ही समान शोभित हो रहा था ।१०४। नभ में देवगण देखते हुए बड़ा ही आश्चर्य प्रकट कर रहे थे । तथा मन्त्रिणी और दण्डनाथा के अनेक प्रकार के साधु वाद भी कहे जा रहे थे ।१०५।
अर्च्यमाना रणं चक्रे लघुहस्ता कुमारिका । द्वितीयं युद्धदिवसं समस्तमपि सा रणे ॥१०६॥
[ ३६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
प्रकाशयामास बलं ललितादुहिता निजम् । अस्त्रप्रत्यस्त्रमोक्षेण तान्सर्वानपि भिन्दती ॥१०७ नारायणास्त्रमोक्षेण महाराज्ञीकुमारिका । द्विशत्यक्षौहिणीसैन्यं भस्मसादकरोत्क्षणात् ॥१०८ अक्षौहिणीनां क्षयतः क्षणात्कोपमुपागताः । आकृष्टगुरुधन्वानस्तेऽपतन्नेकहेलया ॥१०६ ततः कलकले जाते शक्तीनां च दिवौकसाम् । युगपत्तिंशतो बाणानसृजत्सा कुमारिका ॥११० हस्तलाघवमाश्रित्य मुक्तैश्चन्द्रार्धसायकैः । त्रिंशता त्रिंशतो भण्डपुत्राणामाहतं शिरः ॥१११ इति भंडस्य पुत्रेषु प्राप्तेषु यमसादनम् । अत्यन्तविस्मयाविष्टा ववृषुः पुष्पमम्बराः ॥११२
लघु हाथों वाली वह कुमारिका पूज्यमान होती हुई युद्ध कर रही थी । उसने युद्ध में दूसरा पूर्ण दिवस भी समाप्त किया था और उस ललिता देवी की पुत्री ने अपने बल को प्रकाशित किया था। वह उन सबको अपने अस्त्रों और प्रत्यस्त्रों से भेदन कर रही थी ।१०६-१०७। उस महाराज्ञी की कुमारिका ने नारायणास्त्र को छोड़कर दो सौ अक्षौहिणी सेनाओं को एक ही क्षण में भस्मसात् कर दिया था ।१०८। उन अक्षौहिणी सेनाओं के विनाश होने से एक ही क्षण में क्रोध को प्राप्त हुए वे दैत्यराज के पुत्रों ने अपने-अपने धनुषों को खींचा था और वे सब एक ही साथ गिर गये थे ।१०६। फिर शक्तियों का और देवगणों का कलकल उत्पन्न हो जाने पर उस कुमारिका ने एक ही साथ तीस बाण छोड़े थे ।११०। हाथ की कुशलता का आश्रय लेकर छोड़े हुए अर्ध चन्द्र बाणों से जो संख्या में तीस थे उन तीसों भण्डासुर के पुत्रों का उसने शरीर काट डाला था ।१११। इस तरह से भंड के समस्त पुत्रों के मर जाने पर अत्यधिक विस्मय से युक्त होकर देवों ने आकाश में स्थित होकर पुष्पों की वर्षा की थी ।११२।
सा च पुत्री महाराज्ञाः विध्वस्तासुरसैनिका । मन्त्रिणीदण्डनाथाभ्यामालिग्यत भृशं मुदा ॥११३
भण्डपुत्र वध वर्णन | ३६७
तस्याः पराक्रमोन्मेषैर्नृत्यन्त्यो जयदायिभिः । शक्तयस्तुमुलं चक्रुः साधुवादैर्जगत्त्रयम् ॥११४॥ सर्वाश्च शक्तिसेनान्यो दण्डनाथापुरःसराः । तदाश्चर्यं महाराज्ञ्यै निवेदयितुमुद्गताः ॥११५॥ ताभिर्निवेद्यमानानि सा देवी ललितांबिका । पुत्रीभुजावदानानि श्रुत्वा प्रीतिं समाययौ ॥११६॥ समस्तमपि तच्चक्रं शक्तीनां तत्पराक्रमैः । अदृष्टपूर्वैर्देवेषु विस्मयस्य वशं गतम् ॥११७॥
और उस महाराज्ञी की पुत्री ने भंडासुर के सब पुत्रों को विध्वस्त कर दिया था और फिर मन्त्रिणी और दण्डनाथा के द्वारा बार-बार आलिंगन की गयी थी तथा इन दोनों को बड़ी ही प्रसन्नता हुई थी ।११३। उस कुमारिका के जो विजय देने वाले पराक्रमों के उन्मेषों से नृत्य करती हुई शक्तियों के साधुवादों के तुमुल घोष से तीनों लोकों को भर दिया था ।११४। समस्त शक्तियों के सेनानियों ने जिनमें दण्डनाथा भी थी उस महान आश्चर्य जनक युद्ध की विजय को महाराज्ञी को निवेदन करने के लिए तैयारी की थी ।११५। ललिता देवी ने अपनी पुत्री की भुजाओं के अवदानों को जो उन शक्तियों के द्वारा सुनाये गये थे श्रवण करके बहुत ही अधिक प्रसन्नता प्राप्त की थी ।११६। वह समस्त चक्र शक्तियों के अदृष्ट पूर्व पराक्रमों से देवों के भी विस्मय करने वाला हो गया था ।११७।
—x—
॥ गणनाथ पराक्रम वर्णन ॥
अथ नष्टेषु पुत्रेषु शोकानलपरिप्लुतः । विललाप स दैत्येन्द्रो मत्वा जातं कुलक्षयम् ॥१॥ हा पुत्रा हा गुणोदारा हा मदेकपरायणाः । हा मन्नेत्रसुधापूरा हा मत्कुलविवर्धनाः ॥२॥ हा समस्तसुरश्रेष्ठमदभंजनतत्पराः । हा समस्तसुरस्त्रीणामंतर्मोहनमन्मथाः ॥३॥
३६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
दिशत प्रीतिवाचं मे ममांके वल्गताधुना ।
किमिदानीमिमं तातमवमुच्य सुखं गताः ॥४॥
युष्मान्विना न शोभन्ते मम राज्यानि पुत्रकाः ।
रिक्तानि मम गेहानि रिक्ता राजसभापि मे ॥५॥
कथमेवं विनिःशेषं हता यूयं दुराशयाः ।
अप्रधृष्यभुजासत्त्वान्भवतो मत्कुलांकुरान् ।
कथमेकपदे दुष्टा वनिता संगरेऽवधीत् ॥६॥
मम नष्टानि सौख्यानि मम नष्टाः कुलस्त्रियः ।
इतः परं कुले क्षीणे साहसानि सुखानि च ॥७॥
इसके अनन्तर अपने समस्त पुत्रों के विनष्ट हो जाने पर महान शोक से परिप्लुत होकर भण्डासुर विलाप करने लगा था और उसने यह मान लिया था कि अब मेरे कुल का नाश हो गया है ।१। वह इस रीति से क्रन्दन करने लगा था—हा ! मेरे पुत्रो ! तुम सब तो बहुत ही उदार गुणों वाले थे—तुम सभी मेरी आज्ञा में तत्पर रहे थे—हा ! आप तो मेरे नेत्रों को सुधा के सूर के ही समान थे और मेरे कुल को बढ़ाने वाले थे ।२। हा ! आप लोग तो सभी देवों के मद का भंजन करने वाले थे—हा ! आप लोग देवाङ्गनाओं के हृदयों को मोहित करने में कामदेव के ही तुल्य थे ।३। मुझे अपनी प्रीति युक्त वाणी सुनाओ—अब मेरी गोद में आकर बैठो—इस समय यह घटना हो गयी है कि आप लोग अपने पिता का त्याग करके सुखी हो गये हो ।४। हे पुत्रो ! आप सबके बिना यह मेरे राज्य शोभित नहीं हो रहे हैं । मेरे घर सब अब सूने हैं और मेरी राज्य सभा भी सूनी हो गयी है । यह क्या हुआ और आप सभी कैसे दुराशयों वाले एक ही साथ निहत हो गये हैं । जिनकी भुजाओं का बल कोई भी दबा नहीं सकता था ऐसे जो मेरे कुल के अंकुर आप सब थे उन सबको एक ही बार में उस दुष्टा नारी ने युद्ध में कैसे मार डाला था ।५-६। मेरी सब सेनाएँ नष्ट हो गयीं और मेरी कुल स्त्रियां भी विनष्ट हो गयी हैं । इससे आगे कुल के क्षीण हो जाने पर सब साहस और सुख भी विनष्ट हो गये हैं ।७।
भवतः सुकृतैर्लब्ध्वा मम पूर्वजनुः कृतैः ।
नाशोऽयं भवतामद्य जातो नष्टस्ततोऽस्म्यहम् ॥८
गणनाथ पराक्रम वर्णन ] [ ३६६
हा हतोऽस्मि विपन्नोऽस्मि मन्दभाग्योऽस्मि पुत्रकाः । इति शोकार्तस पर्यस्यन्प्रलपन्मुक्तमूर्धजः । मूर्च्छंया लुप्तहृदयो निष्पपात नृपासनात् ॥६ विशुक्रश्च विषंगश्च कुटिलाक्षश्च संसदि । भंडमाश्वासयामासुर्दैवस्य कुटिलक्रमैः ॥१० विशुक्र उवाच- देव किं प्राकृत इव प्राप्तः शोकस्य वश्यताम् । लपसि त्वं प्रति सुतान्प्राप्तमृत्यून्महाहवे ॥११ धर्मवान्विहितः पंथा वीराणामेष शाश्वतः । अशोच्यमाहवे मृत्युं प्राप्नुवंति यदर्हितम् ॥१२ एतदेव विनाशाय शल्यवद्बाधते मनः । यत्स्त्री समागत्य हठान्निहंति सुभटान्रणे ॥१३ इत्युक्ते तेन दैत्येन पुत्रशोको व्यमुच्यत । भंडेन चंडकालाग्निसदृशः क्रोध आदधे ॥१४
आप लोगों के जन्म मैंने पूर्व पुण्यों के द्वारा ही प्राप्त किये थे आज आप सबका विनाश हो गया है अब तो मैं भी विनष्ट ही हो गया हूँ ।८। हे पुत्रो ! हा ! अब तो मैं मर ही गया हूँ-विपत्ति ग्रस्त हो गया हूँ ओर खोटी तकदीर वाला हो गया हूँ । इस तरह से वह शोक से ग्रस्त हो गया था और माथे के बालों को खोलकर प्रलाप कर रहा था। उसको मूर्च्छा हो गयी थी ओर उसकी हृदयगति लुप्त हो गयी थी-वह फिर नृपासन से नीचे गिर पड़ाथा ।६। फिर विशुक्र-विषङ्ग ओर कुटिलकर्मों ने उस संसद में भाग्य के कुटिलाओं को कहते हुए भण्डासुर को आश्वासन दिया था ।१०। विशुक्र ने कहा-हे स्वामिन् ! आप सामान्य मानव के ही समान शोक के वश में क्यों प्राप्त हो गये हैं। महान संग्राम में मरे हुए पुत्रों की ओर क्या बात कर रहे हैं ।११। वीरों का तो यह युद्ध करते हुए मर जाना धार्मिक मार्ग ही है और यह निरन्तर होने वाला है । जो युद्ध में मृत्यु को प्राप्त होते हैं वह तो उनकी मृत्यु शोच करने के योग्य नहीं हुआ करती है प्रत्युत पूजित ही हुआ करती है ।१२। केवल यही बात शल्य के समान मन को
३७० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
पीड़ा दे रही है कि स्त्री ने आकर युद्ध में बड़े-बड़े योद्धाओं का हनन किया है ।१३। उस दैत्य के द्वारा ऐसा कहने पर भण्ड ने पुत्रों के शोक का त्याग कर दिया था और फिर भण्ड ने प्रचण्ड कालाग्नि के समान क्रोध किया था ।१४।
स कोशात्क्षिप्रमुद्धृत्य खड्गमुग्रं यमोपमम् । विस्फारिताक्षियुगलो भृशं जज्वाल तेजसा ॥ १५ ॥ इदानीमेव तां दुष्टां खड्गेनानेन खण्डशः । शकलीकृत्य समरे श्रमं प्राप्स्यामि बंधुभिः ॥ १६ ॥ इति रोषस्खलद्वर्णः श्वसन्निव भुजंगमः । खड्गं विधुन्वन्नुत्थायः प्रचचालातिमत्तवत् ॥ १७ ॥ तं निरुध्य च संभ्रान्ताः सर्वे दानवपुङ्गवाः । वाचमूचुरतिक्रोधाज्ज्वलंतो ललितां प्रति ॥ १८ ॥ न तदर्थे कार्यः स्वामिन्संभ्रम ईदृशः । अस्माभिः स्वबलैर्युक्तैः रणोत्साहो विधीयते ॥ १९ ॥ भवदाज्ञालवं प्राप्य समस्तभुवनं हठात् । विमर्दयितुमीशाः स्मः किमु तां मुग्धभामिनीम् ॥ २० ॥ किं चोषयामः सप्ताब्धीन्क्षोदयामोऽथ वा गिरीन् । अधरोत्तरमेवैतत्रैलोक्यं करवाम वा ॥ २१ ॥
उसने यमराज के तुल्य अपने खड्ग को म्यान से निकाल लिया था जो बड़ा ही उग्र था । उसने अपने नेत्रों को फैलाया था और वह तेज से ज्वलित हो गया था ।१५। युद्ध में बन्धुओं के सहित इसी समय मैं इस खड्ग से उस दुष्टा के खण्ड-२ करके युद्ध में श्रम को प्राप्त करूंगा ।१६। इस तरह से रोष से उसका वर्ण स्खलित हो गया था और वह सर्प के ही तुल्य निःश्वास ले रहा था । वह एक मत्त पुरुष के ही समान अपने खड्ग को हिलाता हुआ वहाँ से चल दिया था ।१७। सभी सम्भ्रान्त दानवों ने उसको रोक दिया था और अत्यधिक क्रोध से जलते हुए उन्होंने ललिता के प्रति वचन कहने का आरम्भ कर दिया था ।१८। हे स्वामिन् ! उसके लिए आपको ऐसा सम्भ्रम नहीं करना चाहिए। हम लोग अपने बलों से समन्वित
गणनाथ पराक्रम वर्णन ] [ ३७१
होकर रण करने का उत्साह करते हैं ।१६। आपकी सामान्य भी आज्ञा पाकर हम लोग सम्पूर्ण भुवन का मर्दन करने में हठ से समर्थ हैं। उस मुग्ध भामिनी की तो बात ही क्या है। अर्थात् वह बिचारी नारी हमारे सामने बहुत ही तुच्छ है ।२०। क्या हम सातों सागरों का चूस डालें अथवा समस्त पर्वतों को खोदकर चूर्ण कर देवें और इन तीनों भुवनों को उठाकर अधर देवें। तात्पर्य यह है कि हम असम्भव कार्य को भी आपके आदेश से कर सकने की शक्ति रखते हैं ।२१।
छिन्दाम सुरान्सर्वान्भिन्दाम तदालयान् ।
पिनषाम हरित्पालानाज्ञां देहि महामते ॥२२
इत्युदीरितमाकर्ण्य महाहंकारगर्वितम् ।
उवाच वचनं क्रुद्धः प्रतिघारुणलोचनः ॥२३
विशुक्र भवता गत्वा मायांतर्हितवर्ष्मणा ।
जयविघ्नं महायन्त्रं कर्त्तव्यं कटके द्विषाम् ॥२४
इति तस्य वचः श्रुत्वा विशुक्रो रोषरुषितः ।
मायातिरोहितवपुर्जगाम ललिताबलम् ॥२५
तस्मिन्प्रयातुमुद्युक्ते सूर्योऽस्तं समुपागतः ।
पर्यस्तकिरणस्तोमपाटलीकृतदिङ्मुखः ॥२६
अनुरागवती संध्या प्रयांतं भानुमालिनम् ।
अनुवव्राज पातालकुञ्जे रंतुमिवोत्सुका ॥२७
वेगात्प्रपततो भानोर्देहसङ्गात्समुत्थिताः ।
चरमाब्धेरिव पयःकणास्तारा विरेजिरे ॥२८
हम समस्त सुरों को छेद डालेंगे शौर उनके आलयों को तोड़-फोड़ डालेंगे। हम दिक्पालों को पीस डालेंगे। हे महामते ! आप हमको अपनी आज्ञा भर दे दीजिए ।२२। इस महान अहंकार से युक्त वचन को सुनकर लाल नेत्रों वाला भण्ड क्रुद्ध होकर बोला था ।२३। हे विशुक्र ! माया से अपने वर्म को छिपाकर आप वहाँ जाकर कटक में शत्रुओं के जय के विघ्न वाले महामन्त्र को करो ।२४। उसके इस वचन को श्रवण करके विशुक्र रोष से भर गया था और माया से अपने शरीर को छिपाकर ललिता की सेना
३७२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
में गया था ।२५। जब प्रयाण करने को वह उद्यत हुआ था तो सूर्य अस्त हो गया था । पर्यस्त किरणों के समुदाय से दिशाएँ सब पारस वर्ण की हो गयीं थीं ।२६। अनुराग वाली सन्ध्या गमन करते हुए भानुमाली पीछे ही चली गयी मानो पाताल की कुञ्ज में वह सूर्य के साथ रमण करने को उत्सुक हो गयी थी। चरमाब्धि के पय के ही समान तारे शोभित हो रहे थे । बड़े वेग से प्रयाण करने वाले सूर्य के देह के सङ्ग से ही वे कण समुत्थित हुए थे ।२७-२८।
अथाससाद बहुलं तमः कज्जलमेचकम् ।
सार्थं कत्तुंमिवोद्युक्तं सवर्णस्यासिदुर्धिया ॥२९॥
मायारथं समारूढो गूढशार्वरसंवृतः ।
अदृश्यवपुरापेदे ललिताकटकं खलः ॥३०॥
तत्र गत्वा ज्वलज्ज्वलं वह्निप्राकारमंडलम् ।
शतयोजनविस्तारमालोकयत दुर्मतिः ॥३१॥
परितो विभ्रमञ्छालमवकाशमवाप्नुवन् ।
दक्षिणं द्वारमासाद्य निदध्यौ क्षणमुद्धतः ॥३२॥
तत्रापश्यन्महासत्त्वास्सावधाना धृतायुधाः ।
आरूढयानाः संनद्धवर्माणो द्वारदेशतः ॥३३॥
स्तंभिनीप्रमुखाः शक्तीर्विशत्यक्षौहिणीयुताः ।
सर्वदा द्वाररक्षार्थं निर्दिष्टा दंडनाथया ॥३४॥
विलोक्य विस्मयाविष्टो विचार्य च चिरं तदा ।
शालस्य बहिरेवासौ स्थित्वा यन्त्रं समातनोत् ॥३५॥
इसके अनन्तर काजल के तुल्य एक दम काला बड़ा भारी अन्धकार प्राप्त हो गया था । असिकी दुर्धी से मानों सवर्ण का साथ करने को ही बह उद्युक्त हो गया था ।२९। गूढ शार्वर से संवृत वह दैत्य माया के रथ पर सवार हुआ था और उसने अपना शरीर अदृश्य कर लिया था । फिर वह खल ललिता की सेना में प्राप्त हुआ था ।३०। वहाँ जाकर उस दुष्ट बुद्धि वाले ने अग्नि का प्राकार मण्डल देखा था जो जलती हुई ज्वालाओं वाला था और सौ योजन के विस्तार से समन्वित था ।३१। उसके सब ओर भ्रमण
गणनाथ पराक्रम वर्णन ] [ ३७३
करते हुए उसने शाल को अवकाश न पाया था। फिर दक्षिण में द्वार पर पहुँचकर क्षण भर उस उद्धत ने सोचा था।३२। वहां पर सावधान-महान बली-हाथों में हथियार उड़ाये हुए-यानों पर समारूढ़ और संनद्ध वर्मों वाले जो द्वार देश पर स्थित थे, देखे थे।३३। सर्वदा द्वार की रक्षा के लिए दण्डनाथा के द्वारा निर्दिष्ट विशति अक्षोहिणी सेना से संयुत स्तम्भिनी प्रमुख शक्तियां थीं।३४। उनको देखकर वह विस्मय से समाविष्ट हो गया था और उस समय में उसने विचार बहुत देर तक किया था। शाल के बाहिर ही स्थित होकर उसने यन्त्र को फैलाया था।३५।
गव्यूतिमात्रकायामे तत्समानप्रविस्तरे । शिलापट्टे सुमहति प्रालिखद्यन्त्रमुत्तमम् ॥३६॥ अष्टदिक्ष्वष्टशूलेन संहाराक्षरमौलिना । अष्टभिर्दैवतैश्चैव युक्तं यन्त्रं समालिखत् ॥३७॥ अलसा कृपणा दीना नितन्द्रा च प्रमीलिका । क्लीबा च निरहंकारा चेत्यष्टौ देवताः स्मृताः ॥३८॥ देवताष्टकमेतच्च शूलाष्टकपुटोपरि । नियोज्य लिखितं यन्त्रं मायावी सममन्त्रयत् ॥३९॥ पूजां विधाय मन्त्रस्य बलिभिश्चागलादिभिः । तद्यन्त्रं चारिकटके प्राक्षिपत्समरेऽसुरः ॥४०॥ प्राकारस्य बहिर्भागे वर्तिना तेन दुर्धिया । क्षिप्तमुल्लंघ्य च रणे पपात कटकांतरे ॥४१॥ तद्यन्त्रस्य विकारेण कटकस्थास्तु शक्तयः । विमुक्तशस्त्रसंन्यासमास्थिता दीनमानसाः ॥४२॥
उसने आठ देवताओं से युक्त यन्त्र को लिखा था। दो कोश की चौड़ाई में और उतने ही निस्तार में एक शिला पट्ट पर जो महान था उस उत्तम यन्त्र को लिखा था। वह यन्त्र आठ दिशाओं में आठ शूल संहाराक्षर मौलि से ही लिखा गया था।३६-३७। उन आठ देवताओं के नाम हैं-अलसा- कृपणा-दीना-नितन्द्रा-प्रमीलिका-क्लीवा-निरहंकारा-ये आठ देवता कहे गये हैं।३८। इन देवताओं के अष्टक को शूलाष्टक पुट के ऊपर नियोजित
३७४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
कर लिखा गया मन्त्र था उसको उस मायावी ने भली-भाँति मन्त्रित किया था ।३६। यन्त्र की पूजा करके छागल आदि की बलि दी थी । उस असुर ने समर में चारिकटक में उसका क्षेप किया था ।४०। उस प्रकार के बाहिर के भाग में रहने वाले उस दुष्ट धी ने प्रक्षिप्त किया था और उल्लंघन कर कटक के मध्य के रण में गिरा था ।४१। उस यन्त्र के विकार से कटक में स्थित शक्तियाँ शस्त्रों को छोड़कर दीन मानसों वाली हो गयी थीं ।४२।
किं हतैरसुरैः कार्यं शस्त्राशस्त्रिक्रमैरलम् ।
जयसिद्धफलं किं वा प्राणिहिंसा च पापदा ॥४३
अमराणां कृते कोऽयं किमस्माकं भविष्यति ।
वृथा कलकलं कृत्वा न फलं युद्धकर्मणा ॥४४
का स्वामिनी महाराज्ञी का वासौ दण्डनायिका ।
का वा सा मन्त्रिणी श्यामा भृत्यत्वं नोऽथ कीदृशम् ॥४५
इह सर्वाभिरस्माभिर्भृत्यभूताभिरेकिका ।
वनिंता स्वाजिनीकृत्ये किं फलं मोक्ष्यते परम् ॥४६
परेषां मर्मभिदुरैरायुधैर्न प्रयोजनम् ।
युद्धं शाम्यतु चास्माकं देहशस्त्रक्षतिप्रदम् ॥४७
युद्धे च मरणं भावि वृथा स्युर्जीवितानि नः ।
युद्धे मृत्युर्भवेदेव इति तत्र प्रमैव का ॥४८
उत्साहेन फलं नास्ति निद्रैवका सुखावहा ।
आलस्यसदृशं नास्ति चित्तविश्रांतिदायकम् ॥४९
उनको ऐसा सन्यास हो गया था कि उनके मनों में ये भाव उत्पन्न हो गये थे कि इन असुरों के मारने से क्या कार्य होगा—यह शस्त्रास्त्रों का क्रम भी व्यर्थ है—जय की सिद्धि से भी क्या फल है । युद्ध में प्राणियों की हिंसा से पाप होगा ।४३। यह देवों के लिए क्या है इससे हमारा भी क्या होगा । कल-२ करना व्यर्थ है और युद्ध के कर्म से क्या फल होगा ।४४। कौन तो महाराज्ञी स्वामिनी है और यह दण्ड नायिका क्या है । वह मन्त्रिणी श्यामा क्या है और हमारा उनका कैसा भृत्य होना है ।४५। यहाँ पर हम सबने जो भृत्य भूता हैं एक वनिता को स्वामिनी बना रक्खा है । इससे क्या परम मोक्ष होगा ।४६। दूसरों के मर्मों के भेदन करने वाले आयुधों की क्या
गणनाथ पराक्रम वर्णन ] [ ३७५
आवश्यकता है। यह युद्ध जो देश और शस्त्रों की क्षति करने वाला है अब शान्त हो जाना चाहिए ॥४७॥ और युद्ध में मरण होने वाला है तो हमारा जीवन भी वृथा ही है। युद्ध में तो मौत ही होगी वहां पर प्रभा ही क्या है ॥४८॥ इस उत्साह से कोई भी फल नहीं है अतःनिद्रा ही सुख देने वाली है। आलस्य के तुल्य चित्त को विश्रान्ति देने वाला अन्य कोई भी नहीं है ॥४६॥
एतादृशींश्च नो ज्ञात्वा सा राज्ञी किं करिष्यति ।
तस्या राज्ञीत्वमपि नः समवायेन कल्पितम् ॥५०॥
एवं चोपेक्षितास्माभिः सा विनष्टबला भवेत् ।
नष्टसत्त्वा च सा राज्ञी कान्नः शिक्षां करिष्यति ॥५१॥
एवमेव रणारंभं विमुच्य विधृतायुधाः ।
शक्तयो निद्रया द्वारे घूर्णमाना इवाभवन् ॥५२॥
सर्वत्र मांद्यं कार्येषु महदालस्यमागतम् ।
शिथिलं चाभवत्सर्वं शक्तीनां कटकं महत् ॥५३॥
जयविघ्नं महायन्त्रमिति कृत्वा सा दानवः ॥५४॥
निर्विद्य तत्प्रभावेण कटकं प्रमिमंथिषुः ।
द्वितीययुद्धदिवसस्यार्धरात्रे गते सति ॥५५॥
निस्सृत्य नगराद्भूयस्त्रिंशदक्षौहिणीवृतः ।
आजगाम पुनर्देत्यो विशुक्रः कटकं द्विषाम् ॥५६॥
अश्रूयत ततस्तस्य रणनिःसाणनिस्वनाः ।
तथापि ता निरुद्योगाः शक्तयः कटकेऽभवन् ॥५७॥
हमको ऐसी जानकर वह राज्ञी क्या करेगी। उसको राज्ञी बना देना भी तो हम ही सबने कल्पित किया है ॥५०॥ इस रीति से हमारे द्वारा जब वह उपेक्षित होगी तो वह भी नष्ट बल वाली ही हो जायगी। जब नष्ट बल वाली राज्ञी होगी तो फिर वह हमको क्या शिक्षा देगी ॥५१॥ इसी प्रकार से उन शक्तियों ने रणारम्भ को त्याग दिया था और सब हथियार छोड़ दिये थे। वे निद्रा से घूर्णित होती हुई द्वार पर ही रह गयी थी ॥५२॥ सर्वत्र कार्यों में मन्दता आ गयी और मदालस्य छा गया था। वह महान शक्तियों का कटक उस समय में शिथिल हो गया था ॥५३॥ यह महायन्त्र
३७६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
जय विघ्न था जिसको उस दानव ने किया था ।५४। कटक का प्रमन्थन करने की इच्छा वाला वह उसके प्रभाव से निर्विघ्न हो गया था। उस समय में फिर नगर से निकलकर फिर तीस अक्षौहिणी सेना से युत होकर विशुक्र दैत्य शत्रुओं के कटक में आ गया था ।५५-५६। फिर रण के निःशाणों के शब्द सुने गये थे तो भी वे शक्तियां कटक में उद्योग ही नहीं हो गयी थीं। ।५७।
तदा महानुभावत्वाद्विकारैर्विघ्नयंत्रजैः । अस्पृष्टे मंत्रिणोदण्डनाथे चिंतामवापतुः ॥५८॥ अहो बत महत्कष्टमिदमापतितं भयम् । कस्य वाथ विकारेण सैनिका निर्गतोद्यमाः ॥५९॥ निरस्तायुधसंरंभा निद्रातन्द्राविघूर्णिताः । न मानयंति वाक्यानि नार्चयंति महेश्वरीम् । ओदासीन्यं वितन्वंति शक्तयो निस्पृहा इमाः ॥६०॥ इति ते मंत्रिणोदण्डनाथे चिंतापरायणे । चक्रस्यन्दनमारूढे महाराज्ञीं समूचतुः ॥६१॥ मंत्रिण्युवाच— देवि कस्य विकारोऽयं शक्तयो विगतोद्यमाः । न शृण्वंति महाराज्ञि तवाज्ञां विश्वपालिताम् ॥६२॥ अन्योन्यं च विरक्तास्ताः पराच्यः सर्वकर्मसु । निद्रातन्द्रामुक्कुलिता दुर्वाक्यानि वितन्वते ॥६३॥ का दंडिनी मंत्रिणो का महाराज्ञीति का पुनः । युद्धं च कीदृशमिति क्षेपं भूरिवतन्वते ॥६४॥
उस समय में विघ्नयन्त्र से समुत्पन्न विकारों से महानुभाव होने के कारण से मन्त्रिणी और दण्डनाथा अस्पृष्ट थीं। ओर उनको बड़ी चिन्ता प्राप्त हो गयी थी ।५८। अहो ! बड़े खेद का विषय है और महान् कष्ट तथा भय आ पड़ा है। अथवा यह किसका विकार है जिसके प्रभाव से समस्त सैनिक उद्योग हीन हो गये हैं ।५९। आयुधों का संरम्भ निरस्त कर दिया है और सब निद्रा तथा तन्द्रा से विघूर्णित हैं। न तो ये वाक्यों को मानते हैं और
गणनाथ पराक्रम वर्णन ] [ ३७७
न महेश्वरी का ही अर्चन करते हैं। ये सब शक्तियाँ उदासीनता कर रही हैं और निःस्पृह हो गयी हैं।६०। वे मन्त्रिणी और दण्डनाथा इस प्रकार से चिन्ता मग्न हो गयी थीं और चक्र स्यन्दन पर समारूढ़ होकर उन्होंने महाराज्ञी से कहा था।६१। मन्त्रिणी ने कहा—हे देवि ! यह किसका विकार है कि सब शक्तियों ने उद्यम त्याग दिया है। हे महाराज्ञि ! विश्वपालिता आपकी आज्ञा को भी वे अब नहीं सुनती हैं।६२। वे परस्पर में सब कर्मों को छोड़ कर विरक्त हो गयीं हैं। वे निद्रा और तन्द्रा से मुकुलित हो रही हैं और दुर्वाक्यों को कहती हैं।६३। वे कहती हैं यह दण्डिनी और मन्त्रिणी कौन और क्या हैं तथा यह महाराज्ञी क्या कौन है और यह युद्ध भी कैसा है—ऐसा ही बहुत क्षेप कर रही हैं।६४।
अस्मिन्नेवांतरे शत्रुरागाच्छति महाबलः।
उद्दंडभेरीनिस्वानैर्विभिदन्निव रोदसी ॥६५॥
अत्र यत्प्राप्तं रूपं तन्महाराज्ञि प्रपद्यताम् ।
इत्युक्तवा सह दंडिन्या मंत्रिणों प्रणतिं व्यधात् ॥६६॥
ततः सा ललिता देवी कामेश्वरमुखं प्रति ।
दत्तदृष्टिः समहसदतिरक्तरदावलिः ॥६७॥
तस्याः स्मितप्रभापुञ्जे कुंजराकृतिमान्मुखे ।
कटक्रोडगलद्दानः कश्चिदेव व्यजृम्भत ॥६८॥
जपापटलपाटल्यो बालचन्द्रवपुर्धरः ।
बीजपूरगदामिक्षु चापं शूलं सुदर्शनम् ॥६९॥
अब्जपाशोत्पलव्रीहिमंजरीवरदांकुशान् ।
रत्नकुम्भं च दशभिः स्वकैर्हस्तैः समुद्वहन् ॥७०॥
इसी बीच में महान बल वाला शत्रु आ जाता है जो उद्दण्ड भेरियों के घोषों से रोदसी (भूमि और आकाश को) का भेदन सा कर रहा है।६५। यहाँ पर जो भी रूप प्राप्त हुआ है हे महाराज्ञि ! उसको बतलाइए। इतना कहकर वे दोनों दण्डिनी और मन्त्रिणी ने स्वामिनी को प्रणाम किया था।६६। इसके अनन्तर इस ललिता देवी ने कामेश्वर के मुख की ओर अपनी दृष्टि डाली थी और बहुत हंसी थीं उनके अतीव रक्त रदावलि थी।६७। उनके स्मित की प्रभा के पुञ्ज वाले मुख में कुञ्जर की आकृति वाला कोई
३७८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
दिखाई दिया था जिसके कुम्भस्थल से मद चू रहा था ।६८। वह जपा पुष्प के समान पाटलय था—शिर पर बालचन्द्र को धारण किये था और बीज- पूर-गदा-इक्षुचाप--शूल-सुदर्शन-अब्ज-पाश-उत्पल-ब्रीहि मंजरी-वरदां- कुश और रत्नकुम्भ—इनको दश करों में उद्धहन कर रहे थे ।६६-७०।
तुन्दिलश्चन्द्रचूडालो मन्द्रबृंहितनिस्वनः । सिद्धिलक्ष्मीसमाश्लिष्टः प्रणनाम महेश्वरीम् ॥७१॥ तया कृताशीः स महान्गणनाथो गजाननः । जयविघ्नमहायन्त्रं भेत्तुं वेगाद्विनिर्ययौ ॥७२ अंतरेव हि शालस्य भ्रमद्दन्तावलाननः । निभृतं कुत्रचिल्लग्नं जयविघ्नं व्यलोकयत् ॥७३ स देवो घोरनिर्घातैर्दुःसहैर्दंतपातनैः । क्षणाच्चूर्णीकरोति स्म जयविघ्नमहाशिलाम् ॥७४ तत्र स्थिताभिर्दुष्टाभिर्देवताभिः सहैव सः । परागशेषतां नीत्वा तद्यन्त्रं प्राक्षिपद्दिवि ॥७५ ततः किलकिलारावं कृत्वाऽऽलस्यविवर्जिताः । उद्यताः समरं कर्तुं शक्तयः शस्त्रपाणयः ॥७६ स दंतिवदनः कण्ठकलिताकुण्ठनिस्वनः । जययन्त्रं हि तत्सृष्टं तथा रात्रौ व्यनाशयत् ॥७७
उनका पेट बड़ा था—चन्द्र चूड़ा में था और वे मन्द्र तथा बृंहित ध्वनि वाले थे । वे सिद्धि लक्ष्मी से समाश्लिष्ट थे । उनने आकर महेश्वरी को प्रणाम किया था ।७१। देवी ने उनको आशीर्वाद दिया था, वह महान गणनाथ गजानन थे और वे जयविघ्न महा यन्त्र का भेदन करने के लिए वेग के साथ निकलकर चले गये थे ।७२। शाल के अन्दर ही भ्रमद्दन्ता बलानन ने चुपचाप कहीं पर लगा हुआ जयविघ्न यन्त्र को देखा था ।७३। उस देव ने घोर निर्घातों वाले और दुस्सह दांतों के पातनों से एक ही क्षण में उस जयविघ्न महाशिला का चूर्ण कर दिया था ।७४। उन्होंने उसमें स्थित देव- ताओं के साथ ही जो बड़े दुष्ट थे सबका चूरा करके उस यन्त्र को दिवलोक में फेंक दिया था ।७५। इसके अनन्तर किलकिल की ध्वनि करके सब शक्ति
गणनाथ पराक्रम वर्णन ] [ ३७६
आलस्य रहित होगयीं थीं और शस्त्र हाथों में लेकर युद्ध करने के लिए उद्यत हो गयी थीं ।७६। उस दन्ति वदन ने जिनके कलित कण्ठ की ध्वनि हो रही थी एक जप यन्त्र का सृजन किया था और रात्रि में विनाश कर दिया था जो बाधक था ।७७।
इमं वृत्तांतमाकर्ण्य भंडः स क्षोभमाययौ ।
ससर्ज च बहूनात्मरूपान्दंतावलाननान् ॥७८
ते कटक्रोडविगलन्मदसौरभचञ्चलैः ।
चञ्चरीककुलैरग्रे गीयमानमहोदयाः ॥७९
स्फुरद्दाडिमकिंजल्कविक्षेपकररोचिषः ।
सदा रत्नाकरानेकहेलया पातुमुद्यताः ॥८०
आमोदप्रमुखा ऋद्धिमुख्यशक्तिनिषेविताः ।
आमोदश्च प्रमोदश्च सुमुखो दुर्मुखस्तथा ॥८१
अरिघ्नो विघ्नकर्त्ता च षडेते विघ्ननायकाः ।
ते सप्तकोटिसंख्यानां हेरंबानामधीश्वराः ॥८२
ते पुरश्चलितास्तस्य महागणपते रणे ।
अग्निप्राकारवलयाद्विनिर्गत्य गजाननाः ॥८३
क्रोधहुंकारतुमूलाः प्रत्यपद्यंत दानवान् ।
पुनः प्रचण्डफूत्कारबधिरीकृतविष्टपाः ॥८४
इस वृत्तान्त को श्रवण करके भण्ड को बड़ा भारी क्षोभ हुआ था कि जिसने (गणपति ने) अपने ही समान बहुत से दन्तावलानानों का सृजन किया था ।७८। उनके कटस्थल से मद निकल रहा था और उसकी गन्ध से चञ्चल भ्रमरों के समूह आगे मंडरा रहे थे जो गान सा हो रहा था ।७९। उनकी कान्ति स्फुरित दड़िम के किंजल्क के विक्षेपकर रोचि वाले थे जो सदा ही अनेक सागरों को एक ही बार में पान करने के लिए उद्यत थे ।८०। उनमें आमोद प्रमुख था और ऋद्धि जिनमें मुख्य थी ऐसी शक्तियों के द्वारा सेवित थे । ये छै विघ्न नायक हैं और सात करोड़ संख्या वाले हेरम्बों के अधीश्वर थे । इनके नाम—आमोद—प्रमोद—सुमुख—दुर्मुख—अरिघ्न और विघ्न कर्त्ता ये थे ।८१-८२। ये सब उन महा गणपति के युद्ध में आगे चल दिये थे।
३८० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
उस अग्नि प्राकार के वलय से गजानन निकलकर चले थे ।८३। उनके क्रोध पूर्ण हुङ्कार से वे परम तुमुल थे और ये सब दानवों के समीप में प्राप्त हो गये थे । फिर इनकी बड़ी प्रचण्ड फूत्कार थी जिससे विष्टपों को भी बहि- राकर दिया था ।८४।
पपात दैत्यसैन्येषु गणचक्रचमूगणः । अच्छिदन्निशितैर्बाणैर्गणनाथः स दानवान् ॥८५ गणनाथेन तस्याभूद्विशुक्रस्य महौजसः । युद्धमुद्धतहुंकारभिन्नकार्मुकनिः स्वनम् ॥८६ भ्रुकुटी कुटिले चक्रे दष्टोष्ठमतिपाटलम् । विशुक्रो युधि विभ्राणः समयुध्यत तेन सः ॥८७ शस्त्राघट्टननिस्वानैर्हुंकारैश्च सुरद्विषाम् । दैत्यसप्तिखुरक्रीडत्कुद्दालीकूटनिस्वनैः ॥८८ फेत्कारैश्च गजेन्द्राणां भयेनाक्रन्दनैरपि । ह्रेषया च हयश्रेण्या रथचक्रस्वनैरपि ॥८९ धनुषां गुणनिस्स्वानैश्चक्रचीत्कारणैरपि ॥९० शरसात्कारघोषैश्च वीरभाषाकदम्बकैः । अट्टहासैर्महेंद्राणां सिंहनादैश्च भूरिशः ॥९१
गण चक्र की सेना का समुदाय दैत्यों की सेना में कूद पड़ा था । उन गणनाथ ने अपने तीक्ष्ण बाणों से दानवों को छेद दिया था ।८५। उस गण- नाथ का महान ओज वाले विशुक्र के साथ बड़ा भीषण युद्ध हुआ था जिसमें बहुत उद्धत हुङ्कारें हो रही थीं और धनुषों की टंकार की ध्वनि भी थी । ।८६। विशुक्र ने भौंहें टेढ़ी कर ली थीं और उसके दांत और होठ पाटल वर्ण के थे । ऐसे उसने गणनाथ के साथ युद्ध किया था ।८७। शस्त्रों के घट्टन के शब्दों से और असुरों की हुङ्कारों से तथा दैत्यों की सप्तति की खुरों की क्रीड़ा से कुद्दालियों के कूट घोषों से दिशाएँ क्षुब्ध हो रही थीं । ।८८। गजेन्द्रों के फेत्कारों से तथा भय से आक्रन्दनों से—घोड़ों के हिन- हिनाने से और रथों के पहियों की ध्वनियों से भी सब दिशाएँ कांपने लगी थीं ।८९। धनुषों की डोरी की ध्वनियां तथा चक्र के चीत्कारें भी उस समय
गणनाथ पराक्रम वर्णन ] [ ३८१
में हो रही थीं ॥६०॥ वीरों के वचन समूहों से तथा शरों के सात्कारों के घोष एवं महेन्द्रों के अट्टहास और अधिकांश में सिंहनाद भी हो रहे थे ॥६१॥
क्षुभ्यद्दिगंतरं तत्र ववृधे युद्धमुद्धतम् ।
त्रिंशदक्षौहिणी सेना विशुक्रस्य दुरात्मनः ॥६२॥
प्रत्येकं योधयामासुर्गणनाथा महरथाः ।
दन्तैर्मर्म विभिंदंतो वेष्टयंतश्च शुण्डया ॥६३॥
क्रोधयन्तः कर्णतालैः पुष्करावर्त्तकोपमैः ।
नासाश्वासैश्च परुषैर्विक्षिपंतः पताकिनीम् ॥६४॥
उरोभिर्मर्दयंतश्च शैलवप्रसमप्रभैः ।
पिषंतश्च पदाघातैः पीनैघ्नंस्तस्तथोदरैः ॥६५॥
विभिन्दन्तश्च शूलेन कृत्तंतश्चक्रपातनैः ।
शङ्खस्वनेन महता त्रासयन्तो वरूथिनीम् ॥६६॥
गणनाथमुखोद्भूता गजवक्त्राः सहस्रशः ।
धूलीशेषं समस्तं तत्सैन्यं चक्रुर्महोद्धताः ॥६७॥
अथ क्रोधसमाविष्टो निसैन्यपुरोगमः ।
प्रेषयामास देवस्य गजासुरमसौ पुनः ॥६८॥
उस समय में सब दिशाओं में बड़ा क्षोभ छागया था ऐसा वह उद्धत युद्ध हुआ था । उस दुरात्मा की जो तीस अक्षौहिणी सेना थी । उसमें प्रत्येक से महारथी गणनायों ने युद्ध किया था । वे दाँतों से मर्मों का भेदन कर रहे थे और सूँड़ से उनका वेष्टन कर रहे थे ॥६२-६३॥ पुष्करावर्त्तक के समान कानों के तालों से क्रोध करते हुए और पुरुष नाक के श्वासों से पताकिनी के अन्दर विक्षेप डालते हुए—पर्वत के वप्रके तुल्य उरः स्थलों से मर्दन करते हुए—पैरों के घात से पीसते हुए—तथा पीन (स्थूल) उदरों से हनन करते हुए—शूल से विभेदन करते हुए और चक्रों के पातन से काटते हुए और महान शंखों की ध्वनि से सेना को त्रास देते हुए ऐसे गणनाथ के मुख से उत्पन्न सहस्रों ही गजबदन वहाँ पर विद्यमान थे । मद से उद्धत उन गजों के समान मुख वालों ने उस सेना को सम्पूर्ण को धूल में मिला दिया था ॥६४-६७॥ इसके अनन्तर अपनी सेना के अग्रणी ने क्रोध में समाविष्ट होकर फिर इसने देव के गजासुर को भेजा था ॥६८॥
३८२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
प्रचंडसिंहनादेन गजदैत्येन दुर्धिया । सप्ताक्षौहिणियुक्तेन युयुधे स गणेश्वरः ॥६६ हीयमानं समालोक्य गजासुरभुजाबलम् । वर्धमानं च तद्वीर्यं विशुक्रः प्रपलायितः ॥१०० स एक एव वीरेंद्रः प्रचलन्नाखुवाहनः । सप्ताक्षौहिणिकायुक्तं गजासुरममर्दयत् ॥१०१ गजासुरे च निहते विशुक्रे प्रपलायिते । ललितांतिकमापेदे महागणपतिमृधात् ॥१०२ कालरात्रिश्च दैत्यानां सा रात्रिर्विरतिं गता । ललिता चाति मुदिता बभूवास्य पराक्रमैः ॥१०३ विततार महाराज्ञी प्रीयमाणा गणेशितुः । सर्वदैवपूजायाः पूर्वपूज्यत्वमुत्तमम् ॥१०४
उस गणेश्वर ने प्रचण्ड सिंहनाद वाले दुष्टमति सात अक्षौहिणियों से संयुत गजदैत्य के साथ युद्ध किया था ।६६। उस गजासुर की भुजाओं के बल को क्षीण होता हुआ देखकर और उसके बलवीर्य को बढ़ा हुआ देखकर वहाँ से विशुक्र भाग गया था ।१००। मूषक का वाहन वाला वह एक ही वीरेन्द्र प्रचलन करता हुआ सातों अक्षौहिणी सेनाओं से युक्त उस गजासुर को मर्दन करने वाला होगया था ।१०१। उस गजासुर के मरने पर और विशुक्र के भाग जाने पर वह महा गणपति युद्ध स्थल से ललिता देवी के समीप में उपस्थित हो गये थे ।१०२। और दैत्यों की कालरात्रि वह रात समाप्त हो गयी थी । ललिता इस महा गणपति के पराक्रम से बहुत ही प्रसन्न होगयी थी ।१०३। परम प्रसन्न उस महाराज्ञी ने गणेशजी की अर्चना समस्त देवों से पूर्व में होकर उनको पूर्व पूज्यत्व प्रदान किया था जो अतीव उत्तम वरदान था ।१०४।
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